Wednesday, January 11, 2023

मैं आश्चर्यचकित रहा

 


उनकी सरलता देखकर मैं आश्चर्यचकित रहा 
- डा.रामयश यादव


 सबसे पहले माननीय सीताराम सेठ जी को सादर नमन करता हूँ। और इनके विषय में मैं बताना चाहता हूँ जब मैं कोल्हुआं बाजार में प्रैक्टिस करने के आया तो मैं यह सुना कि मानी सेठ जी बिज़नेस और भीमंडी के बहुत बड़े उद्योगपति है और बहुत अच्छे पैमाने पर है मैं सोचता था मैं उनसे अगर मुलाकात करता हूँ पता नहीं मुझसे बात होगी, हो पाएगी या नहीं, यह सोचकर मैं घर रमदेईया गया और उनकी सरलता देखकर मैं आश्चर्यचकित रहा और मैं उनसे बताया मैं डा.रामयष यादव हूँ आपकी बाजार में एक छोटा सा क्लिनीक खोलकर रहना रहना चाहता हूँ।इसके बाद मेरी भावनाओं को भांपते हुए उन्होंने कहा कि चलिए अब मैं आशीर्वाद देता हूँ। क्या आप अच्छे डॉक्टर हो करके सामाजिक होकर के यहाँ उभरेंगे?दूसरी बार मैं फिर उनसे मिलने गया मेरा।सेलेक्शन सरकारी सर्विस में हो गया था।इस संगठन।में।तो उसके बाद वो कहे की सरकारी शरीर आप सबको बड़ा नहीं बना पाएगी। आप में ही रहिये और आप यहाँ सबसे अच्छे आदमी हो जाओगे।अब कुल्लू में ही रहिए।यह सब उनका जिसतरह से भगवान का आशीर्वाद हो उस तरह सार्थक रहा मेरे पति और मैं अपनी क्लीनिक और यहाँ के।सवाल से संतुष्ट हो गया।यूँ तो मेरी व्यक्तिगत।भावनायें हैदूसरी परिचय में इतना।बढ़ गई।यहाँ कभी बाहर से आने पर वैसे यूपी से या भ्रमण करने के बाद कहीं भी अत्य थे तो मेरे यहाँ बैठती थी।फिर मुंबई से आते आने के बाद।वो घर से पैदल ही हमारे क्लिनिक तक पैदल चले आते थे, इतने सरल स्वभाव के थे की गाड़ी पर नहीं बैठते थे, पैदल लोगों से मिलते हुए आते।और यह?रुकना है और कहीं कहीं उनके कई कार्यक्रम यहाँ रुकने से स्थगित भी हो जाता था क्योंकि उनसे मिलने वाले बहुत ज्यादा आजाते थे।हमने उनको ये भी देखा है कि उनके पास मिलने वालों की संख्या गरीब से लेकर।गरीब से लेकर के बहुत ऊंची आदमियों तक की रही।ओवैसी से व्यक्ति रहे लगाते यहाँ रहे, मैं उनको जानने की पहचान नहीं पाता था। वहीं गाजीपुर, बनारस, बलिया, आजमगढ़, गोरखपुर इतने आदमी यहाँ आते रहते थे और तब हमारी भी इस तरह की नहीं थी एक छोटी सी स्टोरी उनके सामने एक कुर्सी बैठते थे और पता नहीं इतना मजमा लग जाता था कि भगवान कैसे लोग सुनते हुए यहाँ पहुँच जाते थे।बहुत ऊँचाई के आदमी आते थे।और।कभी कभी जब कही चले जाते थे रिश्ते में तो लोग एक सेठ जी घर पर है।तो मैं बताता था कि नहीं कहीं गए हैं कब आएँगे हुआ भाई देखिये आने के बाद यहाँ रुके ही जाते हैं अभी कैसे बताऊँ आयेंगे जरूर।उनकी वेटिंग कुछ देर बैठे रहते थे या घर चले जाते थे तो मैं बता देता था कितने आदमी आया से मिलने के लिए तो इस तरह से।उनका स्वभाव एक बड़ा आदमी हो करके इतना नरम था कि जनता उससे मिलने के लिए ये नहीं सोच पातीं की हमको शेर जी नहीं पहचानते हैं। वो तो ऐसे लगता था जैसे मानो सब को पहचान रहे हैं और आदमी संतुष्ट हो भी जाता था। तो यार मिस एक पहचान है।मैं उनकी बात थी।और।उनकी कुछ विशेष बातें मैं कहना चाहता हूँ।उनके साथ रहकर।कुछ।नहीं जान पाए। यह लिए उनकी विशेषता थी। जैसे कितनी मदद किसको कहाँ कर देते थे यह किसी को पता नहीं रहती थीं। ये जब जानकारी हो जाती है कि सेठ जी ने मदद किया है, लेकिन कभी किसी से यह नहीं बताते कि मैंने इनकी ये मदद की।यह उनकी विशेष बातें रहे।किसी की बिमारी में, किसी के बिज़नेस में हमने देखा उनके साथ राय।कब किसको क्या मदद करनी है, यह पता नहीं चलती।यह उनकी बहुत बड़ी बात थी। आज के दिन किसी कोई दे देता है। हमने तो उनको इतना दे दिया, यह मदद कर दिया।लेकिन वाणी सेठजी में ये आदत नहीं थी किसको क्या दिए?आपको आपके सामने पेश करता हूँ।माननीय सेठ जी, एक चुनाव यहाँ बहुत सी छोटे तबके के आदमी थे स्वर्गीय उमाशंकर यादव।जो इन शिक्षकों हमारे विधान सभा थी यहाँ से चुनाव लड़े थे?और मैं जानता हूँ कि एक अध्यापक से 10 ₹5000 उनकी तनख्वाह थी, उस चुनाव लड़ने लायक नहीं थी।जब उनका ये पता चली इनका चुनाव एक बहुत बड़े आदमी के साथ मुकाबला होने जा रहा है, जो सीताराम मिश्र के लड़के थे। क्या नाम विजय विजय नारायण पांडे?तो भारतीय जनता पार्टी से चुनाव लड़ रहे थे।उनके साथ से जब चुनाव में सबका हो गया, पर्चा भरा गया तो पता चली कि अरे उमा शंकर, पर्चा वापस के लिए तुम एक आदमी के सामने तो लड़ने जा रहे हो क्या? लड़ोगे?मेरे सामने की बात सही है। उमाशंकर से मान्य सर जी यही के।अरे भाई हो प्लेस मत हो, पैसे 100 ना हो तो टाटा सबको क्या?कुछ लड़ने?इतने ऊंचे विचार थे उनकी तुम चुनाव लड़े, पैसा जहाँ कम पड़ेगा, मैं देखूंगा।और उन्होंने पता नहीं कैसे क्या कर दिया। इतना जितनी भारी मत से कोई विधानसभा चुनाव से नहीं जीता।उनकी कीमत थी। इस तरह से उनके भाव ऐसे थे जिनके पर हाथ रख देते थे, ऊँचाई फरवरी था।और और।हो, इस तरह से उदाहरण यही रहे।और कभी कभी लखनऊ जाते थे। तुम उसको भी साथ ले लेते थे और उनकी यह बात रही जिसे सेठ जी जब लखनऊ जाते थे माननीय स्वर्गीय मुलायम सिंह यादव से मुलाकात करने के लिए तो वहाँ ये नहीं हमको लगा कि हम कहीं भी एक बीएपी करने जा रहे हैं।हम आपके लिए एकदम सारा दरवाजा खुला पहुंचते से बातचीत की। इसी घर में एक रिश्तेदार तरह से बैठ के बात होती थी और सेठजी उनको सलाह देते थे एक बात उनको बिगड़ गए कि इस तरह से कैसे राजनीति करोगे? तुम से 2 साल 3 साल में खत्म हो जाओगे तुम्हारा फ्रॉड से तुम ऐसे बोल रहे थे? अरे?सीताराम जी आप ऐसे बोल्ड है, मेरे साथ सोते और मेरी तरह होते तो सब मिल जाते हैं। तो दोनों में खूब एकदम झड़प भी हुई और ये कहे कि आपको राजनीति करना है। सवस्थ अपना ठीक रखें, इस तरह से डालोगे तो अच्छा नहीं लगेगा।फर्स्ट पीपल ट्री हाउस में सस्ते।और बहुत ही भाव से बोले और कोई कमी मत बताइए। सेठजी मैं हूँ।इस तरह से उनकी बातें होती थी नेताओं से।और बड़े बड़े नेता?बड़े बड़े नेता बड़े बड़े अधिकारी से आते रहे। उनकी कृपा से।अब जब उनरम दीजिए मुझे उनके घर पे आ रहे थे।तो डीएम मुझसे ये कहता था सर देखिये गा मुझे कोई आज से ना आने पाए क्योंकि सेठ जी आपकी बहुत विभिन्न है।और आबाद देखिये सेठजी हमारी तने चिकित्सा।इतने अभिन्न है और इतने सरल हैं तो किसी का कोई नुकसान नहीं करेंगे। अगर कोई नुकसान हो तो आप मुझसे कहिए गा मैं देख लूँगा। इतना तो मुझे दम था और मेरे पास है ना? साहस हो गया था। डीएम, आईजी, डीआईजी इससे यही आते थे। मैं और रात यहाँ पड़े रहते थे। मेरे साथ बैठते थे, चाय पीते थे।तो उन्होंने मुझे जो।ताकत दी। उस तरह से मुझे कभी और ताकत नहीं है।इस तरह से मैं उनके लिए कितना क्या कहू वह ऐसे व्यक्ति थे कि उनके अंदर किसी भी तरह की बनावट और घमंड नहीं था।सरल स्वभाव के थे।जी।हाँ, इस बार घर पे शादी थी।उनके भाई की लड़की की राजाराम से एक लड़की एक भाई राम विनोद की शादी थी। मुझे प्रतिनिधि बनाकर भेजे थे वहाँ आजमगढ़ राम सिंह यादव के यहाँ हाँ तो मैं वहाँ गया।33। हैलो।कौन?बिल्कुल ठीक हाँ उनके पास जब मैं सिंह यादव पर आपको सेठजी भेजे हैं हम कहाँ से भेजा है? मुझे यहाँ नहीं ये बात सुनी पाया कि मैं अपनी परिचय बताओ, पता नहीं कैसे बोल दिए जाएंगे उनको ज़रा ये महसूस होना मैंने उनको भेजा है अपना प्रतिनिधि बना के।इस तरह से उनकी ऐसी व्यवस्था थी किसी कभी हल्का नहीं समझती, ऊँचाई पर ले जाते थे।और इस बात मुझे याद आ रही है कि कभी कोई उनके सामने उनको भलाई के लिए बोलते थे।बहुत नजदीक की बात से एक आदमी बहुत उठ रहा था तो बड़ी बड़ी गाड़ियां बड़ी बड़ी चीजें ले कर रहा था और बहुत ही गाड़ी से 10 गाड़ी से चल रहा था।तू सेठजी से आया मिलने के लिए एक एक लड़के हो, अभी तो भर रहे हो?कुछ ऐसी इस फिर प्रॉपर्टी बनाओ जिससे की तुम्हारे काम आएगी। इस तरह से उगाओगे तो लक्ष्मी बहुत बचाव की होती है। कुछ ऐसी प्रॉपर्टी बनाओ। मेरे सामने की बात से वो आदमी ऐसा मतलब बहुत बात सुनता रहा लेकिन परवाह नहीं किया।आवाज़ जो एकदम बिल्कुल परेशान हैं, गरीबी पर आ गया।यह तो उनके उनसे भाव थे। किसी को सलाह देना सी बताना तुम जमीन की खरीद लोग बॉम्बे विचार फ्लाइट ले लो, इस सब कर लो और इतना गत सड़क पर।क्या अब जाना ही है ना? क्या मैं नहीं चल सकता हूँ दो चार गाडी ले करके लेकिन नहीं कभी कभी पैदल चल देते थे तो कभी कभी स्कूटर चल देते थे ये उनकी सरलता भी इसे मैं बोल रहा हूँ।बाकी दिन का आशीर्वाद सुन रहा रानी का श्रेय भी उन्हीं की नहीं तो मैं कहीं चला गया होता। यहाँ कुल्लू में बैठकरके राजनीति करता है ना तो यहाँ चिकित्सा कर रहा हूँ वही करता।ओके और हाँ तुम कौन हो कमीने पड़े हम है ना? उनका साहस ही बहुत था।जी।कौन बोल रहा है?और किसी पौंड पर।वो यही सब बात था। उनके इतिहास विषय में तो और सोच सोच के बोलना पड़ेगा सारा दिन रात बोलता ही रहो।

सरलता को देखते हैं, विवाह आकर्षित किया है की ये कुछ भी कर सकते हैं। कुछ भी किसी को करा सकते हैं लेकिन उनकी भावनाये जो थी दूसरे को बनाने में ज्यादा थी।वो अपने लिए जो सोचते थे वो सोचते थे लेकिन दूसरे को भी आगे ले जाने में उनकी बहुत बड़ी इच्छा बनी रहती थी जैसे किसी को राजनेता बनाना।किसी को कोई चुनाव लड़ना तो बहुत ज्यादा प्रेरित करते थे। एक ऐसा करो जो आगे निकल जाओगे। जैसे आप भी कह रहे थे कि नेताजी करते हुए उनके घर आए बहुत लोगो के यहाँ कई बार आप मिलने गए तो क्या उनको नहीं लगता था की वो भी राज्यसभा में चले जाएंगे? परिषद में चले जाये, मिले बन जाए, एमपी बन जाये।आलू ले बहुत कुछ उनको तो नेता जी खुद ही देने के लिए तैयार थे लेकिन वो चाह रहे थे कि मैं अगर सलाहकार बन के उनको सलाह नहीं देता रहूंगा। मुलायम सिंह यादव एक ऐसे नेता थे ये बहुत जब कभी कभी।8000 देते हैं। किसी को समझते नहीं थे और उनको समझने के लिए ही मान्य सर्विस सीता राम जी थे और एक जो है झांसी की कोई आदत है और रामकरन दादा ये तीन लोग उनको विदेश समझा पाते थे जो कभी इजाजत से चेतक क्योंकि मैं उनके साथ रहके देख रहा हूँ। जब कभी नेता जी बहुत ज्यादाएक दम मैं डिस्टर्ब बातचीत थे तो यही तीन आदमी से समझाते थे सेठजी और ये सर मी दादाजी, रामकरन और एक हाँ चौधरी हरमोहन सिंह पीएस रह जाते थे।चलो, चलो, चलो, चलो।और ज्यादा भी बोलची रहे हैं। अपने बच्चों के लिए बेटी की पिटाई कर देंगे तुम्हारी क्या सेठ जी को ऐसा कभी नहीं है ऐसा की नेताजी चाहते हो की मूर्ति बने, राज्यसभा में चले जाये, कभी कभी इच्छा नहीं ज़ाहिर की।यही तो उससे उनका एक शांत मतलब तो ये भी जानकारी क्योंकि मैं इस पे काम कर रहा हूँ तो बात चीत भी पता चला की वो प्रोपोज़ भी किया। नेताजी लोगों ने कहा विज्ञापन को करिये तो मैं देता। जी ने कहा कि पहले उनसे बात कर लो को तैयार है क्या? हाँ ये तो फिर वो सिंह।आपको ऐसा कभी नहीं आपने नहीं कहा की आप हमें सदन का है जहाँ हम को तो हँसी मोबाइल ले जाएं, चाहे अगर तू चाहे हम अपनी प्रोपोज़ करदे, मैं नहीं चाहता हूँ मैं चाहता हूँ लोगों के साथ रह करके उनकी मदद करना जी।उदय प्रकाश नारायण वही राजनीति करते थे, किसी को बनाना चाहते थे।और कोई बात ऐसी जो परिवार और जो हर परिवार बच्चे।तो उनके बहुत ही।बहुत ही बहुत ही संस्कारित है।जिससे आपके साथ जो हमारे अजय भाई है, हमारा लड़का है अजय तो वो तो उनसे भी सरल है।इनको भी मैं देखता हूँ इनके अंदर ज़रा सी भी उत्तर पत्रक नहीं है।यह किसी को कभी भावनाओं से डेढ़ दिन कहीं अरे सेठ जी आपने बड़े आदमी हैं, ये नहीं हो रहा है, ये नहीं हो रहा है। आपको क्या कमी है? बताइए जो होगी हम करा देंगे, कर देंगे।तो उनसे हम सरल है। आपको ऐसा तो नहीं लगता कि जैसे वो चीजों को छोटे जाते थे वो छोड़ते हैं इनके लिए? तो जब तक देखिये ऐसा होता है सब चाहते हैं इच्छा तो सब की होती है लेकिन स्वयं ये इतने थोड़ा सा इस सरल और ऐसे व्यक्ति हैं। संकोची व्यक्ति से उक्त है।स्ट्राइक नहीं गया है मुझको, आप कोई चीज़ दीजिए अच्छे इससे पहले भी चाहते तो हो सकता था, लेकिन जो भी बिज़नेस इन्हीं को देखना था और सेठजी उसमें अस्वस्थ हो गए।अगर बिज़नेस इनको न देखना होता तब तक सांसद हो गए हो।अच्छी लड़ाई में थे, इनको लोग चा रहे थे।इनको चार थे।और यहाँ तक कि उनको टिकट भी करीब करीब मिलने के कगार पर पहुँच गया है। हैलो तो उस समय हमारे सेठ जी बहुत अच्छे स्वास्थ्य तो उन्होंने कहा कि भाई देखिए हम बनिया है ज़रा हमको अभी और काम करना है, थक जाएंगे छोटे है अच्छा आपको बनियों से लड़ना है, देश बना है, उनसे लड़ना है भाई।जी मर्जी जैसा गर्मी है, बनिये तो चाहिए वो अब तो हाँ वो कहेंगे अब तो हम।भाई हैं।तब तो हम भी कहते थे की आप आपके पिता जी का ज़माना देखते हैं तो आप नेताजी से कही ये बात की भाई बढ़िया सुनना इससे बड़ा बढ़िया चाहिए था।तो भाई दूसरी हमारी देखो तो तो ऐसे अब तो लेना ही जाते है हमे बाकी जब से जब जब मुलाकात करते थे।वो हमारे लड़के को बुलाते थे। एक नेता ड्राइवर बुलाओ उसको भी टु ड्राइवर टू मोहन था, उसी को लाइक करते थे और मेरे यहाँ शाम को खाना खाते थे। खाना तो उनका बहुत चीज़ सार्वजनिक था। रोटी, दाल, पालक सो वाली सब्जी थोड़ा सा दूर लेते थे।यही खाद सो जाते थे और सुबह कहते थे कि वो हमारे आने के बाद हमारे उठने के बाद ड्राइवर होना चाहिए। नहीं तो कहाँ? फूफा कहा है वो।वो अब वो हाजिर रहे, अच्छा हुआ, हाजिर और 3ः00 बजे निकलते थे। हम भी उनके साथ कभी कभी बैठ लेते थे। लखनऊ जाने के बाद वहाँ मिलते बात होती और तमाम बातों पर उनकी बात होती इन्ट्रेस्ट नहीं ले रहा था।और वहीं से अपना फाइट जाते थे। मुंबई। हम गाड़ी ले के यहाँ चले जाते थे।तो?एक बात और पूछ के मैं बात आपकी पूरी करूँगा।ये उनका अध्यात्म अध्यात्म बाद में इतना ज्यादा पहले से था वही और बाद में इतना ज्यादा आध्यात्मिक हो गए। वो बहुत ज्यादा समय इसी में देते रहे। मैं जब मुंबई जाता था तो मैं उनको लेकर के जो वाली एक हफ्ते या 15 दिन तक वहाँ स्वामी महाराज आते थे।उनके साथ बैठ की सारा बहक जो तथा वार्ता होती थी, शुरुआत से बैठते थे। वहाँ से प्रसाद लेकर हम लोग भी आते थे तो बाद में दम नहीं एकदम विलीन हो गई। इसी में अंतिम समय जो उनका रहा वो ज्यादातर अध्याप में ही गया है।तो उनके अच्छा हाँ, अभी आपने समझने की कोशिश किया की क्या था वो?इसलिए वहाँ उनको शांति मिलती थी इसलिए ऐसा सोचते थे नहीं के साथ भी कभी कुछ महसूस हुआ कि वहाँ देवी देवता और इस तरह की कोई सुनता है। ऐसी कोई बात नहीं तो क्या लगता है आपको की किस तरह का? क्या अध्यापक उनका यही था की इससे मनुष्य की जो भावनाएँ होती है?जो उनकी सोच होती है, एकाग्र करने के लिए तो महात्मा शरण ली जाती है। यही तो हमको लग रहा था।बाकी और जो ऐसा कुछ नहीं देखा तुमसे कुछ चाहते हैं मिर्ची वो।काम कर रहा हूँ अभी मैं उस आश्रम में भी गया था है तो जो हमने देखा है वो इस तरह से है की कबीरदास को तो आप सुने होंगे जी जीस तरह से कबीरदास पूरे जग कोये जागृत करते रहते थे ये पाखंड ये दुनिया भर की जो चीजें हैं जो ठीक नहीं है और वो संस संप्रदाय के जीतने लोग थे, यही काम किए हाँ, तो मुझे लगा कि वहाँ भी कोई रुचि नहीं है, कोई बेबी नहीं होता नहीं है और वो लोग भी जो भी जाता है समभाव से सबका समान आधार और ये वहाँ कोई किसी का वो नहीं करना है। दूर से ही लोग नमस्ते करते थे ये वो जी तो ऐसा कभी आपको नहीं लगता था की वो क्योंकि उनका ऐसा विचार था की पाखंड व खंड से दूर रहना चाहिए। तभी आप मंदिर जाते हुए देखा था, वो नहीं तभी आप उनको पता कभी कही नहीं। ये बड़ी अच्छी बात आप कहे।जिसे उनका हमने देखा एक बार मैं स्वयं जा रहा था कि हम जाएंगे सेठजी विंध्याचल कहा तो क्या करे यार? विंध्याचल जाएगी अरे ये पूजा कहीं ने कहीं कहा स्मार्ट कर दे दीजिये तो आपके हृदय में आ जाएंगे आप आप फ़ोन कर देखिए, उनकी फोटो दिखाई पड़ेगी तो इस तरह से आध्यात्मिक थे, लेकिन अंपायर अभी भी आप तो बहुत ऊँचाई बात कर दिए, लेकिन औरत कहा कि पैसा बचा भी चले जाते तब बहुत तब जाइए अब ये इस तरह से अमेजिंग 2 मिनट में समझा लेते थे इस बात को अच्छा एक बात अभी हमारी और किसी से बात हो रही अगर लोगों को जिससे सजग भी करते हैं, विदिशा को कहें ना की इतना अच्छा नहीं जाना है, लीजिये तो दबाव किसी को नहीं बनाते, लेकिन कभी कभी नहीं, कभी नहीं जागरूक करते हैं तो आप लोगों ने जागरूक किया और आपने कभी विचार नहीं किया जाए। चलो मौका मिलता है क्योंकि अब देखिये फिजिशियन होने के नाते समय कम रहता है। बाकी जब मैं बनारस जाऊंगा तो वहाँ गड़वाघाट जाता हूँ और प्रणाम करता हूँ वहाँ फिर बात लेता हूँ वहाँ पर लेता हूँ अभी तो मैं गया था चलिए बहुत अच्छा रहा आपसे बातचीत करके और कोई और बात।और कोई बात तो नहीं? बाकी तो हमको बस हमेशा जब अपने साथ रख करके बहुत ऊंची ऊंची बात मुझे सिखाते थे, बताते थे या फिर ढंग से रहेंगे तो कभी आपका माडल नहीं डाउन होगा तभी आप झूठ नहीं बोलेंगे किसी का कर्ज लेकर इनकार नहीं करोगे ये बड़ी अच्छी बात है उनकी बात तब आप ऊँचाई पर बने रहो चलिए बहुत बहुत धन्यवाद धन्यवाद हाँ कौन है??

                                                                                                     

डा.रामयष यादव

समाजभूषण स्व. सीताराम सेठ जी की कुछ यादे

 

पूरे समाज की चिंता करते रहे
-महंतप्रसाद रामनिहोर यादव 

समाजभूषण स्व. सीताराम सेठ जी की कुछ यादे
एक अच्छा सामाजिक समुदाय तभी बन सकता है जब उस समुदाय मे कुछ अच्छे व्यक्ती सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में कार्य करते हैं। जो हर समय सिर्फ अपनी नही बल्की पुरे समाज की चिंता करते रहे और इसी कारण पुरा समाज उनका सन्मान करता है।
स्वर्गीय सितारामजी उन्ही में से एक है 1980 के दशक में मेरी उनसे प्रथम मुलाकात हमारे घर हुई थी स्व. सितारामसेठ स्वयं राम उजागीरजी, राजाराम सेठजी, प्रकाशजी और अदालतजी अपनी कार से शिरडी साई बाबा के दर्शन के बाद श्रीरामपूर आए थे। एक सृजनशील निःस्वार्थी हंसता चेहरा तथा अच्छी व्यक्तीत्व के दावेदार सेठजी थे ही, यहाँ सभी यादव बंधुओं ने सभीका स्वागत किया और बहुत सारी बाते भी कि सभी लोग बिरादरी के पुश्तैनी कारोबार यहा गाय, , भैस, दुध व्यवसाय करनेवाले थे और कुछ लोग यहा खेती भी करने लगे थे।
हमारे पिताजी राम निहोरजी के साथ सभी लोग खेत देखने गए और सेठजी खेती एवं पशुओं के बड़े शौकीन थे। बड़े प्रसन्न हुए और सभी की सराहना भी कि उनके पास अधीक समय नहीं था फिर भी यहाँ बिरादरी स्वागत और व्यवहार देखकर अती प्रसन्न हुए और दोन दिन का समय यहाँ बिताया
एक सादगीभरा निजी जीवन, एक मार्गदर्शक, सलाहकार समाज के प्रती घोर आस्था और उत्तरदायित्व रखनेवाले सच्चा और सफल व्यवसायीक, सामाजिक नेता शिक्षा के प्रती विश्वास एक समाज सुधारक और एक अच्छे इन्सान स्वर्गीय सिताराम सेठ अपनी मिट्टी से हमेशा जुड़े रहे एक सादगीभरा जीवन, कठोर परिश्रम, अच्छा व्यवहार में उनका हरदम विश्वास रहा है। और इसी दम पर पुरा साम्राज्य खड़ा किया
जब भी सिताराम सेठ जी को मौका मिलता चार छे महिने में एक दोन दीन के लिए अपने मित्रो और परिवार के साथ श्रीरामपूर जरूर आते और सभी भाईयों से मुलाकात, हालचाल लेकर कुछ समय आसपास बिताते ।
स्वर्गीय सीताराम सेठ एक नेक इन्सान, कुशल समाजसेवक, मार्गदर्शक, समाज के हर तपके के सुख-दुख । मे शामील होनेवाले एक पारिवारीक सदस्य जैसे खड़े रहे है यादव महासंघ मुंबई के लिए किये गए उनके कार्य, स्कूल की स्थापना, उनकी दूरदृष्टी एवं संघटन कौशल्यता बयान करते हैं। अपने परिवार के लिए अच्छा शिक्षा और उज्वल भविष्य के लिए कठोर परिश्रम, त्याग के साथ पुरा जीवन व्यतीत कीया। उनका समाज निर्माण के लिए अखंड प्रयास दृढता के साथ सुख दुःख मे खडे रहे। मै अपने आपको भाग्यशाली मानता हू की मुझे ऐसे युग पुरुष के साथ मेरे जीवन के कई पल बिताने की लिए मिल सके ।
एक कर्मयोगी शिक्षाप्रेमी महान समाज निर्माता के रुपमे स्वर्गीय सिताराम सेठ जी को पुरा समाज याद करता रहेगा। उन्ही के दिखाए रास्ते पर एवं पद चिन्हों पर उनके दोनो बेटे श्री. अजयजी और श्री विजयजी चल रहे है। उनके उज्वल भविष्य और समाज कार्य के लिए शुभकामनाएँ स्वर्गीय सिताराम सेठ जी पावन स्मृती को कोटी कोटी प्रणाम एवं विनम्र अभिवादन ।


-महंतप्रसाद रामनिहोर यादव, 
श्रीरामपुर


Tuesday, January 10, 2023

मेरा बहुत देर से उनसे संपर्क हुआ



 मेरा बहुत देर से उनसे संपर्क हुआ

- श्रीराम यादव

इस समय मैं उनके जौनपुर के आवास पर हूं, यहां मुझे कई बार आने का मौका मिला, सबसे पहले तो मैं उन्हें धन्यवाद करता हूं और अपनी विनम्र श्रद्धांजलि देता हूं, उन्हें याद करता हूं। जो कुछ मेरी स्मृतियों में है उनके लिए यहां मैं बताना चाहूंगा कि मेरा बहुत देर से उनसे संपर्क हुआ। जहां तक मैं समझता हूं कि 1993 के चुनाव के बाद जिस समय उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी का गठबंधन था और पूरे प्रदेश में इस गठबंधन की एक लहर थी 15 पचासी का नारा बहुत तेजी से गूंज रहा था, ऐसा लगता था कि उत्तर प्रदेश से जैसे किसी बात की शुरुआत हो गई है।

अब मैं चुनाव जीतकर जब लखनऊ गया और वहां जाने के बाद सरकार का गठन हुआ तो मैं पहली बार विधायक हुआ था और मुझे पहली बार में ही उस सरकार की कैबिनेट में मंत्री के रूप में शपथ दिलाई गई यह बहुत ही सौभाग्य की बात थी। ऐसे में जितने भी लोग हमारे समाज के प्रतिष्ठित लोग थे हमें आशीर्वाद देने लखनऊ आए । समय-समय पर उन लोगों का आशीर्वाद मिलता रहा उनमें हमारे स्वर्गीय सीताराम यादव जी जो समाज को उठाने और एक नई दिशा देने के लिए बराबर काम करते रहे उनसे मुलाकात हुई। लखनऊ में कमोबेश बीसीयों बार उनसे मुलाकात हुई। तब मैं बहुजन समाज पार्टी में था उसके बाद जब मैं 1996 में समाजवादी पार्टी में आया जब गठबंधन टूटा था उसके बाद भी मुलाकात हुई।

उनके बारे में जो बातें हमें जानने को मिली वह यह है कि एक सामान्य से परिवार में पैदा होकर और गांव से निकलकर के जिस तरह से उन्होंने संघर्ष किया और अपने समाज के काफी लोगों को साथ ले कर के भी वह चले लोगों को रोजगार दिया मुंबई जैसे शहर में जाकर समाज के लोगों को और समाज के तमाम गरीब लोगों को काम धंधे में लगाया लोगों को प्रेरणा दिया उनका यह कर्तव्य बहुत ही प्रेरणादायक है। जो मैंने उनके विषय में जाना उसमें इन्होंने समाज को एक दिशा देने का काम किया और उसी के साथ साथ राजनीति में जिस तरह से माननीय मुलायम सिंह यादव उन दिनों देश में पिछड़ों के दलितों के विशेष करके माननीय राम मनोहर लोहिया जी के विचारों को लेकर के समाज को जगा रहे थे, जगाने का काम कर रहे थे लोगों में चेतना फैलाने का काम कर रहे थे उसमें बहुत बड़ी भूमिका मुंबई जैसे शहर से महाराष्ट्र जैसे प्रांत से उनको मदद देने का काम यदि किसी ने किया तो जहां तक मेरी जानकारी है वह स्वर्गीय सीताराम यादव जी थे। उन्होंने बहुत बड़ा सहयोग उनको दिया था, आर्थिक सहयोग भी किया और राजनीतिक सहयोग किया जिससे वह आगे बढ़ सके। मैं समझता हूं कि माननीय मुलायम सिंह यादव जी जब तक स्वर्गीय सेठ जी जिंदा थे जितना सम्मान मैंने देखा चाहे वह मुंबई हो या लखनऊ आने पर या सैफई जाने पर या दिल्ली जाने पर जिस तरह से नेताजी उनका सत्कार और सम्मान करते थे वह देखने से ही लगता था, कि वह इतने बड़े मददगार थे माननीय मुलायम सिंह यादव जी के। उन्होंने अपने पूरे जीवन में संघर्ष किया, संघर्ष के साथ-सथ

 अध्यात्म की तरफ भी उनका रुझान था, लगातार वह गढ़वा घाट संतमत आश्रम में जाते रहे, तमाम लोगों को उन्होंने प्रेरित भी किया सद्मार्ग पर चलने के लिए, गढ़वा घाट निरंतर उनका आना-जाना लगा रहा, जहां तक मेरी जानकारी है मुंबई में भी इन्होंने एक आश्रम की स्थापना कराई है जिससे समाज का बहुत बड़ा हित साधन हो रहा है, यहां पर भी लोग संतमत विचारधारा की विचारों से ओतप्रोत हो लाभान्वित हो रहे हैं।  सच्चे मार्ग पर चलने का प्रयास कर रहे हैं इस तरह से देखा जाए तो उनका बहुत लंबा संघर्ष रहा है उस संघर्ष से उन्होंने समाज को दिया है अपने परिवार को दिया है। मैं समझता हूं कि माननीय मुलायम सिंह यादव जी से मिलने के बाद उन्होंने देश के लिए भी बहुत बड़ा योगदान दिया है। इससे अधिक उनके बारे में क्या कहा जा सकता है वह महान व्यक्तित्व के धनी थे।

मुझे एक घटना याद आती है क्योंकि मैं बहुत गरीब परिवार से निकलकर राजनीत में आया था, मैं समझता हूं कि सेठ सीताराम जी भी उसी तरह से संघर्ष करके आगे आए थे यहां तक पहुंचे थे मुझे लगा बहुत अच्छे सहयोगी हैं मार्गदर्शक हैं मैंने उन्हें लखनऊ से फोन किया मैंने फोन पर उनको कहा कि देखिए मैंने थोड़ा बहुत वेतन वगैरह से बचा कर के रखा है, उन दिनों इतनी गाड़ियां नहीं हुआ करती थी, केवल महिंद्रा की जीप हुआ करती थी और उस समय महिंद्रा की ही एक नई गाड़ी निकली थी आरमदा और टाटा सुमो निकली थी मैंने फोन पर बात किया तो उन्होंने कहा कि आप आ जाइए और मैं यहां से दिलवा देता हूं। मैं समय निकालकर स्वयं वहां तक गया इसी बहाने मैं उनके मुंबई स्थित घर पर भी रुका वहीं पर रुक कर खाना पीना खाया उसके बाद उन्होंने मुझे वह गाड़ी दिलवाई, बड़े कंसेशनल रेट पर उन्होंने वह गाड़ी हमें दिलवा दी उसको मैंने काफी दिन तक चलाया । उससे मैंने दो चुनाव लड़े, मैंने देखा कि कोई चाहे कितने भी बड़े पद पर पहुंच गया हो चाहे छोटे पद पर हो सबके लिए उनके मन में समान भाव और हर एक की मदद का जज्बा हुआ करता था। उनकी सहायता और सहृदयता ही उनका आभूषण था, उनसे कभी किसी को शिकायत नहीं रही है मैं समझता हूं पूरे जौनपुर में चाहे वह राजनीति करने वाला हो चाहे बिजनेस करने वाला हो कोई नहीं कह सकता है कि उनसे किसी प्रकार से किसी को कोई नाराजगी हुई हो या किसी को कोई दुख हुआ हो। वह बहुत अच्छे व्यक्ति थे उन्हें अभी रहना चाहिए था, वह बहुत जल्दी चले गए हम लोगों के बीच से।



श्री श्रीराम यादव
पूर्व मंत्री उत्तर प्रदेश सरकार

सीताराम जी इसी तरह की शख्सियत है।

 पूर्वांचल ने बहुत सारी विभूतियों को पैदा किया है 
- सीताराम जी इसी तरह की शख्सियत है।

-चौ.अम्बिका चौधरी ( पूर्व मंत्री उ. प्र.)


पूर्वांचल ने बहुत सारी विभूतियों को पैदा किया है उसमें ऐसे लोगों का विशेष उल्लेख होता है जो लोग साधारण परिवारों से साधारण परिस्थितियों से निकले अपने कौशल और उन्होंने अपने परिश्रम से अपने उद्यम से उन्होंने अपने लिए एक बड़ी जगह बनाई और समाज के लिए एक बड़े बरगद के पेड़ की तरह तमाम लोगों को जो तपिश से आए उनको छाया देने का काम किया। सीताराम जी इसी तरह की शख्सियत है। न कि जौनपुर बल्कि पूर्वांचल तो विशेष रूप से लेकिन जो भी उनके पास गया उसको वह बहुत उदार हृदय से उसको जिस तरह की जरूरत थी उस तरह की मदद उन्होंने दिया। राजनीतिक रूप से जितना मैं उनको जानता हूं वह माननीय नेताजी श्री मुलायम सिंह यादव जी के इतने प्रिय थे और इतने नजदीक थे, अभिन्न सहयोगी थे और मैं बहुत जिम्मेदारी से यह बात कह सकता हूं कि नेताजी को ऐसे लोगों का सहयोग प्राप्त था यह सौभाग्य की बात है। उन्होंने बहुत मदद की लेकिन उस संदर्भ में किसी से भी किसी भी तरह की चर्चा नहीं की, यहां तक की 2-4 शब्दों में भी यह बात किसी को नहीं बताई, इस तरह के सहयोगी वह नेताजी के थे। जहां तक हमारा सवाल है हम लोग दूर से उनको जानते थे, मेरे पास कोई ऐसा संस्मण नहीं है जिसको की निजी तौर पर मैं यहां साझा करूं लेकिन उनके बाद उनके पुत्र श्री अजय जी हम लोगों के मित्र हैं हमारे छोटे भाई की तरह हैं उन्होंने हमेशा अपने परिवार की परंपराओं की तरह से हम लोगों का सम्मान करते हैं। यहां पर विशेष उल्लेख मैं इसलिए करना चाहूंगा कि जिन हालात में वह मुंबई गए और जो लोग ऐसे हालात में वहां गए उनको वह उन हालात में वहां नहीं रहने दिए और उनके पहुंच जाने पर पहले दिन से ही तमाम ऐसे लोग हैं हजारों लोग हैं जिनको उन्होंने संरक्षण दिया। 

अपने लिए उन्होंने जैसे भी दिन गुजारे हो लेकिन उनके यहां पहुंचने के बाद किसी को भी उन्होंने और परिस्थितियों में नहीं गुजरने दिया ऐसी उनके बारे में चर्चा आम है। बड़े लोगों की बड़ी मदद और राजनीतिक कार्यकर्ताओं के तो वह बड़े संरक्षक रहे हैं, जो भी उनके पास गया बिना किसी भेदभाव के उन्होंने उनकी मदद की है मैं केवल यहां पर आर्थिक पक्ष की बात नहीं कर रहा हूं बल्कि हिम्मत देने का काम, हौसला बढ़ाने का काम और यहां तक की अगर जरूरत पड़े तो उनके लिए छोटी बड़ी सिफारिश करने का काम उन्होने किया। अब यह जरूर है कि जौनपुर वाले उसमें सौभाग्यशाली हैं कि ज्यादा उनके हिस्से में आया और यह भी स्वाभाविक है कि जौनपुर में अपनी माटी से उनका ज्यादा लगाव था, इसकी वजह से जौनपुर वालों को उसका कुछ ज्यादा लाभ मिला।जौनपुर के अलावा भी जो लोग भी वहां तक पहुंच सके वहां से कोई निराश होकर नहीं आया, यह उनकी बड़ी भारी विशेषता थी और स्वभाव की उदारता के अलावा वह बहुआयामी व्यक्तित्व था उनका। हम बड़े-बड़े नेताओं के बारे में जब चर्चा करते हैं उनके गुणों की उनके आचरण की हम लोग कमोबेश उसको थोड़ा बढ़ा करके  करने की बात करते हैं।एक ऐसा व्यक्ति जो देश की पार्लियामेंट में नहीं गए  देश के कोई मंत्री नहीं हुए,  लेकिन बावजूद इसके राजनीति में समाज के लिए जो समझदारी और योगदान होना चाहिए उसको और उसमें अपनी जितनी भूमिका होनी चाहिए उस भूमिका को उन्होंने जिस ढंग से निर्वाह किया। एक उदाहरण हो सकता है और प्रेरणा ली जा सकती है।यह सच है कि इस रिवाज के लोग बहुत  समाज में होते नहीं और है भी नहीं, और आज भी जब  नेताजी की चर्चा होती है उनके सहयोगियों की चर्चा होती है तो प्रचलित तौर पर सेठ जी के नाम से भी उन को संबोधित करते थे और जब सेठ जी कहते थे तो यह मान लिया जाता था कि जब नाम नहीं ले रहे हैं तो उन्हीं की चर्चा हो रही हैं। जब जब बात आती थी तो एक अलग छवि उनकी सभी लोगों में थी खासकर समाजवादी परिवार में सभी लोगों में विशेष रूप से, जो लोग भी उन तक पहुंचे जो लोग नहीं भी पहुंचे उनका जितना भाग्य सौभाग्य हो।आज आवश्यकता इस बात की जरूर है कि हम देखते हैं कि गांधीजी सेठ जमना लाल बजाज के बगैर अपने उद्देश्यों को उस तरह से प्राप्त नहीं कर सकते थे, या कोलकाता जाते हुए गांधी जी को एक निश्चिंतता होती थी, लोहिया जी को निश्चिंतता होती थी कि वह वहां जा रहे हैं तो उनको देखने वाले लोग वहां हैं। 


नेताजी के जीवन में जो थोड़े से लोग ऐसे रहे हैं मैं समझता हूं कि उनमें सेठ जी की भूमिका वैसी ही समझनी चाहिए । हम लोगों ने जितना उसको देखा है खास करके समाजवादी पार्टी के गठन के बाद और खास करके पार्टी का विस्तार करने के लिए जिन लोगों को दी गई और महाराष्ट्र में जब समाजवादी पार्टी बनाने की बात आई तो उसमें बहुत सारे लोग जुड़े, मैं उसमें नाम लूं तो देवानंद से भी अपने समय में जुड़कर नेताजी ने काम लिया राज बब्बर तो काफी समय जुड़े भी रहे बड़ी जिम्मेदारियां उनको मिली। लेकिन हमारे प्रदेश के जो बड़े नेता लोग हैं मैं स्वर्गीय शारदा नंद अंचल का नाम लेना चाहूंगा मैं बलराम जी का नाम लेना चाहूंगा, जब महाराष्ट्र में पार्टी के विस्तार की बात करेंगे तो इन सबको आधारभूत रूप से जो सहयोग और समर्थन मिला उसमें हम सेठ सीताराम जी का उल्लेख करेंगे, क्योंकि सबसे आगे बढ़कर उनका नाम आएगा बगैर उनकी मदद के यह सब काम संभव नहीं था। 

यह सही बात है कि आज समाजवादी पार्टी वहां नहीं है जहां शुरुआत में आई थी तत्कालीन समय में कई विधायकगण मंत्री हुए विधायक हैं और आज भी विधायक हैं। लेकिन उस दौर को याद करता हॅूं तो खुद मेरी पृष्ठिभूमी का स्मरएा हो आता है, जब मेरे पिता जी कलकत्ता गए थे गांव के एक व्यक्ति से 10 रूपये कर्ज लेकर गए थे सबसे पहले उन्होंने उसको किया इसलिए मैं समझ सकता हूं उन परिस्थितियों को जब उन्को याद करता हूं तब अपने पूज्य पिता जी की स्मृतियां ताजी हो जाती हैं, उनको पुनः मैं उसी भाव और छवि के साथ स्मरण करता हूं और जिनका नाम रहा जो लोग अनाम रहे और उनके साथ रहे उन पर उनकी दुआएं रहीं और वे भी जिनपर उनकी अपार कृपा रही उनसब की तरफ से उनकी स्मृतियों को नमन करता हूं। मैं उनके चरणों मे अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं।



-चौ.अम्बिका चौधरी 
( पूर्व मंत्री उ. प्र.)


Saturday, November 26, 2022

लल्लन पहले अपने मित्र सीताराम को तैयार तो करो हम तैयार हैं ।

 राज्यसभा सदस्य बनाने के लिए सहर्ष स्वीकार कर बोले लल्लन पहले 
अपने मित्र सीताराम को तैयार तो करो हम तैयार हैं । 


महामानव स्वर्गीय सीताराम सेठ जी, जो जो हमारे अभिभावक परममित्र व भार्गदर्शक के रूप में 
रहे है। आज उनके विभिन्न क्षेत्रों में किए गए कार्यो का उल्लेख करते हुए अपार हर्श हो रहा है। 
साथ ही साथ दुख हो रहा कि काश कुछ दिन वह और रहे होते तो विभिन्न क्षेत्रों में हम सब का 
और मार्ग दर्शन व विकाश होता।
आप एक कुशल व्यवसायिक व्यक्ति थे आप के इस क्षेत्र में काम देखकर हमें जमशेद जी टाटा जी 
की जोवनी याद हो रही है उन्होंने अपने कामगारों को अपना परिवार माना उनके सुख दुख में 
उनके साथ रहे, यही गुण उनको देश का सर्वोच्च उद्योगपति बनाया. आप भी महामानव को तरह 
अपने कामगारो से मिलकर अपना व्यवसाय ही नहीं बल्कि परिवार बनाकर प्रगति के पथ पर चलते रहे। सामाजिक कार्यो में तो आप का अतुलनीय गुण रहा है, जाति धर्म से हटकर आप में मानवधर्म का गुण था, आप मानवता आर न्याय के पथ के पथिक रहे। 

राजनैतिक क्षेत्र में आप में राजनीतिज्ञ तो नहीं थे, अपितु एक कुशल राजनीतिज्ञ परामर्शदाता के 
रूप में रहे, इसलिए माननीय स्व. मुलायम सिंह यादव आप पर विशेष भरोसा रखते थे, और 
आप को सलाह लेते थे, आप अक्सर माननीय स्व. मुलायम सिंह यादव जी से मिलने जाते हुए 
हमेशा मुझे साथ ले जाते थे, और खुलकर अपनी बात उनके सामने रखते थे।
मुझे आज यह कहते हुए अपार हर्श हो रहा है, कि एकबार माननीय स्व. मुलायम सिंह यादव 
राज्यसभा सदस्य बनाने के लिए सहर्ष स्वीकार कर बोले लल्लन पहले अपने मित्र सीताराम को
तैयार तो करो, हम तैयार है। लेकिन जब हम अपना व नेता जी का विचार आपके सामने रखा 
है नहीं, अपितु आप से निवेदन भी किया तो आपने तुरंत इनकार करते हुए यह कहा, कि आज 
हमें सबकुछ मिल गया, हमें नेता नहीं बनना है, केवल एक मित्र की परिभाषा जानता हूँ उसी का े 
निभा रहा हूॅं, और आप अन्तिम समय तक उसे निभाए, इसीलिए आप की बिमारी को सूचना 
मिलते ही नेता जी आप से मिलने आप के निवास भिवंडी पर आए। 
इन सब गुणों का कारण आपका आध्यात्मिक ज्ञान था, आप सदैव अपने ऊपर ईश्वर का आशीर्वाद 
मानते थे। आप में दिखावा नहीं बल्कि वास्तविकता थी, इन्हीं गुणों के कारण सन् 1982 से अंत 
तक मैं एक मित्र को भाँति आप के सानिध्य में रहा।
अंत में यह कहना चाहता हूॅं कि आप मेर े मागदर्शक, अभिभावक ही नहीं वल्कि एक मित्र की 
भाँति सदैव मेरे मन-मस्तिष्क व हृदय में विराजमान रहें। इन्हीं स्मृतिया के साथ आपको कोटिषः 
बार सादर नमन व प्रणाम “ईश्वर आप को अपन शरण में स्थान दिए है, यह मेरा विश्वास है। 

ओम शांति-शांति’

-लल्लन कुमार यादव 
शास्त्री नगर जोग ेष्वरी मुंब

Thursday, November 17, 2022

श्री सीताराम यादव (सेठजी) के 10वीं परिनिर्वाण दिवस :

 श्री सीताराम यादव (सेठ जी) के 10 वीं परिनिर्वाण दिवस :
पर उनको विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ। 
- भागीरथ यादव




वैसे तो सेठ जी के व्यसायिक सामाजिक एवं राजनैतिक जीवन के वारे में आप सभी भली-भाँति परिचित है’ मैं इस अवसर पर आप सबसे अपने बचपन की कुछ यादें साझा करना चाहता हूं।

श्री सीताराम यादव (सेठ जी) ग्राम रमदेइया, पो० कोल्हुआ, तहसील : बदलापुर, जिला : जौनपुर के मूल निवासी थे। उम्र मे वह हमसे बहुत बड़े थे। सेठ जी से मेरा वचपन से सम्पर्क का कारण था कि सेठजी की वहन की शादी मेरे चचेरे बड़े भाई श्री हरगेन यादव के साथ हुई थी जिसकी वजह से वह हमारे घर आते थे और उनके मिलनसार सरल स्वभाव के कारण हमलोग उनसे घुल-मिल गए थे। उन दिनों मैं उनसे उम्र में बहुत छोटा था प्राइमरी पाठशाला मे पढ़ता था साथ सेठ जी इतने सरल हृदय थे कि हमलोग उनसे इतने घुल-मिल कर बात-चीत करते थे। उम्र का कोई वन्धन नही होता था, वह भी बालक जैसा हम लोगो के साथ व्यवहार करते थे । चूंकि रिश्ते में वह साले (मेरी बड़ी भाभी जी के भाई) लगते थे अतः ग्रामीण परिवेश की परम्परानुसार गाली, हंसी-मजाक मस्ती हुआ करती थी और मैं उनको साला कहकर हंसी-मजाक किया करता था और वह भी उसी तरह मस्ती कि प्रकृति से व्यवहार करते थे। 

सेठ जी की माता जी का उल्लेख करना उचित है वह बड़ी दूरदर्शी एवं श्रद्धालु प्रकृति की वात्सल्यमयी मां थीं। जिनके स्नेह के कारण मैं अक्सर उनके घर जाया करता था. और माताजी वडा लाड़-प्यार बड़े दुलार के साथ अच्छा -अच्छा भोजन, दूध-दही और मेरा खास पसन्द का जमौआ (दूध से सजाब दही जो मिट्टी के वर्तन (कछरी) में गोबर के सूखे उपले की धीमी-धीमी आच पर जमाया जाता है। खिलाती थी साथ ही सेठ जी के छोटे भाई श्री राजाराम एवं श्री मुनिराज जो हमउम्र है उनके साथ खेलना एवं सई नदी मे नहाता एवं मस्ती करता था। जिसके कारण उनके यहाँ कई दिनो तक रुकने का मन करता था और रुकता भी था। साथ ही सेठजी के घर के पास कल्याणपुर गांव में मेरे मामा जी का भी घर है। अतः बराबर उनके गांव आना जाना लगा रहता है। इस प्रकार का सिलसिला जब तक मैं हाई स्कूल (कक्षा 10 तक) मे था तब तक चलता रहा, इसके बाद आगे की पढ़ाई के लिए वर्ष 1960 मे जौनपुर शहर के वी.आर.पी - इमिडिएट कालेज बाद मे. टी.डी. कालेज से वी० काम० करने के बाद इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एम० काम० की पढ़ाई में व्यस्तता के कारण उनके गांव जाने का क्रम कम हो गया तथा सेठ जी अपने व्यवसाय प्रसार के में व्यस्त हो गए अतः मुलाकात नहीं हो पाया, करती थी।

मैं एम० काम० परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद मुम्बई 1966 में गया और पुनः उनके सम्पर्क मे आ गया तब भी हम लोगो का व्यवहार वयस्क न होकर वाल्यकाल जैसा ही वही गाली, हंसी-मजाक, मस्ती वाला ही होता था।

समय बदलता गया मै मुंम्बई विश्वविद्यालय के गवर्नमेन्ट ला कालेज में एल. एल. बी. एवं एलएलएम करने के बाद आगे की पढ़ाई के लिए वर्ष 1971 अमेरिका (न्ै।) चला आया और यहीं पर सेटिल हो गया हूँ परन्तु जब भी भारत (प्दकपं) आता था सेठजी से अवश्य मिलता था। 

मुझे एक वाकया याद है, जब मैं भारत गया था सेठ जी  मुझे अपने साथ लेकर अपने निवास स्थान भिवण्डी (मुम्बई) अपनी कार से जा रहे थे. रास्ते मे एक अस्पताल के पास रुके और बोले कि चलिए एक सज्जन से मुलाकात करवाते हैं जो समाज के प्रतिष्ठित एवं यादव महासभा (मुम्बई) के अध्यक्ष तथा नगर सेवक भी थे. मै उत्सुकतावश पूछा । उन महानुभाव को क्या हो गया है जो अस्पताल मे मिलने जा रहे हैं तब उन्होंने बताया कि उन्हें गोली लग गयी है, मै चिन्तित मन से उनके साथ उन महानुभाव से मिलने गया, वहाँ पर सेठ जी ने मेरा परिचय उनसे कराया और उनका भी परिचय मुझसे कराया और उनका नाम श्री श्यामनारायण यादव बताया जो कि आजमगढ़ जनपद उत्तर प्रदेश के मूल निवासी थे और वाद में वह वहाँ (सगड़ी-आजमगढ़) से विधायक भी चुने गऐ। तो ऐसे सरल स्वभाव, स्नेहिल तथा सबके हितैषी थे सेठ जी. कालान्तर में सेठ जी की मध्यस्थता में ही मेरे छोटे पुत्र मनदीप यादव का विवाह श्री श्यामनारायण जी की पुत्री श्रीमती विद्या यादव की पुत्री डा0 प्रियंका सिंह यादव के साथ हुआ और हम लोग आपस में सम्वन्धी हो गये।

एक प्रसंग और आया जब सेठ जी से को अतिप्रसन्नृतम हुई थी। यह वर्ष 1990 का वाकया है, मेरे बचपन से गवर्नमेन्ट ला कालेज मुम्बई तक सहपाठी रहे है, संयोग से अका नाम भी सीताराम यादव है जो मेरे गाँव के समीप फत्तूपुर के निवासी हैं और भारतीय स्टेट बैंक में मुख्य प्रवन्धक पद से रिटायर हुए है उनकी सुपुत्री सुमन यादव - के विवाह मे सम्मिलत होने अमेरिका से भारत (इलाहाबाद) आया था, मुझे प्रसन्नता इस बात से भी अधिक थी कि मेरे सहपाठी की सुपुत्री का विवाह सेठ जी के ज्येष्ठ पुत्र श्री अजय यादव जी के साथ हो रहा था। वहां पर सेठ जी से  मुलाकात उसी वाल्यावस्था के लहजे में हुई कुछ उन्होने उस भीड़-भाड़ के माहौल में भी वह वाल्यकाल की सरल व्यवहारिकता गाँव की नही छोड़ी यह दृश्य देख सुनकर सभी लोग दंग रह गए और वाद मे उसी हंसी मजाक मे सहभागी बनें।

चूंकि मेरा और सेठ जी का वचपन का सम्बन्धा रहा है और मुझे यह गर्व है कि सेठजी इतने महान व्यवसायी, सामाजिक प्रतिष्ठित हुए भी हमारे वचपन के क्रिया कलापों को नही भूले थे  और उसे जीवन पर्यन्त जीवंत बनाये रखे। उस

पुनः अपने अविस्मरणीय वाल्यकाल की स्मृतियो को ताजा करते हुए उनको विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ।



 

भागीरथ यादव,
अमेरिका

निष्काम कर्मयोगी : श्री सीता राम यादव सेठ जी का सामजिक एवं राजनैतिक दृष्टिकोण

 निष्काम कर्मयोगी 

श्री सीता राम यादव सेठ जी का सामजिक एवं राजनैतिक दृष्टिकोण  (VISION)



- सीताराम यादव 
मैनेजर (सेवानिवृत्त) भारतीय स्टेट बैंक आफ़ इण्डिया 

आज परम आदरणीय श्री सीताराम यादव (सेठ जी) के 10वेंॅ परिनिर्वाण दिवस पर भावभीनी श्रद्धांजलि।
श्री सीता राम सेठ जी के सरल स्वभाव, कर्मठता, सहज मिलनसारिता एवं उनके बहुआयामी व्यक्तित्व से तो आप सभी भलिभांति परचित है फिर भी उनके बहुआयामी व्यक्तित्व में से उनके सामाजिक एवं राजनैतिक दृष्टिकोण (टपेपवद) के कुछ संसमरण को आप सब से साझा करना चाहता हूँ।
समाज में व्याप्त अंधविष्वास, अवैज्ञानिक रीति-रिवाजों के अंधानुकरण जातिगत एवं उपजातिगत प्रतिद्वन्दिता आर्थिक असमानता तथा अशिक्षा, असंगठन आदि सामाजिक कमजोरियों से उनका हृदय अत्यन्त व्यथित रहता था वह सदैव उसमे सुधार करने के 

परंतु आपसी प्रतिद्वंद्विता एवं अशिक्षा के कारण दो भागों में विभाजित थी जिसके एकीकरण के लिए सेठ जी काफी प्रयत्नशील थे समाज के सभी वर्गों को एकत्रित कर जगह-जगह गोश्ठिया एवं सभाएं कर लोगों को संगठित होकर एक साथ चलने का आवाहन करते थे। इस प्रकार निरंतर प्रयत्न करने पर मुंबई यादव महासभा के दोनों धड़ों का एकीकरण कराया और उसका प्रसार एवं पोषण करते रहे। उनके सरल व्यक्तित्व में ऐसा आकर्षण था एवं वाकपटुता थी कि उनको सभी लोग ध्यान से सुनते और समझते मानते और उनके कार्यों का समर्थन करते। थे परिणाम स्वरूप संगठन के साथ ही मुंबई नगर में कई शिक्षण संस्थान बनाया गया और यादव भवन के लिए जमीन की भी व्यवस्था की गई। इसी प्रकार अखिल भारतीय यादव महासभा का भी प्रसार करने में भी उनकी बड़ी भूमिका रही। यद्यपि यादव महासभा उत्तर भारत के हिंदी भाषी क्षेत्र में काफी सक्रिय थी।
 
परंतु दक्षिण भारत तक प्रसारित करने में सेठ जी की सराहनीय भूमिका रही है उसका परिणाम यह हुआ कि तमिलनाडु मद्रास के श्री डी.नागिन्द्रन जी को अखिल भारतवर्शीय यादव महासभा के अध्यक्ष निर्वाचित हुए। इसी संदर्भ में मुझे वर्ष 2000 में अखिल भारतीय यादव महासभा के तिरुपति अधिवेशन में सेठ जी की प्रेरणा से सम्मिलित होने का अवसर प्राप्त हुआ 2 दिन पहले ही में अमेरिका से भारत आया था और श्री सेठ जी के भिवंडी मुंबई आवास पर ठहरा था। उस अधिवेशन में उनके साथ मेरे अतिरिक्त श्री श्याम नारायण यादव नगरसेवक मुंबई एवं मुंबई यादव महासभा के अध्यक्ष बाद में सगड़ी आजमगढ़ से विधायक, श्री राम उजागीर यादव मुंबई नगर के नवोदित उद्योगपति एवं चार अन्य संभ्रांत व्यक्ति एक साथ ट्रेन द्वारा तिरुपति गए। दक्षिण भारत का यह सर्वप्रथम पहला अखिल भारतीय यादव महासभा का ऐतिहासिक अधिवेशन था। जिसमें समाज के अधीकांष लोग सम्मिलित हुए थे समाज के कई दिग्गज राजनेता विधायक सांसद मंत्री एवं गणमान्य हस्तियों की उपस्थिति थी जैसे श्री श्याम लाल यादव उपसभापति राज्यसभा भी इस प्रकार सुधार एवं सामाजिक संगठन की बात करते और अन्य सब जातियों के साथ मिलकर रहने एवं आगे बढ़ने के लिए भी प्रेरित करते तथा उनको यथा सम्भव आर्थिक सहायता भी करते थे, इसी क्रम मे मुझे स्मरा है कि वर्ष 1964 में बी.काम. परीक्षा उत्तीर्ण कर रोजी-रोटी (नौकरी) की खोज में मुम्बई गया वहां पर समाज के लोगों से मुलाकात हुई वैसे सेठ जी के संबंध में मेरी जानकारी पहले से थी। परंतु मुंबई प्रवास में उनके निकट आने का भी सौभाग्य हुआ तब मैंने पाया की मुंबई यादव महासभा थी
बारे में जिक्र करते थे सभी शोषित समाज के लोगो में व्याप्त कुरीतियों एवं अशिक्षा के संबंध में समझाते थे और सबको आपस मे संगठित व शिक्षित होकर अपने अधिकारो के प्रति जागरूक रहने का संदेश देने के साथ-साथ उनके सगठन की स्थापना एवं उसका पोषण भी किया करते थे, यही नहीं कि यादव समाज के लिए कार्य करते थे बल्कि सभी पिछड़ी अनुसूचित एवं अनुसूचित जनजातियों एवं मुस्लिम विरादरी के लोगों के लिए
भारत सरकार, न्यायमूर्ति श्री बनवारी लाल यादव एक्टिंग चीफ जस्टिस पटना हाई कोर्ट, श्री लालू प्रसाद यादव मुख्यमंत्री बिहार सरकार, श्रीमती कांति सिंह सांसद इसके अलावा तमिलनाडु केरल आंध्र प्रदेश एवं कर्नाटक के गणमान्य राजनेता मंत्री विधायक एवं सांसद तथा उसी समय हैदराबाद हाई कोर्ट में नियुक्त जस्टिस एक महिला नाम में भूल गया हूं उपस्थित हुए। यह अधिवेशन 2 दिन तक चला जिसमें समाज के शैक्षिक राजनीतिक एवं आर्थिक उत्थान के लिए अनेकों प्रस्ताव पारित किए गए। दक्षिण भारत के बालक बालिकाओं द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम भी रात भर चला वहां के लोगों का प्रबंध एवं उत्साह बड़ा ही सराहनीय था। 
विभिन्न पारित प्रस्ताव में एक अति महत्वपूर्ण प्रस्ताव को पारित किया गया उसका उल्लेख करना मैं उचित समझता हूं जैसा कि हम सब जानते हैं कि उत्तर भारत के समाज ने अपना एक सर्वमान्य सरनेम टाइटल यादव रखा है जिससे समाज के सभी लोगों को जाति बोध हो जाता है परंतु ऐसा दक्षिण भारत के समाज में कोई सर्वमान्य सरनेम नहीं है वहां विभिन्न प्रकार के सरनेम टाइटल रखे हुए है। इसलिए इस विषय पर विस्तृत चर्चा हुई कि समाज के सभी लोग यादव सरनेम रखें परंतु यह व्यवहारिक रूप से होना संभव नहीं था क्योंकि ऐसा करने से नाम परिवर्तन की अनेकों विधिक कार्यवाही करनी पड़ती तथा सभी इस बात पर एकमत थे कि यादव कामन टाइटल ही रखा जाए। सर्वसम्मति यह प्रस्ताव पारित किया गया कि समाज के सभी लोग अपने नवजात बच्चों का एक समान ‘‘यादव’’ टाईटल रखेंगे जिससे आगे चलकर उनकी भी पहचान आसान हो सके ऐसा सब करने में सेठ जी के सराहनीय सहयोग से ही संभव हो सका।
श्री सेठ जी अखिल भारतीय स्तर पर संगठन के प्रचार प्रसार करने के साथ-साथ प्रदेश स्तर पर भी संगठन को मजबूत करने में वह महत्वपूर्ण योगदान किए अपने मूल जनपद जौनपुर, उत्तर प्रदेश में भी संगठन कई गुटों में बटा हुआ था। उनके आपसी मतभेद समाप्त कर एकजुट करने में उनकी भूमिका सराहनीय है। इसी प्रकार जौनपुर जनपद के आसपास अन्य जनपदों में दौरा करके लोगों को एक बैनर के नीचे लाने एवं एकत्रित कर संगठित करने का काम किए। तमाम उप जातीय ग्रुपों में बटे हुए लोगों में एक सूत्र में पिरोने का काम भी उन्होंने किया। आपसी प्रेम सौहार्द एवं उपजातियों में आपसी शादी विवाह का प्रचलन कराया।
श्री सेठ जी के ही प्रयास से जौनपुर शहर में यादव छात्रावास के निर्माण हेतु श्री राम दास यादव एडवोकेट, श्री दया शंकर यादव एडवोकेट, श्री लक्ष्मी शंकर यादव मंत्री उत्तर प्रदेश सरकार एवं अन्य संभ्रांत यादव बंधुओं के देखरेख में जमीन क्रय किया गया है परंतु किन्ही कारणों से अभी तक उस जमीन पर कोई निर्माण नहीं हो सका है जबकि ऊपर नामित सभी सदस्यों का निधन हो चुका है इस कारणवश भी निर्माण लंबित हो गया है। आशा है कि उनके उत्तराधिकारी छात्रावास भवन निर्माण कार्य पूरा करने में सहयोग करेंगे।
 
श्री सीताराम सेठ जी कमजोर वर्ग के बच्चों की शिक्षा चिकित्सा एवं कन्याओं के विवाह आदि के लिए यथोचित आर्थिक सहायता भी किया करते थे। ऐसे कार्यों के लिए उनका मानना था कि अगर दाहिना हाथ दान करता है तो बायें हाथ तक को भी पता नहीं चलना चाहिए। इस प्रकार की सहायता का प्रचार नहीं होना चाहिए कदाचित उनके जीवन काल में मैं इस प्रकार लिखने का साहस करता तो वह बिल्कुल ही असहमत होते और मैं ऐसा नहीं लिख पाता।

उनका मानना था कि सामाजिक चेतना के साथ-साथ राजनैतिक चेतना भी होनी चाहिए बिना राजनैतिक आधार के समाज का कल्याण इतना अच्छा नहीं हो सकता जितना होना चाहिए। इसको ध्यान में रखते हुए राजनीति में भी यथोचित उनकी उपस्थिति रहती थी वह राजनीति के प्रारंभिक समय में कांग्रेस पार्टी भिवंडी मुंबई का सक्रिय नेतृत्व किया करते थे। भिवंडी नगर के वह ऑनरेरी मजिस्ट भी नियुक्त किए गए थे और इस सम्मानित पाद पर काफी समय तक आसीन थे। उसके पश्चात चौधरी चरण सिंह की भारतीय क्रांति दल बीकेडी की स्थापना में भी सेठ जी सक्रिय भूमिका रही। बाद में माननीय मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व समाजवादी पार्टी की स्थापना में उनकी सक्रिय भूमिका रही समाजवादी पार्टी के स्थापना में उनकी सक्रिय भूमिका रही समाजवादी पार्टी के शीर्ष सदस्यों में उनका नाम अंकित है। 
 
सेठ जी समाजवादी पार्टी की केंद्रीय एक्जक्यूटीव कमेटी के आजीवन सदस्य रहे। श्री मुलायम सिंह यादव जी जब भी मुंबई जाते वह सेठ जी के निवास पर अवश्य जाया करते थे। इसी प्रकार वह अपने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री काल एवं अन्य अवसरों पर सेठ जी के पैतृक आवास ग्राम रमदेईया जौनपुर जाया करते थे। वह सेठ जी का बड़ा आदर सम्मान करते थे और उनके सुझावों को मनोयोग से सुनते एवं उस पर समुचित कार्यवाही करते । श्री मुलायम सिंह यादव से बिना समय लिए जब भी सेठ जी चाहते थे मिल सकते थे कोई रोक टोक नहीं थी। जब सेठ जी श्री मुलायम सिंह यादव जी से मिलते तो वे अपने प्राइवेट कक्ष में वार्तालाप करते थे। श्री सेठ जी हमेषा सामाजिक उत्थान एवं संगठन का कार्य निष्काम भाव से करते थे । वह समाज के किसी संगठन या संस्थान में कोई पद नहीं लेते थे बल्कि अन्य सुयोग्य व्यक्ति को उत्तरदायित्व देते और उसका सहयोग एवं संरक्षण करते, ऐसे निष्काम कर्मवीर थे सेठ जी।
श्री सेठ जी के सामाजिक एवं राजनीतिक उत्थान एवं संगठनात्मक अनेक प्रयासों का उल्लेख करना सूरज को दिया दिखाने जैसा है वह समाज के सभी कमजोर एवं उपेक्षितों के कल्याण एवं उत्थान के मसीहा थे।
 

लेखक - सीताराम यादव 
मैनेजर (सेवानिवृत्त) भारतीय स्टेट बैंक आफ़ इण्डिया 
के साथ सेठ जी के समधी हैं सेठ जी के बड़े पुत्र श्री अजय यादव से इनकी बेटी श्रीमती सुमन यादव का विवाह हुआ है। यह उस परिवार में नाना जी के नाम से ही पुकारे जाते हैं।



Thursday, August 25, 2022

साक्षात्कार ; प्रोफेसर उदय प्रताप सिंह यादव

श्री सीताराम यादव सेठ जी के व्यक्तित्व पर 
श्री प्रोफेसर उदय प्रताप सिंह यादव से डा लाल रत्नाकर की बातचीत : 

(जैसा की आप जानते हैं सेठ श्री सीता राम जी जौनपुर जिले के एक गांव रमदेईया से  निकलकर मुंबई गए उन्होंने वहां जाकर आर्थिक सामाजिक एवं राजनितिक क्षेत्र में उन्होंने काफी प्रतिष्ठा और सम्मान के साथ ही उन्होंने अनेक क्षेत्रों में लोगों को सहयोग किये, आने वाली पीढ़ी के लिए उनके संघर्ष को एक ग्रन्थ निकालने की योजना है जिसमे इस बातचीत को सम्मिलित करना है। )

साक्षात्कार ;

उन्होंने धन कमाया भी और परहित में लगाया भी - प्रो.उदय प्रताप सिंह
   
प्रो.उदय प्रताप सिंह,  अंर्तराष्ट््रीय कवि, साहित्यकार, पूर्व सांसद राज्य सभा, पूर्व अध्यक्ष उ.प्र. हिन्ी संस्थान एवं समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव के गुरू। 
डा.लाल रत्नाकर द्वारा श्री सीताराम सेठ के सम्बन्ध में लिया गया साक्षात्कार।

प्रश्न.1. जैसा कि आप भलीभांति जानते हैं कि श्री सीताराम जी गांव से निकले बॉम्बे गये और चूंकि हमलोग बच्चे थे, छोटे छोटे थे उनको देखते थे। उदाहरण दिया जाता था कि कैसे उन्होंने सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक क्षेत्र में एक महानगर अपना विस्तार किए। इनके सम्बन्ध में अपना विचार बताने का कष्ट करें? 

उत्तर : देखिए सीताराम जी, उन्हें लोग सेठ कहते थे पर वह यादव थे और उनके बेटे जो अजय यादव हैं उनसे भी मेरा बहुत अच्छा सम्बन्ध है। मैं चौधरी हरमोहन सिंह जी के साथ उनके मुम्बई वाले मकान में कई बार गया और उनसे मिला है। उनकी सज्जनता तो अपनी जगह थी ही और बहुत से पैसे वाले लोगों में घमण्ड होता है और दूसरे जो पैसे वाले लोग होते हैं वो अपने ऊपर खर्च करने को खर्चे मानते हैं और दूसरे पर खर्च को फिजूलर्खी मानते हैं। उनका बिल्कुल उल्टा मामला था। उन्होंने धन कमाया भी और परहित में लगाया भी। 

‘‘चार दिन की जिन्दगी खुद को जिये तो क्या जिये
बात तो तब है कि जब मर जाए औरों के लिए।’’

और यही मैं कहा करता हूं कि आदमी की सकल कैसी थी सूरत कैसी थी मकान कैसा था यह याद नहीं रखा जाएगा। आदमी का मूल्यांकन होगा उसने समाज को क्या दिया यह याद रखा जाएगा, मेरी एक कविता में मिलेगा। 

‘‘जितना तुम दोगे समय उतना संवारेगा तुम्हें
पूरे उपवन में पवन कंधो पर ढ़ोएगा तुम्हें।
चांदनी अपने दुशाले में सुलाएगी तुम्हें।
ओस मुक्ताहार सोते में पहनाएगी तुम्हें
धूप अपनी उँगलियों से गुदगुदाएगी तुम्हें
तितलियों की रेशमी सिहरन जगाएगी तुम्हें
टूटे मन वाले कलेजे से लगाएंगे तुम्हें
और मंदिरों के देवता सिर पर चढ़ाएंगे तुम्हें।’’

जो किसी समाज के काम नहीं आता उसका बड़ा होना क्या बड़ा ?

बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर
पक्षी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर

 तो सीताराम जी से जब भी मैं संपर्क में आया हूं तो अगर उनसे एक घंटे बात हुई है तो एक घण्टे में पैतालीस मिनट परहित की बात की है। तो उसमें उन्होंने कैसे लोगों का आगे बढ़ाया है कैसे शिक्षा का विकास में क्या क्या किया कैसे लोगों को पढ़ाया? कैसे स्कूल व संस्थाएं बनायी ? ये उनका बड़प्पन था और मैं हमेशा उनका प्रशंसक रहा हूं। हम और चौधरी साहब जब उनके बंगले पर जाते थे तो उनकी जो खातिरदारी शुरु हाती थी उनमें जो सेवा भाव था वो भी अद्भुत था, वे चिंतित रहते थे, क्या खायेंगे कैसे रहेंगे उनको यह लगता था हालांकि हम दोनों बहुत सिंपल खाना खाने वाले सादा रहने वाले थे। 
आज हम उनको अपनी श्रद्धांजलि देते हैं और उनके परिवार की खुशहाली के लिए भगवान से प्रार्थना करते हैं और आपको बहुत बहुत धन्यवाद देते हैं कि आपने बड़ी मधुर स्मृति की याद दिलायी।

प्रश्न : दो : एक बात और कि श्री मुलायम सिंह यादव (नेता जी) अक्सर उनके घर जाते रहे हैं तथा समाजवादी पार्टी मे श्री सीताराम यादव जी की भूमिका पर आपकी राय?

नेता जी को उन्होंने बहुत मदद दिया हर तरह से। यह मुझे पता है और ये मेरी जानकारी में है। पर आपने जो कहा उनका प्रभाव यूपी और आसपास के लोगों में और उससे आगे भी था। वो उससे आगे भी गए और आर्थिक मदद भी की उनके परिवार का बड़ा योगदान रहा समाजवादी पार्टी के गठन में उनको महत्वपूर्ण भूमिका रही है, पार्टी संगठन में संस्थापक सदस्य के साथ साथ केन्द्रीय कार्यकारिणी के सदस्य भी थे। साथ ही साथ संरक्षक के रूप मे उनका योगदान तो था ही और उन्हीं की प्रेरणा से नेता जी ने उनके पुत्र अजय यादव को महाराष्ट््र में अहम जिम्मेदारी दी। 2004 में जौनपुर की लोक सभा का टिकट भी दिए।
उस परिवार का बड़ा योगदान है।


प्रश्न : तीन : आध्यात्मिक रूप से वह गड़वा घाट आश्रम जो संतमत परम्परा का केन्द्र है से जुड़े रहे और मुम्बई आश्रम के संस्थापक तथा व्यवस्थापक मंडल के आजीवन अध्यक्ष रहे। इसके विषय मे आपकी राय।

मैं ये जानता हूं कि ये जो कबीर की विचारधारा है उस पर चलने वाले लोग ही समाज का कल्याण करेंगे। कबीर ने सबसे पहले हिन्दू मुसलमान से ये कहा कि एक दूसरे की बुराई करने से कुछ नहीं होगा। हमारा बड़ा दुर्भाग्य है कि हमको बचपन से ही यह पढ़ाया जाता रहा है आप तो खुद प्रोफेसर रहे हैं -

‘‘सूर, सूर, तुलसी शशि उडगन केशवदास,
अब के कवि खद्योतसम जंह तंह करत प्रकाश।’’

अब कबीर का कोई नाम नहीं लेता। जबकि तुलसीदास और सूरदास दोनों से कबीर सीनियर थे वह उम्र में भी लगभग 150 - 200 वर्ष पहले हुए होंगे। कबीर लगभग 1300 ई0 और अन्य 1500 ई0 के बाद हुए। ये लोग अकबर के जमाने में करीब डेढ़ दो सौ साल बाद हुए।  और क्षमा करिएगा जायसी का पद्मावत न लिखा जाता तो रामचरित मानस की जो रूपरेखा है वो नहीं बन पाती। वो बिल्कुल पद्मावत के ही अनुरूप उन्होने वही भाषा है, वही चौपाई, वही सोरठा, वही दोहे अपनाए। इस बात पर बनारस के जो ब्राह्मण थे उन्होंने तुलसीदास की रामायण को शुरू में रिजेक्ट कर दिया था। कहा कि यह जुलाहे की नक़ल है और ये राम का गुणगान करता है, क्षत्रिय है और ब्राह्मणों का विरोध करता है तब तुलसीदास ने एक छन्द लिखा है। तुलसी ने लिखा है कि : 

‘‘धूत कहो अवधूत कहो रजपूत कहो या जुलाहा कहो कोई।
कहू की बेटी से बेटा न ब्याहू काहू की जाति बिगाड्यो न कोई
तुलसी सरनाम है राम गुलाम के जाके रूचै कहै सब कोई।
मांग के खायो मसजीद में सोयो लेवो को एक न देवै को दोऊ।’’

तुलसी पर कबीर का भी प्रभाव पड़ा है तभी तुलसी ने लिखा है-

‘‘बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना। कर बिनु करम करइ बिधि नाना
आनन रहित सकल रस भोगी। बिनु बानी बकता बड़ जोगी।।’’

वह (ब्रह्म) बिना ही पैर के चलता है, बिना ही कान के सुनता है, बिना ही हाथ के नाना प्रकार के काम करता है, बिना मुँह (जिह्वा) के ही सारे (छहों) रसों का आनंद लेता है और बिना वाणी के बहुत योग्य वक्ता है।

कबीर और जायसी का प्रभाव था तभी यह लिखा। क्योंकि वह हिन्दू नहीं थे और पंण्डित नहीं थे इसलिए उनका नाम ही नहीं लिया। तभी तो लिखा गया है कि-

‘‘सूर, सूर, तुलसी शशि उडगन केशवदास,
अब के कवि खद्योतसम जंह तंह करत प्रकाश।’’

इसलिए मैं यह कहना चाहता हूं कि कबीर पंथ देश के लिए सर्वोत्तम है। क्योंकि इस देश के अंदर जो साम्प्रदायिक सौहार्द बनाया है वो कबीर ने पैदा किया है। कबीर को मैं सबसे बड़ा समाजवादी मानता हूं। क्योंकि उन्होंने किसी में कोई भी भेद नहीं किया। उन्होंने पैसे का विरोध किया। उन्होंने पाखण्ड का विरोध किया कभी भी उन्होंने चरखा बंद नहीं किया। इतने बड़े कवि होते हुए वह जुलाहा का काम करते रहते थे। वह तानाबाना बुनते रहते थे आनंद करते थे।

सर आप जानते हैं कि वह भिमंडी में रहते थे और वहां पर अधिकांश आबादी मुस्लिम की है, लेकिन कभी भी वहां पर किसी भी तरह का भेदभाव नहीं हुया और अन्यत्र बहुत सारे दंगे इत्यादि हुए वहां कभी इस तरह का कुछ नहीं हुआ।

मैं भिवंडी गया हूं जब अबू आजमी यहां से चुनाव लड़े तब मैं उनके प्रचार में वहां गया था और उस समय मुझे जानकारी हुई कि यहां पर मुस्लिम आबादी बहुतायत में है और लोगों से बहुत आपसी सौहार्द है और इसके लिए श्री सीताराम यादव जी को भी श्रेय जाता है और इसी रास्ते पर अजय यादव भी वहां काम कर रहे हैं।


-डा लाल रत्नाकर


Wednesday, June 1, 2022

श्री सीताराम यादव जी पर एक पुस्तक का प्रकाशन





 मान्यवर
आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि हमारे कुछ साथियों ने स्मृतिशेष मेरे पिताजी श्री सीताराम यादव जी पर एक पुस्तक का प्रकाशन करना चाहते हैं।
इस पर पिछले दिनों से काम होना था लेकिन समय के साथ जिस तरह की वैश्विक व्याधा छा गई थी उसके कारण इस कार्य में विलंब हो गया है।
आपका उनके साथ लंबा साथ रहा है उनके बारे में आपके संस्मरण बहुत महत्व रखते हैं मैं चाहता हूं कि आपके संस्मरण इस पुस्तक में अवश्य शामिल हो पूरा विश्वास है कि आप समय निकाल करके उनके साथ जुड़ी अपनी स्मृतियों को मुझे प्रेषित करने का कष्ट करेंगे जिससे इस कार्य को यथाशीघ्र पूरा किया जा सके।
आपसे अनुरोध है कि आप इसे लिखित रूप में या टाइप किए हुए फार्म में मुझे मेरे मेल पर प्रेषित कर सकते हैं अथवा मेरे द्वारा दिए जा रहे डाक के पते पर भेज सकते हैं।
इस पुस्तक के प्रकाशन में उनके चित्रों की भी जरूरत है यदि आपके पास इस तरह का कोई चित्र है तो उसे प्रेषित करने का कष्ट करें।
मेरा विश्वास है कि यथाशीघ्र आप हमारे द्वारा मांगी गई सूचनाएं उपलब्ध कराने का कष्ट करेंगे।
सादर
आपका
अजय कुमार यादव
भिवंडी मुंबई।




मैं आश्चर्यचकित रहा

  उनकी सरलता देखकर मैं आश्चर्यचकित रहा  - डा.रामयश यादव  सबसे पहले माननीय सीताराम सेठ जी को सादर नमन करता हूँ। और इनके विषय में मैं बताना चा...