श्री सीताराम यादव (सेठ जी) के 10 वीं परिनिर्वाण दिवस :
पर उनको विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ।
- भागीरथ यादव
वैसे तो सेठ जी के व्यसायिक सामाजिक एवं राजनैतिक जीवन के वारे में आप सभी भली-भाँति परिचित है’ मैं इस अवसर पर आप सबसे अपने बचपन की कुछ यादें साझा करना चाहता हूं।
श्री सीताराम यादव (सेठ जी) ग्राम रमदेइया, पो० कोल्हुआ, तहसील : बदलापुर, जिला : जौनपुर के मूल निवासी थे। उम्र मे वह हमसे बहुत बड़े थे। सेठ जी से मेरा वचपन से सम्पर्क का कारण था कि सेठजी की वहन की शादी मेरे चचेरे बड़े भाई श्री हरगेन यादव के साथ हुई थी जिसकी वजह से वह हमारे घर आते थे और उनके मिलनसार सरल स्वभाव के कारण हमलोग उनसे घुल-मिल गए थे। उन दिनों मैं उनसे उम्र में बहुत छोटा था प्राइमरी पाठशाला मे पढ़ता था साथ सेठ जी इतने सरल हृदय थे कि हमलोग उनसे इतने घुल-मिल कर बात-चीत करते थे। उम्र का कोई वन्धन नही होता था, वह भी बालक जैसा हम लोगो के साथ व्यवहार करते थे । चूंकि रिश्ते में वह साले (मेरी बड़ी भाभी जी के भाई) लगते थे अतः ग्रामीण परिवेश की परम्परानुसार गाली, हंसी-मजाक मस्ती हुआ करती थी और मैं उनको साला कहकर हंसी-मजाक किया करता था और वह भी उसी तरह मस्ती कि प्रकृति से व्यवहार करते थे।
सेठ जी की माता जी का उल्लेख करना उचित है वह बड़ी दूरदर्शी एवं श्रद्धालु प्रकृति की वात्सल्यमयी मां थीं। जिनके स्नेह के कारण मैं अक्सर उनके घर जाया करता था. और माताजी वडा लाड़-प्यार बड़े दुलार के साथ अच्छा -अच्छा भोजन, दूध-दही और मेरा खास पसन्द का जमौआ (दूध से सजाब दही जो मिट्टी के वर्तन (कछरी) में गोबर के सूखे उपले की धीमी-धीमी आच पर जमाया जाता है। खिलाती थी साथ ही सेठ जी के छोटे भाई श्री राजाराम एवं श्री मुनिराज जो हमउम्र है उनके साथ खेलना एवं सई नदी मे नहाता एवं मस्ती करता था। जिसके कारण उनके यहाँ कई दिनो तक रुकने का मन करता था और रुकता भी था। साथ ही सेठजी के घर के पास कल्याणपुर गांव में मेरे मामा जी का भी घर है। अतः बराबर उनके गांव आना जाना लगा रहता है। इस प्रकार का सिलसिला जब तक मैं हाई स्कूल (कक्षा 10 तक) मे था तब तक चलता रहा, इसके बाद आगे की पढ़ाई के लिए वर्ष 1960 मे जौनपुर शहर के वी.आर.पी - इमिडिएट कालेज बाद मे. टी.डी. कालेज से वी० काम० करने के बाद इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एम० काम० की पढ़ाई में व्यस्तता के कारण उनके गांव जाने का क्रम कम हो गया तथा सेठ जी अपने व्यवसाय प्रसार के में व्यस्त हो गए अतः मुलाकात नहीं हो पाया, करती थी।
मैं एम० काम० परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद मुम्बई 1966 में गया और पुनः उनके सम्पर्क मे आ गया तब भी हम लोगो का व्यवहार वयस्क न होकर वाल्यकाल जैसा ही वही गाली, हंसी-मजाक, मस्ती वाला ही होता था।
समय बदलता गया मै मुंम्बई विश्वविद्यालय के गवर्नमेन्ट ला कालेज में एल. एल. बी. एवं एलएलएम करने के बाद आगे की पढ़ाई के लिए वर्ष 1971 अमेरिका (न्ै।) चला आया और यहीं पर सेटिल हो गया हूँ परन्तु जब भी भारत (प्दकपं) आता था सेठजी से अवश्य मिलता था।
मुझे एक वाकया याद है, जब मैं भारत गया था सेठ जी मुझे अपने साथ लेकर अपने निवास स्थान भिवण्डी (मुम्बई) अपनी कार से जा रहे थे. रास्ते मे एक अस्पताल के पास रुके और बोले कि चलिए एक सज्जन से मुलाकात करवाते हैं जो समाज के प्रतिष्ठित एवं यादव महासभा (मुम्बई) के अध्यक्ष तथा नगर सेवक भी थे. मै उत्सुकतावश पूछा । उन महानुभाव को क्या हो गया है जो अस्पताल मे मिलने जा रहे हैं तब उन्होंने बताया कि उन्हें गोली लग गयी है, मै चिन्तित मन से उनके साथ उन महानुभाव से मिलने गया, वहाँ पर सेठ जी ने मेरा परिचय उनसे कराया और उनका भी परिचय मुझसे कराया और उनका नाम श्री श्यामनारायण यादव बताया जो कि आजमगढ़ जनपद उत्तर प्रदेश के मूल निवासी थे और वाद में वह वहाँ (सगड़ी-आजमगढ़) से विधायक भी चुने गऐ। तो ऐसे सरल स्वभाव, स्नेहिल तथा सबके हितैषी थे सेठ जी. कालान्तर में सेठ जी की मध्यस्थता में ही मेरे छोटे पुत्र मनदीप यादव का विवाह श्री श्यामनारायण जी की पुत्री श्रीमती विद्या यादव की पुत्री डा0 प्रियंका सिंह यादव के साथ हुआ और हम लोग आपस में सम्वन्धी हो गये।
एक प्रसंग और आया जब सेठ जी से को अतिप्रसन्नृतम हुई थी। यह वर्ष 1990 का वाकया है, मेरे बचपन से गवर्नमेन्ट ला कालेज मुम्बई तक सहपाठी रहे है, संयोग से अका नाम भी सीताराम यादव है जो मेरे गाँव के समीप फत्तूपुर के निवासी हैं और भारतीय स्टेट बैंक में मुख्य प्रवन्धक पद से रिटायर हुए है उनकी सुपुत्री सुमन यादव - के विवाह मे सम्मिलत होने अमेरिका से भारत (इलाहाबाद) आया था, मुझे प्रसन्नता इस बात से भी अधिक थी कि मेरे सहपाठी की सुपुत्री का विवाह सेठ जी के ज्येष्ठ पुत्र श्री अजय यादव जी के साथ हो रहा था। वहां पर सेठ जी से मुलाकात उसी वाल्यावस्था के लहजे में हुई कुछ उन्होने उस भीड़-भाड़ के माहौल में भी वह वाल्यकाल की सरल व्यवहारिकता गाँव की नही छोड़ी यह दृश्य देख सुनकर सभी लोग दंग रह गए और वाद मे उसी हंसी मजाक मे सहभागी बनें।
चूंकि मेरा और सेठ जी का वचपन का सम्बन्धा रहा है और मुझे यह गर्व है कि सेठजी इतने महान व्यवसायी, सामाजिक प्रतिष्ठित हुए भी हमारे वचपन के क्रिया कलापों को नही भूले थे और उसे जीवन पर्यन्त जीवंत बनाये रखे। उस
पुनः अपने अविस्मरणीय वाल्यकाल की स्मृतियो को ताजा करते हुए उनको विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ।
भागीरथ यादव,
अमेरिका


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