Wednesday, January 11, 2023

मैं आश्चर्यचकित रहा

 


उनकी सरलता देखकर मैं आश्चर्यचकित रहा 
- डा.रामयश यादव


 सबसे पहले माननीय सीताराम सेठ जी को सादर नमन करता हूँ। और इनके विषय में मैं बताना चाहता हूँ जब मैं कोल्हुआं बाजार में प्रैक्टिस करने के आया तो मैं यह सुना कि मानी सेठ जी बिज़नेस और भीमंडी के बहुत बड़े उद्योगपति है और बहुत अच्छे पैमाने पर है मैं सोचता था मैं उनसे अगर मुलाकात करता हूँ पता नहीं मुझसे बात होगी, हो पाएगी या नहीं, यह सोचकर मैं घर रमदेईया गया और उनकी सरलता देखकर मैं आश्चर्यचकित रहा और मैं उनसे बताया मैं डा.रामयष यादव हूँ आपकी बाजार में एक छोटा सा क्लिनीक खोलकर रहना रहना चाहता हूँ।इसके बाद मेरी भावनाओं को भांपते हुए उन्होंने कहा कि चलिए अब मैं आशीर्वाद देता हूँ। क्या आप अच्छे डॉक्टर हो करके सामाजिक होकर के यहाँ उभरेंगे?दूसरी बार मैं फिर उनसे मिलने गया मेरा।सेलेक्शन सरकारी सर्विस में हो गया था।इस संगठन।में।तो उसके बाद वो कहे की सरकारी शरीर आप सबको बड़ा नहीं बना पाएगी। आप में ही रहिये और आप यहाँ सबसे अच्छे आदमी हो जाओगे।अब कुल्लू में ही रहिए।यह सब उनका जिसतरह से भगवान का आशीर्वाद हो उस तरह सार्थक रहा मेरे पति और मैं अपनी क्लीनिक और यहाँ के।सवाल से संतुष्ट हो गया।यूँ तो मेरी व्यक्तिगत।भावनायें हैदूसरी परिचय में इतना।बढ़ गई।यहाँ कभी बाहर से आने पर वैसे यूपी से या भ्रमण करने के बाद कहीं भी अत्य थे तो मेरे यहाँ बैठती थी।फिर मुंबई से आते आने के बाद।वो घर से पैदल ही हमारे क्लिनिक तक पैदल चले आते थे, इतने सरल स्वभाव के थे की गाड़ी पर नहीं बैठते थे, पैदल लोगों से मिलते हुए आते।और यह?रुकना है और कहीं कहीं उनके कई कार्यक्रम यहाँ रुकने से स्थगित भी हो जाता था क्योंकि उनसे मिलने वाले बहुत ज्यादा आजाते थे।हमने उनको ये भी देखा है कि उनके पास मिलने वालों की संख्या गरीब से लेकर।गरीब से लेकर के बहुत ऊंची आदमियों तक की रही।ओवैसी से व्यक्ति रहे लगाते यहाँ रहे, मैं उनको जानने की पहचान नहीं पाता था। वहीं गाजीपुर, बनारस, बलिया, आजमगढ़, गोरखपुर इतने आदमी यहाँ आते रहते थे और तब हमारी भी इस तरह की नहीं थी एक छोटी सी स्टोरी उनके सामने एक कुर्सी बैठते थे और पता नहीं इतना मजमा लग जाता था कि भगवान कैसे लोग सुनते हुए यहाँ पहुँच जाते थे।बहुत ऊँचाई के आदमी आते थे।और।कभी कभी जब कही चले जाते थे रिश्ते में तो लोग एक सेठ जी घर पर है।तो मैं बताता था कि नहीं कहीं गए हैं कब आएँगे हुआ भाई देखिये आने के बाद यहाँ रुके ही जाते हैं अभी कैसे बताऊँ आयेंगे जरूर।उनकी वेटिंग कुछ देर बैठे रहते थे या घर चले जाते थे तो मैं बता देता था कितने आदमी आया से मिलने के लिए तो इस तरह से।उनका स्वभाव एक बड़ा आदमी हो करके इतना नरम था कि जनता उससे मिलने के लिए ये नहीं सोच पातीं की हमको शेर जी नहीं पहचानते हैं। वो तो ऐसे लगता था जैसे मानो सब को पहचान रहे हैं और आदमी संतुष्ट हो भी जाता था। तो यार मिस एक पहचान है।मैं उनकी बात थी।और।उनकी कुछ विशेष बातें मैं कहना चाहता हूँ।उनके साथ रहकर।कुछ।नहीं जान पाए। यह लिए उनकी विशेषता थी। जैसे कितनी मदद किसको कहाँ कर देते थे यह किसी को पता नहीं रहती थीं। ये जब जानकारी हो जाती है कि सेठ जी ने मदद किया है, लेकिन कभी किसी से यह नहीं बताते कि मैंने इनकी ये मदद की।यह उनकी विशेष बातें रहे।किसी की बिमारी में, किसी के बिज़नेस में हमने देखा उनके साथ राय।कब किसको क्या मदद करनी है, यह पता नहीं चलती।यह उनकी बहुत बड़ी बात थी। आज के दिन किसी कोई दे देता है। हमने तो उनको इतना दे दिया, यह मदद कर दिया।लेकिन वाणी सेठजी में ये आदत नहीं थी किसको क्या दिए?आपको आपके सामने पेश करता हूँ।माननीय सेठ जी, एक चुनाव यहाँ बहुत सी छोटे तबके के आदमी थे स्वर्गीय उमाशंकर यादव।जो इन शिक्षकों हमारे विधान सभा थी यहाँ से चुनाव लड़े थे?और मैं जानता हूँ कि एक अध्यापक से 10 ₹5000 उनकी तनख्वाह थी, उस चुनाव लड़ने लायक नहीं थी।जब उनका ये पता चली इनका चुनाव एक बहुत बड़े आदमी के साथ मुकाबला होने जा रहा है, जो सीताराम मिश्र के लड़के थे। क्या नाम विजय विजय नारायण पांडे?तो भारतीय जनता पार्टी से चुनाव लड़ रहे थे।उनके साथ से जब चुनाव में सबका हो गया, पर्चा भरा गया तो पता चली कि अरे उमा शंकर, पर्चा वापस के लिए तुम एक आदमी के सामने तो लड़ने जा रहे हो क्या? लड़ोगे?मेरे सामने की बात सही है। उमाशंकर से मान्य सर जी यही के।अरे भाई हो प्लेस मत हो, पैसे 100 ना हो तो टाटा सबको क्या?कुछ लड़ने?इतने ऊंचे विचार थे उनकी तुम चुनाव लड़े, पैसा जहाँ कम पड़ेगा, मैं देखूंगा।और उन्होंने पता नहीं कैसे क्या कर दिया। इतना जितनी भारी मत से कोई विधानसभा चुनाव से नहीं जीता।उनकी कीमत थी। इस तरह से उनके भाव ऐसे थे जिनके पर हाथ रख देते थे, ऊँचाई फरवरी था।और और।हो, इस तरह से उदाहरण यही रहे।और कभी कभी लखनऊ जाते थे। तुम उसको भी साथ ले लेते थे और उनकी यह बात रही जिसे सेठ जी जब लखनऊ जाते थे माननीय स्वर्गीय मुलायम सिंह यादव से मुलाकात करने के लिए तो वहाँ ये नहीं हमको लगा कि हम कहीं भी एक बीएपी करने जा रहे हैं।हम आपके लिए एकदम सारा दरवाजा खुला पहुंचते से बातचीत की। इसी घर में एक रिश्तेदार तरह से बैठ के बात होती थी और सेठजी उनको सलाह देते थे एक बात उनको बिगड़ गए कि इस तरह से कैसे राजनीति करोगे? तुम से 2 साल 3 साल में खत्म हो जाओगे तुम्हारा फ्रॉड से तुम ऐसे बोल रहे थे? अरे?सीताराम जी आप ऐसे बोल्ड है, मेरे साथ सोते और मेरी तरह होते तो सब मिल जाते हैं। तो दोनों में खूब एकदम झड़प भी हुई और ये कहे कि आपको राजनीति करना है। सवस्थ अपना ठीक रखें, इस तरह से डालोगे तो अच्छा नहीं लगेगा।फर्स्ट पीपल ट्री हाउस में सस्ते।और बहुत ही भाव से बोले और कोई कमी मत बताइए। सेठजी मैं हूँ।इस तरह से उनकी बातें होती थी नेताओं से।और बड़े बड़े नेता?बड़े बड़े नेता बड़े बड़े अधिकारी से आते रहे। उनकी कृपा से।अब जब उनरम दीजिए मुझे उनके घर पे आ रहे थे।तो डीएम मुझसे ये कहता था सर देखिये गा मुझे कोई आज से ना आने पाए क्योंकि सेठ जी आपकी बहुत विभिन्न है।और आबाद देखिये सेठजी हमारी तने चिकित्सा।इतने अभिन्न है और इतने सरल हैं तो किसी का कोई नुकसान नहीं करेंगे। अगर कोई नुकसान हो तो आप मुझसे कहिए गा मैं देख लूँगा। इतना तो मुझे दम था और मेरे पास है ना? साहस हो गया था। डीएम, आईजी, डीआईजी इससे यही आते थे। मैं और रात यहाँ पड़े रहते थे। मेरे साथ बैठते थे, चाय पीते थे।तो उन्होंने मुझे जो।ताकत दी। उस तरह से मुझे कभी और ताकत नहीं है।इस तरह से मैं उनके लिए कितना क्या कहू वह ऐसे व्यक्ति थे कि उनके अंदर किसी भी तरह की बनावट और घमंड नहीं था।सरल स्वभाव के थे।जी।हाँ, इस बार घर पे शादी थी।उनके भाई की लड़की की राजाराम से एक लड़की एक भाई राम विनोद की शादी थी। मुझे प्रतिनिधि बनाकर भेजे थे वहाँ आजमगढ़ राम सिंह यादव के यहाँ हाँ तो मैं वहाँ गया।33। हैलो।कौन?बिल्कुल ठीक हाँ उनके पास जब मैं सिंह यादव पर आपको सेठजी भेजे हैं हम कहाँ से भेजा है? मुझे यहाँ नहीं ये बात सुनी पाया कि मैं अपनी परिचय बताओ, पता नहीं कैसे बोल दिए जाएंगे उनको ज़रा ये महसूस होना मैंने उनको भेजा है अपना प्रतिनिधि बना के।इस तरह से उनकी ऐसी व्यवस्था थी किसी कभी हल्का नहीं समझती, ऊँचाई पर ले जाते थे।और इस बात मुझे याद आ रही है कि कभी कोई उनके सामने उनको भलाई के लिए बोलते थे।बहुत नजदीक की बात से एक आदमी बहुत उठ रहा था तो बड़ी बड़ी गाड़ियां बड़ी बड़ी चीजें ले कर रहा था और बहुत ही गाड़ी से 10 गाड़ी से चल रहा था।तू सेठजी से आया मिलने के लिए एक एक लड़के हो, अभी तो भर रहे हो?कुछ ऐसी इस फिर प्रॉपर्टी बनाओ जिससे की तुम्हारे काम आएगी। इस तरह से उगाओगे तो लक्ष्मी बहुत बचाव की होती है। कुछ ऐसी प्रॉपर्टी बनाओ। मेरे सामने की बात से वो आदमी ऐसा मतलब बहुत बात सुनता रहा लेकिन परवाह नहीं किया।आवाज़ जो एकदम बिल्कुल परेशान हैं, गरीबी पर आ गया।यह तो उनके उनसे भाव थे। किसी को सलाह देना सी बताना तुम जमीन की खरीद लोग बॉम्बे विचार फ्लाइट ले लो, इस सब कर लो और इतना गत सड़क पर।क्या अब जाना ही है ना? क्या मैं नहीं चल सकता हूँ दो चार गाडी ले करके लेकिन नहीं कभी कभी पैदल चल देते थे तो कभी कभी स्कूटर चल देते थे ये उनकी सरलता भी इसे मैं बोल रहा हूँ।बाकी दिन का आशीर्वाद सुन रहा रानी का श्रेय भी उन्हीं की नहीं तो मैं कहीं चला गया होता। यहाँ कुल्लू में बैठकरके राजनीति करता है ना तो यहाँ चिकित्सा कर रहा हूँ वही करता।ओके और हाँ तुम कौन हो कमीने पड़े हम है ना? उनका साहस ही बहुत था।जी।कौन बोल रहा है?और किसी पौंड पर।वो यही सब बात था। उनके इतिहास विषय में तो और सोच सोच के बोलना पड़ेगा सारा दिन रात बोलता ही रहो।

सरलता को देखते हैं, विवाह आकर्षित किया है की ये कुछ भी कर सकते हैं। कुछ भी किसी को करा सकते हैं लेकिन उनकी भावनाये जो थी दूसरे को बनाने में ज्यादा थी।वो अपने लिए जो सोचते थे वो सोचते थे लेकिन दूसरे को भी आगे ले जाने में उनकी बहुत बड़ी इच्छा बनी रहती थी जैसे किसी को राजनेता बनाना।किसी को कोई चुनाव लड़ना तो बहुत ज्यादा प्रेरित करते थे। एक ऐसा करो जो आगे निकल जाओगे। जैसे आप भी कह रहे थे कि नेताजी करते हुए उनके घर आए बहुत लोगो के यहाँ कई बार आप मिलने गए तो क्या उनको नहीं लगता था की वो भी राज्यसभा में चले जाएंगे? परिषद में चले जाये, मिले बन जाए, एमपी बन जाये।आलू ले बहुत कुछ उनको तो नेता जी खुद ही देने के लिए तैयार थे लेकिन वो चाह रहे थे कि मैं अगर सलाहकार बन के उनको सलाह नहीं देता रहूंगा। मुलायम सिंह यादव एक ऐसे नेता थे ये बहुत जब कभी कभी।8000 देते हैं। किसी को समझते नहीं थे और उनको समझने के लिए ही मान्य सर्विस सीता राम जी थे और एक जो है झांसी की कोई आदत है और रामकरन दादा ये तीन लोग उनको विदेश समझा पाते थे जो कभी इजाजत से चेतक क्योंकि मैं उनके साथ रहके देख रहा हूँ। जब कभी नेता जी बहुत ज्यादाएक दम मैं डिस्टर्ब बातचीत थे तो यही तीन आदमी से समझाते थे सेठजी और ये सर मी दादाजी, रामकरन और एक हाँ चौधरी हरमोहन सिंह पीएस रह जाते थे।चलो, चलो, चलो, चलो।और ज्यादा भी बोलची रहे हैं। अपने बच्चों के लिए बेटी की पिटाई कर देंगे तुम्हारी क्या सेठ जी को ऐसा कभी नहीं है ऐसा की नेताजी चाहते हो की मूर्ति बने, राज्यसभा में चले जाये, कभी कभी इच्छा नहीं ज़ाहिर की।यही तो उससे उनका एक शांत मतलब तो ये भी जानकारी क्योंकि मैं इस पे काम कर रहा हूँ तो बात चीत भी पता चला की वो प्रोपोज़ भी किया। नेताजी लोगों ने कहा विज्ञापन को करिये तो मैं देता। जी ने कहा कि पहले उनसे बात कर लो को तैयार है क्या? हाँ ये तो फिर वो सिंह।आपको ऐसा कभी नहीं आपने नहीं कहा की आप हमें सदन का है जहाँ हम को तो हँसी मोबाइल ले जाएं, चाहे अगर तू चाहे हम अपनी प्रोपोज़ करदे, मैं नहीं चाहता हूँ मैं चाहता हूँ लोगों के साथ रह करके उनकी मदद करना जी।उदय प्रकाश नारायण वही राजनीति करते थे, किसी को बनाना चाहते थे।और कोई बात ऐसी जो परिवार और जो हर परिवार बच्चे।तो उनके बहुत ही।बहुत ही बहुत ही संस्कारित है।जिससे आपके साथ जो हमारे अजय भाई है, हमारा लड़का है अजय तो वो तो उनसे भी सरल है।इनको भी मैं देखता हूँ इनके अंदर ज़रा सी भी उत्तर पत्रक नहीं है।यह किसी को कभी भावनाओं से डेढ़ दिन कहीं अरे सेठ जी आपने बड़े आदमी हैं, ये नहीं हो रहा है, ये नहीं हो रहा है। आपको क्या कमी है? बताइए जो होगी हम करा देंगे, कर देंगे।तो उनसे हम सरल है। आपको ऐसा तो नहीं लगता कि जैसे वो चीजों को छोटे जाते थे वो छोड़ते हैं इनके लिए? तो जब तक देखिये ऐसा होता है सब चाहते हैं इच्छा तो सब की होती है लेकिन स्वयं ये इतने थोड़ा सा इस सरल और ऐसे व्यक्ति हैं। संकोची व्यक्ति से उक्त है।स्ट्राइक नहीं गया है मुझको, आप कोई चीज़ दीजिए अच्छे इससे पहले भी चाहते तो हो सकता था, लेकिन जो भी बिज़नेस इन्हीं को देखना था और सेठजी उसमें अस्वस्थ हो गए।अगर बिज़नेस इनको न देखना होता तब तक सांसद हो गए हो।अच्छी लड़ाई में थे, इनको लोग चा रहे थे।इनको चार थे।और यहाँ तक कि उनको टिकट भी करीब करीब मिलने के कगार पर पहुँच गया है। हैलो तो उस समय हमारे सेठ जी बहुत अच्छे स्वास्थ्य तो उन्होंने कहा कि भाई देखिए हम बनिया है ज़रा हमको अभी और काम करना है, थक जाएंगे छोटे है अच्छा आपको बनियों से लड़ना है, देश बना है, उनसे लड़ना है भाई।जी मर्जी जैसा गर्मी है, बनिये तो चाहिए वो अब तो हाँ वो कहेंगे अब तो हम।भाई हैं।तब तो हम भी कहते थे की आप आपके पिता जी का ज़माना देखते हैं तो आप नेताजी से कही ये बात की भाई बढ़िया सुनना इससे बड़ा बढ़िया चाहिए था।तो भाई दूसरी हमारी देखो तो तो ऐसे अब तो लेना ही जाते है हमे बाकी जब से जब जब मुलाकात करते थे।वो हमारे लड़के को बुलाते थे। एक नेता ड्राइवर बुलाओ उसको भी टु ड्राइवर टू मोहन था, उसी को लाइक करते थे और मेरे यहाँ शाम को खाना खाते थे। खाना तो उनका बहुत चीज़ सार्वजनिक था। रोटी, दाल, पालक सो वाली सब्जी थोड़ा सा दूर लेते थे।यही खाद सो जाते थे और सुबह कहते थे कि वो हमारे आने के बाद हमारे उठने के बाद ड्राइवर होना चाहिए। नहीं तो कहाँ? फूफा कहा है वो।वो अब वो हाजिर रहे, अच्छा हुआ, हाजिर और 3ः00 बजे निकलते थे। हम भी उनके साथ कभी कभी बैठ लेते थे। लखनऊ जाने के बाद वहाँ मिलते बात होती और तमाम बातों पर उनकी बात होती इन्ट्रेस्ट नहीं ले रहा था।और वहीं से अपना फाइट जाते थे। मुंबई। हम गाड़ी ले के यहाँ चले जाते थे।तो?एक बात और पूछ के मैं बात आपकी पूरी करूँगा।ये उनका अध्यात्म अध्यात्म बाद में इतना ज्यादा पहले से था वही और बाद में इतना ज्यादा आध्यात्मिक हो गए। वो बहुत ज्यादा समय इसी में देते रहे। मैं जब मुंबई जाता था तो मैं उनको लेकर के जो वाली एक हफ्ते या 15 दिन तक वहाँ स्वामी महाराज आते थे।उनके साथ बैठ की सारा बहक जो तथा वार्ता होती थी, शुरुआत से बैठते थे। वहाँ से प्रसाद लेकर हम लोग भी आते थे तो बाद में दम नहीं एकदम विलीन हो गई। इसी में अंतिम समय जो उनका रहा वो ज्यादातर अध्याप में ही गया है।तो उनके अच्छा हाँ, अभी आपने समझने की कोशिश किया की क्या था वो?इसलिए वहाँ उनको शांति मिलती थी इसलिए ऐसा सोचते थे नहीं के साथ भी कभी कुछ महसूस हुआ कि वहाँ देवी देवता और इस तरह की कोई सुनता है। ऐसी कोई बात नहीं तो क्या लगता है आपको की किस तरह का? क्या अध्यापक उनका यही था की इससे मनुष्य की जो भावनाएँ होती है?जो उनकी सोच होती है, एकाग्र करने के लिए तो महात्मा शरण ली जाती है। यही तो हमको लग रहा था।बाकी और जो ऐसा कुछ नहीं देखा तुमसे कुछ चाहते हैं मिर्ची वो।काम कर रहा हूँ अभी मैं उस आश्रम में भी गया था है तो जो हमने देखा है वो इस तरह से है की कबीरदास को तो आप सुने होंगे जी जीस तरह से कबीरदास पूरे जग कोये जागृत करते रहते थे ये पाखंड ये दुनिया भर की जो चीजें हैं जो ठीक नहीं है और वो संस संप्रदाय के जीतने लोग थे, यही काम किए हाँ, तो मुझे लगा कि वहाँ भी कोई रुचि नहीं है, कोई बेबी नहीं होता नहीं है और वो लोग भी जो भी जाता है समभाव से सबका समान आधार और ये वहाँ कोई किसी का वो नहीं करना है। दूर से ही लोग नमस्ते करते थे ये वो जी तो ऐसा कभी आपको नहीं लगता था की वो क्योंकि उनका ऐसा विचार था की पाखंड व खंड से दूर रहना चाहिए। तभी आप मंदिर जाते हुए देखा था, वो नहीं तभी आप उनको पता कभी कही नहीं। ये बड़ी अच्छी बात आप कहे।जिसे उनका हमने देखा एक बार मैं स्वयं जा रहा था कि हम जाएंगे सेठजी विंध्याचल कहा तो क्या करे यार? विंध्याचल जाएगी अरे ये पूजा कहीं ने कहीं कहा स्मार्ट कर दे दीजिये तो आपके हृदय में आ जाएंगे आप आप फ़ोन कर देखिए, उनकी फोटो दिखाई पड़ेगी तो इस तरह से आध्यात्मिक थे, लेकिन अंपायर अभी भी आप तो बहुत ऊँचाई बात कर दिए, लेकिन औरत कहा कि पैसा बचा भी चले जाते तब बहुत तब जाइए अब ये इस तरह से अमेजिंग 2 मिनट में समझा लेते थे इस बात को अच्छा एक बात अभी हमारी और किसी से बात हो रही अगर लोगों को जिससे सजग भी करते हैं, विदिशा को कहें ना की इतना अच्छा नहीं जाना है, लीजिये तो दबाव किसी को नहीं बनाते, लेकिन कभी कभी नहीं, कभी नहीं जागरूक करते हैं तो आप लोगों ने जागरूक किया और आपने कभी विचार नहीं किया जाए। चलो मौका मिलता है क्योंकि अब देखिये फिजिशियन होने के नाते समय कम रहता है। बाकी जब मैं बनारस जाऊंगा तो वहाँ गड़वाघाट जाता हूँ और प्रणाम करता हूँ वहाँ फिर बात लेता हूँ वहाँ पर लेता हूँ अभी तो मैं गया था चलिए बहुत अच्छा रहा आपसे बातचीत करके और कोई और बात।और कोई बात तो नहीं? बाकी तो हमको बस हमेशा जब अपने साथ रख करके बहुत ऊंची ऊंची बात मुझे सिखाते थे, बताते थे या फिर ढंग से रहेंगे तो कभी आपका माडल नहीं डाउन होगा तभी आप झूठ नहीं बोलेंगे किसी का कर्ज लेकर इनकार नहीं करोगे ये बड़ी अच्छी बात है उनकी बात तब आप ऊँचाई पर बने रहो चलिए बहुत बहुत धन्यवाद धन्यवाद हाँ कौन है??

                                                                                                     

डा.रामयष यादव

समाजभूषण स्व. सीताराम सेठ जी की कुछ यादे

 

पूरे समाज की चिंता करते रहे
-महंतप्रसाद रामनिहोर यादव 

समाजभूषण स्व. सीताराम सेठ जी की कुछ यादे
एक अच्छा सामाजिक समुदाय तभी बन सकता है जब उस समुदाय मे कुछ अच्छे व्यक्ती सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में कार्य करते हैं। जो हर समय सिर्फ अपनी नही बल्की पुरे समाज की चिंता करते रहे और इसी कारण पुरा समाज उनका सन्मान करता है।
स्वर्गीय सितारामजी उन्ही में से एक है 1980 के दशक में मेरी उनसे प्रथम मुलाकात हमारे घर हुई थी स्व. सितारामसेठ स्वयं राम उजागीरजी, राजाराम सेठजी, प्रकाशजी और अदालतजी अपनी कार से शिरडी साई बाबा के दर्शन के बाद श्रीरामपूर आए थे। एक सृजनशील निःस्वार्थी हंसता चेहरा तथा अच्छी व्यक्तीत्व के दावेदार सेठजी थे ही, यहाँ सभी यादव बंधुओं ने सभीका स्वागत किया और बहुत सारी बाते भी कि सभी लोग बिरादरी के पुश्तैनी कारोबार यहा गाय, , भैस, दुध व्यवसाय करनेवाले थे और कुछ लोग यहा खेती भी करने लगे थे।
हमारे पिताजी राम निहोरजी के साथ सभी लोग खेत देखने गए और सेठजी खेती एवं पशुओं के बड़े शौकीन थे। बड़े प्रसन्न हुए और सभी की सराहना भी कि उनके पास अधीक समय नहीं था फिर भी यहाँ बिरादरी स्वागत और व्यवहार देखकर अती प्रसन्न हुए और दोन दिन का समय यहाँ बिताया
एक सादगीभरा निजी जीवन, एक मार्गदर्शक, सलाहकार समाज के प्रती घोर आस्था और उत्तरदायित्व रखनेवाले सच्चा और सफल व्यवसायीक, सामाजिक नेता शिक्षा के प्रती विश्वास एक समाज सुधारक और एक अच्छे इन्सान स्वर्गीय सिताराम सेठ अपनी मिट्टी से हमेशा जुड़े रहे एक सादगीभरा जीवन, कठोर परिश्रम, अच्छा व्यवहार में उनका हरदम विश्वास रहा है। और इसी दम पर पुरा साम्राज्य खड़ा किया
जब भी सिताराम सेठ जी को मौका मिलता चार छे महिने में एक दोन दीन के लिए अपने मित्रो और परिवार के साथ श्रीरामपूर जरूर आते और सभी भाईयों से मुलाकात, हालचाल लेकर कुछ समय आसपास बिताते ।
स्वर्गीय सीताराम सेठ एक नेक इन्सान, कुशल समाजसेवक, मार्गदर्शक, समाज के हर तपके के सुख-दुख । मे शामील होनेवाले एक पारिवारीक सदस्य जैसे खड़े रहे है यादव महासंघ मुंबई के लिए किये गए उनके कार्य, स्कूल की स्थापना, उनकी दूरदृष्टी एवं संघटन कौशल्यता बयान करते हैं। अपने परिवार के लिए अच्छा शिक्षा और उज्वल भविष्य के लिए कठोर परिश्रम, त्याग के साथ पुरा जीवन व्यतीत कीया। उनका समाज निर्माण के लिए अखंड प्रयास दृढता के साथ सुख दुःख मे खडे रहे। मै अपने आपको भाग्यशाली मानता हू की मुझे ऐसे युग पुरुष के साथ मेरे जीवन के कई पल बिताने की लिए मिल सके ।
एक कर्मयोगी शिक्षाप्रेमी महान समाज निर्माता के रुपमे स्वर्गीय सिताराम सेठ जी को पुरा समाज याद करता रहेगा। उन्ही के दिखाए रास्ते पर एवं पद चिन्हों पर उनके दोनो बेटे श्री. अजयजी और श्री विजयजी चल रहे है। उनके उज्वल भविष्य और समाज कार्य के लिए शुभकामनाएँ स्वर्गीय सिताराम सेठ जी पावन स्मृती को कोटी कोटी प्रणाम एवं विनम्र अभिवादन ।


-महंतप्रसाद रामनिहोर यादव, 
श्रीरामपुर


Tuesday, January 10, 2023

मेरा बहुत देर से उनसे संपर्क हुआ



 मेरा बहुत देर से उनसे संपर्क हुआ

- श्रीराम यादव

इस समय मैं उनके जौनपुर के आवास पर हूं, यहां मुझे कई बार आने का मौका मिला, सबसे पहले तो मैं उन्हें धन्यवाद करता हूं और अपनी विनम्र श्रद्धांजलि देता हूं, उन्हें याद करता हूं। जो कुछ मेरी स्मृतियों में है उनके लिए यहां मैं बताना चाहूंगा कि मेरा बहुत देर से उनसे संपर्क हुआ। जहां तक मैं समझता हूं कि 1993 के चुनाव के बाद जिस समय उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी का गठबंधन था और पूरे प्रदेश में इस गठबंधन की एक लहर थी 15 पचासी का नारा बहुत तेजी से गूंज रहा था, ऐसा लगता था कि उत्तर प्रदेश से जैसे किसी बात की शुरुआत हो गई है।

अब मैं चुनाव जीतकर जब लखनऊ गया और वहां जाने के बाद सरकार का गठन हुआ तो मैं पहली बार विधायक हुआ था और मुझे पहली बार में ही उस सरकार की कैबिनेट में मंत्री के रूप में शपथ दिलाई गई यह बहुत ही सौभाग्य की बात थी। ऐसे में जितने भी लोग हमारे समाज के प्रतिष्ठित लोग थे हमें आशीर्वाद देने लखनऊ आए । समय-समय पर उन लोगों का आशीर्वाद मिलता रहा उनमें हमारे स्वर्गीय सीताराम यादव जी जो समाज को उठाने और एक नई दिशा देने के लिए बराबर काम करते रहे उनसे मुलाकात हुई। लखनऊ में कमोबेश बीसीयों बार उनसे मुलाकात हुई। तब मैं बहुजन समाज पार्टी में था उसके बाद जब मैं 1996 में समाजवादी पार्टी में आया जब गठबंधन टूटा था उसके बाद भी मुलाकात हुई।

उनके बारे में जो बातें हमें जानने को मिली वह यह है कि एक सामान्य से परिवार में पैदा होकर और गांव से निकलकर के जिस तरह से उन्होंने संघर्ष किया और अपने समाज के काफी लोगों को साथ ले कर के भी वह चले लोगों को रोजगार दिया मुंबई जैसे शहर में जाकर समाज के लोगों को और समाज के तमाम गरीब लोगों को काम धंधे में लगाया लोगों को प्रेरणा दिया उनका यह कर्तव्य बहुत ही प्रेरणादायक है। जो मैंने उनके विषय में जाना उसमें इन्होंने समाज को एक दिशा देने का काम किया और उसी के साथ साथ राजनीति में जिस तरह से माननीय मुलायम सिंह यादव उन दिनों देश में पिछड़ों के दलितों के विशेष करके माननीय राम मनोहर लोहिया जी के विचारों को लेकर के समाज को जगा रहे थे, जगाने का काम कर रहे थे लोगों में चेतना फैलाने का काम कर रहे थे उसमें बहुत बड़ी भूमिका मुंबई जैसे शहर से महाराष्ट्र जैसे प्रांत से उनको मदद देने का काम यदि किसी ने किया तो जहां तक मेरी जानकारी है वह स्वर्गीय सीताराम यादव जी थे। उन्होंने बहुत बड़ा सहयोग उनको दिया था, आर्थिक सहयोग भी किया और राजनीतिक सहयोग किया जिससे वह आगे बढ़ सके। मैं समझता हूं कि माननीय मुलायम सिंह यादव जी जब तक स्वर्गीय सेठ जी जिंदा थे जितना सम्मान मैंने देखा चाहे वह मुंबई हो या लखनऊ आने पर या सैफई जाने पर या दिल्ली जाने पर जिस तरह से नेताजी उनका सत्कार और सम्मान करते थे वह देखने से ही लगता था, कि वह इतने बड़े मददगार थे माननीय मुलायम सिंह यादव जी के। उन्होंने अपने पूरे जीवन में संघर्ष किया, संघर्ष के साथ-सथ

 अध्यात्म की तरफ भी उनका रुझान था, लगातार वह गढ़वा घाट संतमत आश्रम में जाते रहे, तमाम लोगों को उन्होंने प्रेरित भी किया सद्मार्ग पर चलने के लिए, गढ़वा घाट निरंतर उनका आना-जाना लगा रहा, जहां तक मेरी जानकारी है मुंबई में भी इन्होंने एक आश्रम की स्थापना कराई है जिससे समाज का बहुत बड़ा हित साधन हो रहा है, यहां पर भी लोग संतमत विचारधारा की विचारों से ओतप्रोत हो लाभान्वित हो रहे हैं।  सच्चे मार्ग पर चलने का प्रयास कर रहे हैं इस तरह से देखा जाए तो उनका बहुत लंबा संघर्ष रहा है उस संघर्ष से उन्होंने समाज को दिया है अपने परिवार को दिया है। मैं समझता हूं कि माननीय मुलायम सिंह यादव जी से मिलने के बाद उन्होंने देश के लिए भी बहुत बड़ा योगदान दिया है। इससे अधिक उनके बारे में क्या कहा जा सकता है वह महान व्यक्तित्व के धनी थे।

मुझे एक घटना याद आती है क्योंकि मैं बहुत गरीब परिवार से निकलकर राजनीत में आया था, मैं समझता हूं कि सेठ सीताराम जी भी उसी तरह से संघर्ष करके आगे आए थे यहां तक पहुंचे थे मुझे लगा बहुत अच्छे सहयोगी हैं मार्गदर्शक हैं मैंने उन्हें लखनऊ से फोन किया मैंने फोन पर उनको कहा कि देखिए मैंने थोड़ा बहुत वेतन वगैरह से बचा कर के रखा है, उन दिनों इतनी गाड़ियां नहीं हुआ करती थी, केवल महिंद्रा की जीप हुआ करती थी और उस समय महिंद्रा की ही एक नई गाड़ी निकली थी आरमदा और टाटा सुमो निकली थी मैंने फोन पर बात किया तो उन्होंने कहा कि आप आ जाइए और मैं यहां से दिलवा देता हूं। मैं समय निकालकर स्वयं वहां तक गया इसी बहाने मैं उनके मुंबई स्थित घर पर भी रुका वहीं पर रुक कर खाना पीना खाया उसके बाद उन्होंने मुझे वह गाड़ी दिलवाई, बड़े कंसेशनल रेट पर उन्होंने वह गाड़ी हमें दिलवा दी उसको मैंने काफी दिन तक चलाया । उससे मैंने दो चुनाव लड़े, मैंने देखा कि कोई चाहे कितने भी बड़े पद पर पहुंच गया हो चाहे छोटे पद पर हो सबके लिए उनके मन में समान भाव और हर एक की मदद का जज्बा हुआ करता था। उनकी सहायता और सहृदयता ही उनका आभूषण था, उनसे कभी किसी को शिकायत नहीं रही है मैं समझता हूं पूरे जौनपुर में चाहे वह राजनीति करने वाला हो चाहे बिजनेस करने वाला हो कोई नहीं कह सकता है कि उनसे किसी प्रकार से किसी को कोई नाराजगी हुई हो या किसी को कोई दुख हुआ हो। वह बहुत अच्छे व्यक्ति थे उन्हें अभी रहना चाहिए था, वह बहुत जल्दी चले गए हम लोगों के बीच से।



श्री श्रीराम यादव
पूर्व मंत्री उत्तर प्रदेश सरकार

सीताराम जी इसी तरह की शख्सियत है।

 पूर्वांचल ने बहुत सारी विभूतियों को पैदा किया है 
- सीताराम जी इसी तरह की शख्सियत है।

-चौ.अम्बिका चौधरी ( पूर्व मंत्री उ. प्र.)


पूर्वांचल ने बहुत सारी विभूतियों को पैदा किया है उसमें ऐसे लोगों का विशेष उल्लेख होता है जो लोग साधारण परिवारों से साधारण परिस्थितियों से निकले अपने कौशल और उन्होंने अपने परिश्रम से अपने उद्यम से उन्होंने अपने लिए एक बड़ी जगह बनाई और समाज के लिए एक बड़े बरगद के पेड़ की तरह तमाम लोगों को जो तपिश से आए उनको छाया देने का काम किया। सीताराम जी इसी तरह की शख्सियत है। न कि जौनपुर बल्कि पूर्वांचल तो विशेष रूप से लेकिन जो भी उनके पास गया उसको वह बहुत उदार हृदय से उसको जिस तरह की जरूरत थी उस तरह की मदद उन्होंने दिया। राजनीतिक रूप से जितना मैं उनको जानता हूं वह माननीय नेताजी श्री मुलायम सिंह यादव जी के इतने प्रिय थे और इतने नजदीक थे, अभिन्न सहयोगी थे और मैं बहुत जिम्मेदारी से यह बात कह सकता हूं कि नेताजी को ऐसे लोगों का सहयोग प्राप्त था यह सौभाग्य की बात है। उन्होंने बहुत मदद की लेकिन उस संदर्भ में किसी से भी किसी भी तरह की चर्चा नहीं की, यहां तक की 2-4 शब्दों में भी यह बात किसी को नहीं बताई, इस तरह के सहयोगी वह नेताजी के थे। जहां तक हमारा सवाल है हम लोग दूर से उनको जानते थे, मेरे पास कोई ऐसा संस्मण नहीं है जिसको की निजी तौर पर मैं यहां साझा करूं लेकिन उनके बाद उनके पुत्र श्री अजय जी हम लोगों के मित्र हैं हमारे छोटे भाई की तरह हैं उन्होंने हमेशा अपने परिवार की परंपराओं की तरह से हम लोगों का सम्मान करते हैं। यहां पर विशेष उल्लेख मैं इसलिए करना चाहूंगा कि जिन हालात में वह मुंबई गए और जो लोग ऐसे हालात में वहां गए उनको वह उन हालात में वहां नहीं रहने दिए और उनके पहुंच जाने पर पहले दिन से ही तमाम ऐसे लोग हैं हजारों लोग हैं जिनको उन्होंने संरक्षण दिया। 

अपने लिए उन्होंने जैसे भी दिन गुजारे हो लेकिन उनके यहां पहुंचने के बाद किसी को भी उन्होंने और परिस्थितियों में नहीं गुजरने दिया ऐसी उनके बारे में चर्चा आम है। बड़े लोगों की बड़ी मदद और राजनीतिक कार्यकर्ताओं के तो वह बड़े संरक्षक रहे हैं, जो भी उनके पास गया बिना किसी भेदभाव के उन्होंने उनकी मदद की है मैं केवल यहां पर आर्थिक पक्ष की बात नहीं कर रहा हूं बल्कि हिम्मत देने का काम, हौसला बढ़ाने का काम और यहां तक की अगर जरूरत पड़े तो उनके लिए छोटी बड़ी सिफारिश करने का काम उन्होने किया। अब यह जरूर है कि जौनपुर वाले उसमें सौभाग्यशाली हैं कि ज्यादा उनके हिस्से में आया और यह भी स्वाभाविक है कि जौनपुर में अपनी माटी से उनका ज्यादा लगाव था, इसकी वजह से जौनपुर वालों को उसका कुछ ज्यादा लाभ मिला।जौनपुर के अलावा भी जो लोग भी वहां तक पहुंच सके वहां से कोई निराश होकर नहीं आया, यह उनकी बड़ी भारी विशेषता थी और स्वभाव की उदारता के अलावा वह बहुआयामी व्यक्तित्व था उनका। हम बड़े-बड़े नेताओं के बारे में जब चर्चा करते हैं उनके गुणों की उनके आचरण की हम लोग कमोबेश उसको थोड़ा बढ़ा करके  करने की बात करते हैं।एक ऐसा व्यक्ति जो देश की पार्लियामेंट में नहीं गए  देश के कोई मंत्री नहीं हुए,  लेकिन बावजूद इसके राजनीति में समाज के लिए जो समझदारी और योगदान होना चाहिए उसको और उसमें अपनी जितनी भूमिका होनी चाहिए उस भूमिका को उन्होंने जिस ढंग से निर्वाह किया। एक उदाहरण हो सकता है और प्रेरणा ली जा सकती है।यह सच है कि इस रिवाज के लोग बहुत  समाज में होते नहीं और है भी नहीं, और आज भी जब  नेताजी की चर्चा होती है उनके सहयोगियों की चर्चा होती है तो प्रचलित तौर पर सेठ जी के नाम से भी उन को संबोधित करते थे और जब सेठ जी कहते थे तो यह मान लिया जाता था कि जब नाम नहीं ले रहे हैं तो उन्हीं की चर्चा हो रही हैं। जब जब बात आती थी तो एक अलग छवि उनकी सभी लोगों में थी खासकर समाजवादी परिवार में सभी लोगों में विशेष रूप से, जो लोग भी उन तक पहुंचे जो लोग नहीं भी पहुंचे उनका जितना भाग्य सौभाग्य हो।आज आवश्यकता इस बात की जरूर है कि हम देखते हैं कि गांधीजी सेठ जमना लाल बजाज के बगैर अपने उद्देश्यों को उस तरह से प्राप्त नहीं कर सकते थे, या कोलकाता जाते हुए गांधी जी को एक निश्चिंतता होती थी, लोहिया जी को निश्चिंतता होती थी कि वह वहां जा रहे हैं तो उनको देखने वाले लोग वहां हैं। 


नेताजी के जीवन में जो थोड़े से लोग ऐसे रहे हैं मैं समझता हूं कि उनमें सेठ जी की भूमिका वैसी ही समझनी चाहिए । हम लोगों ने जितना उसको देखा है खास करके समाजवादी पार्टी के गठन के बाद और खास करके पार्टी का विस्तार करने के लिए जिन लोगों को दी गई और महाराष्ट्र में जब समाजवादी पार्टी बनाने की बात आई तो उसमें बहुत सारे लोग जुड़े, मैं उसमें नाम लूं तो देवानंद से भी अपने समय में जुड़कर नेताजी ने काम लिया राज बब्बर तो काफी समय जुड़े भी रहे बड़ी जिम्मेदारियां उनको मिली। लेकिन हमारे प्रदेश के जो बड़े नेता लोग हैं मैं स्वर्गीय शारदा नंद अंचल का नाम लेना चाहूंगा मैं बलराम जी का नाम लेना चाहूंगा, जब महाराष्ट्र में पार्टी के विस्तार की बात करेंगे तो इन सबको आधारभूत रूप से जो सहयोग और समर्थन मिला उसमें हम सेठ सीताराम जी का उल्लेख करेंगे, क्योंकि सबसे आगे बढ़कर उनका नाम आएगा बगैर उनकी मदद के यह सब काम संभव नहीं था। 

यह सही बात है कि आज समाजवादी पार्टी वहां नहीं है जहां शुरुआत में आई थी तत्कालीन समय में कई विधायकगण मंत्री हुए विधायक हैं और आज भी विधायक हैं। लेकिन उस दौर को याद करता हॅूं तो खुद मेरी पृष्ठिभूमी का स्मरएा हो आता है, जब मेरे पिता जी कलकत्ता गए थे गांव के एक व्यक्ति से 10 रूपये कर्ज लेकर गए थे सबसे पहले उन्होंने उसको किया इसलिए मैं समझ सकता हूं उन परिस्थितियों को जब उन्को याद करता हूं तब अपने पूज्य पिता जी की स्मृतियां ताजी हो जाती हैं, उनको पुनः मैं उसी भाव और छवि के साथ स्मरण करता हूं और जिनका नाम रहा जो लोग अनाम रहे और उनके साथ रहे उन पर उनकी दुआएं रहीं और वे भी जिनपर उनकी अपार कृपा रही उनसब की तरफ से उनकी स्मृतियों को नमन करता हूं। मैं उनके चरणों मे अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं।



-चौ.अम्बिका चौधरी 
( पूर्व मंत्री उ. प्र.)


मैं आश्चर्यचकित रहा

  उनकी सरलता देखकर मैं आश्चर्यचकित रहा  - डा.रामयश यादव  सबसे पहले माननीय सीताराम सेठ जी को सादर नमन करता हूँ। और इनके विषय में मैं बताना चा...