ताना -बाना

ताना -बाना 

स्मृतिशेष  सीताराम यादव जी की जीवन यात्रा पर ग्रंथ 

प्राक्कथन

दर्द का कैसा बगूला तेरे जाने से उठा
- बी.आर. विप्लवी



"जुनूं लेकर निकल पड़ते हैं घर से उन्हीं के पांव से चलती हैं राहें"

यह शेर मैंने सीताराम यादव जी सरीखे जुनूं-पसंद, आत्म विश्वास से लबरेज, अपनी धुन के पक्के एव कर्मठ लोगों के लिए ही कहा है जो अपनी मति-गति से आने वाली नई नस्लों एवं नई पीढ़ियों के लिए दुर्गम रास्तों को आसान करते हुए एक मिसाल बनते हैं प्रेरणास्रोत बनते हैं। ऐसे ही लोगों से नए रास्ते, नई मंजिलें तय होती हैं।

मैं, "सेठ जी" के नाम से मशहूर सीताराम जी यादव के साथ व्यक्तिगत मुलाकात का सफ़ हासिल नहीं कर सका हूं, लेकिन, उनका नाम, उनकी शुहरत और कारनामे के किस्से चर्चे उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल वासियों में किसी जादुई व्यक्तित्व की तरह बड़े ही राव चाव से कहे सुने जाते। रहे हैं। इसमें कोई शक नहीं है कि सेठ जी अपने जीते जी ही एक ऐतिहासिक मिथक जैसे बन गए थे खासतौर से दलितों-पिछड़ों, गरीबों, शोषितों वंचितों के बीच उनकी छवि किसी उद्धारक, किसी त्राता से कम नहीं थी।

आख़िर ऐसी कौन सी परिस्थितियां तथा ऐसे कौन से प्रेरक प्रसंग थे जिनकी सुसंगति या साधुसंगति में सीताराम यादव जी न केवल "मोटा सेठ" यानी बहुत धनी मानी सेठ बन गए, बल्कि, वे अपने उन्नत और समृद्ध कारोबार के साथ ही साथ ही साथ जमीन से जुड़कर, शिक्षा से जुड़कर अपने लोगों से जुड़ कर सबके लिए कल्याणकारी मार्ग की तलाश में राजनीतिक पोषण से लेकर आध्यात्मिक वन प्रांतर में आजीवन चलते विचरण करते परिनिर्वाण को प्राप्त हुए।

सेठ जी के तमाम जीवन-प्रसंगों को जानते-सुनते यह विश्वास सुदृढ़ हो जाता है कि किसी भी व्यक्ति की समग्र उन्नति में पहली शर्त होती है उसका सही अर्थों में "मनुष्य" होना- अर्थात मानवता के गुणों से संपृक्त होना। कहा जा सकता है कि ये गुण सीताराम यादव जी के भीतर कदाचित जन्मजात थे। उनके ऐसे गुण जो सीताराम यादव को सेठ सीताराम या फिर फिर "मोटा सेठ" और अंततः "सर्व सिद्ध सेवानंद महाराज" बनाते हैं, उन्हें हम उनकी "रहनी" या जीवन शैली में देखकर चिन्हित सकते हैं। मनुष्यता की कुछ कसौटियों के बरअक्स हम सीता राम जीटी ज़िन्दगी के कुछ पहलू पर विचार करते हुए हम उनके ऐसे गुण की पड़ताल कर सकते हैं-
1. सहजता सेठ जी का जीवन इतना सहज रहा है कि वे आजीवन सबके लिए सुलभ, सबके पहुंचने योग्य बने रहे। धन-दौलत या उनकी व्यक्तिगत राजनीतिक पहुंच इत्यादि, उनकी इस सादगी में कहीं आड़े नहीं आती। वह बच्चों के साथ बच्चे बन जाते हैं-खेलते-खाते, हंसी ठिठोली करते। कहीं दुखिया के साथ दुख-दर्द बांटने वाले बन जाते हैं, यतीम के साथ मददगार बन जाते हैं और ज़रूरतमंद के साथ उसकी आशा की किरण बन जाते हैं। ऐसे अनेक प्रसंग उनकी जीवन-यात्रा में भरे पड़े हैं जब वे किसी थके-हारे मुसाफिर को अपनी गाड़ी रोक कर उसकी मंजिल तक पहुंचाते हैं, जब किसी जरूरतमंद को बिना किसी दिखावा के गुप्त रूप से आर्थिक मदद पहुंचाते हैं, जब बिना किसी लोभ-लालच के राजनीतिक गलियारे में सही व्यक्तियों के प्रतिनिधित्व को लेकर पैरवी करते हैं। एक व्यक्ति के इतने आयाम जिन्हें व्यवस्थित और संचालित करना तो एक सहज, निर्लिप्त एवं निष्काम व्यक्ति के बूते की ही बात हो सकती है।

2. ईमानदारी: यह एक ऐसा गुण है जिसकी ख़ुशबू दूर-दराज तक फैलती जाती है और लोगों में विश्वास पैदा करती है। सेठ जी के जीवन में ईमानदारी का पाठ केवल मुंह से बोलने का नहीं था, बल्कि, इसे आचरण में ढालने का था। आज के समय के मानदंडों के हिसाब से यह बहुत ही हैरतअंगेज बात होगी कि सेठ जी उद्योग व्यापार में एक सम्मानित स्थान एवं ऊंचाई तक पहुंचने के बावजूद भी किसी तरह की हेरा-फेरी या बेईमानी से कोसों दूर रहते थे। वह खरे सौदे के खांटी सौदागर थे। उनकी बात का विश्वास न सिर्फ़ उनके कामगारों में था बल्कि उन सैकड़ों- हजारों ग्राहकों तथा आपूर्तिकर्ताओं में भी था जो उनके उद्योग से परिवार की तरह जुड़े हुए थे। इस बात की पुष्टि के लिए उनके जीवन का एक प्रसंग बहुत ही प्रेरणादाई है जब उनकी मिल में आग लग जाती है और आपूर्तिकर्ताओं का सामान जल जाता है। सेठ जी दूसरे ही दिन, अपने अकाउंटेंट को बुलाकर निर्देश देते हैं कि वह आपूर्तिकर्ताओं के जो भी सामान जल गए हैं उसका सही आकलन और असेसमेंट करके उसका मूल्यांकन करे, तदनुसार उतने मूल्य का चेक बना कर तत्काल उन आपूर्तिकर्ताओं के यहां व्यक्तिगत रूप से जाकर चेक हस्तांतरित करे। यह कार्यवाही करने के बाद आपूर्तिकर्ताओं ने स्वतः ही चेक लौटा दिया और इस बात का विश्वास दिलाया कि ऐसी आपदा की घड़ी में वे सब लोग सेठ जी के साथ हैं तथा आगे से वे और अधिक माल की आपूर्ति सुनिश्चित करेंगे।

3. अनुशासन: सेठ जी का जीवन कड़े अनुशासन की मिसाल था। वह चाहे व्यक्तिगत जीवन हो या सार्वजनिक जीवन, सब जगह वे एक मर्यादित सीमा के अंदर ही बातचीत और टिप्पणी करते थे। उनकी गहरी चुप्पी के बाद जो गुरु गंभीर छोटी सी टिप्पणी आती थी उसे लोग गंभीरता से लेते थे। वह बोलने में, खाने-पीने में, उठने-बैठने में, चलने-फिरने में तथा लोगों के साथ आचार- विचार-व्यवहार में एक नियम-संयम युक्त ढंग से पेश आते थे। वे सवेरे उठकर प्रातः काल का टहलना, व्यायाम, ध्यान-योग से निवृत्त होकर ही कोई अन्य काम शुरू करते थे। नियत समय पर
अपनी फैक्ट्री में पहुंचना, दोपहर में भोजन के लिए घर आना, भोजनोपरान्त आराम करना, पुनः फैक्ट्री तथा घर के काम निपटाकर अंततोगत्वा शाम को घर लौट कर बच्चों को स्वयं पढ़ाना- यह उनका नित्य का क्रियाकलाप था। इस प्रकार वे स्वयं द्वारा स्वयं के ऊपर ही सख्त अनुशासन रखते थे तथा अपने संपर्क में आए हुए लोगों से भी ऐसी ही उम्मीद करते थे।

4. दया, करुणा और सदासयताः सेठ सीताराम यादव जी के मन में हमेशा यह भाव रहता था कि वे अधिक से अधिक लाचार और निरुपाय लोगों की सेवा कर सकें। वह चाहते थे कि उनके द्वारा अर्जित धन का इस्तेमाल अधिक से अधिक उन लोगों के ऊपर खर्च करके किया जाए जो साधनविहीनता से लाचार होकर अपने सपने साकार नहीं कर पा रहे हैं। उनके मन में ऐसे लोगों के प्रति अपार करुणा थी। वे चाहते थे कि उनके गांव के लोग ग़रीबी, जहालत और निरुपायता को छोड़कर अपने अंदर आत्मविश्वास पैदा करें और अपने उद्यम और कौशल से अपने जीवन को खुशहाल बनाएं। उन्होंने अपने कामगारों को अपने काम तक ही सीमित नहीं रखा, बल्कि, उनकी सहायता करके उन्हें छोटे-मोटे उद्योग स्थापित करने के लिए भी प्रेरित किया। यह इस बात का प्रमाण है कि वे मजदूर वर्ग के शोषण के क़तई ख़िलाफ़ थे। वे मज़दूर को भी मालिक बनाने के लिए हमेशा प्रयासरत रहते थे। इसी का परिणाम है कि उनके द्वारा प्रोत्साहित बहुत से मज़दूर मुंबई के भिवंडी औद्योगिक क्षेत्र में आज छोटी-मोटी फैक्ट्रियों के मालिक बने हुए हैं।

5. शिक्षा के प्रति लगाव: शिक्षा के प्रति सेठ सीताराम यादव जी का बड़ी ही शिद्दत के साथ लगाव था। वे चाहते थे कि उनके गांव-गिरांव के लोग भी अच्छी शिक्षा प्राप्त करें। वे मानते थे कि शिक्षा ही विकास की जननी है। यद्यपि वे गांव के स्कूल से ही मैट्रिक परीक्षा पास ककरके रोज़गार और नौकरी की तलाश में मुंबई में आकर दर-दर की ठोकर खाते रहे, किंतु, फिर भी उनके अंदर शिक्षा के प्रति बहुत सम्मान था। वह अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देने के लिए हर मुमकिन कोशिश किए जिसका परिणाम है कि उनके परिवार में डॉक्टर, इंजीनियर, उद्यमी, शिक्षक आदि भरे पड़े हैं। अपने बच्चों की पढ़ाई के दौरान वे उनके अध्यापकों और प्रधानाचार्य से समय-समय पर संवाद किया करते थे। यह उनकी शिक्षा के प्रति जागरूकता का एक प्रमाण है। उन्होंने न सिर्फ़ भिवंडी और उसके आसपास के इलाकों में शिक्षा का प्रचार प्रसार करवाया, बल्कि उन्होंने अपने गांव रमदेइया में भी एक साधन-संपन्न इंटर कॉलेज बनवा कर वहां के लड़के-लड़कियों को अच्छी शिक्षा देने के लिए एक सकारात्मक एवं सृजनात्मक पहल की।

6. गरीबों शोषित और वंचितों के मददगारः सेठ सीताराम यादव जी का दिल हमेशा समाज के निचले पायदान पर खड़े असहाय लाचार लोगों के प्रति संवेदना से भरा रहता था तथा वे आगे बढ़ कर उनकी मदद करते थे। गांव में ज़रूरतमंदों की चुपचाप मदद करने के अलावा वह अपनी फैक्ट्री में काम करने वाले कामगारों का भी समुचित ध्यान रखते थे। उन्होंने कामगारों में शिक्षा और स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ाकर उनके कल्याण का काम किया तथा कामगारों के लिए

आवास बनवाकर उन्हें आवंटित किया ताकि वे गांव में अकेले रह गए अपने परिवारों को साथ लाकर अपने बच्चों की शिक्षा दीक्षा भी सुनिश्चित कर सकें।

7. सांप्रदायिक एकता के सजग प्रहरी: सेठ जी यह अच्छी तरह समझते थे कि मनुष्यता से बड़ा कोई धर्म नहीं है। इसलिए हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, पारसी, बौद्ध, जैन आदि सभी धर्मों के ऊपर मनुष्यता का धर्म है। यही कारण है कि वह भिवंडी के मुस्लिम बहुल इलाके में छोटी-छोटी सभाएं करके लोगों में मेल मिलाप तथा भाईचारा का संदेश देते थे। उनके इसी रवैया के कारण भिवंडी के हिंदू-मुसलमान एकता के सूत्र में बंध गए थे तथा सेठ जी का सम्मान हर संप्रदाय के लोग करते थे। वे हिंदू-मुस्लिम सौहार्द के अग्रदूत थे। उन्होंने समाजवादी पार्टी का टिकट दिलवाकर महाराष्ट्र से अल्पसंख्यक वर्ग से कई विधायक तथा अन्य पदों के लिए चुनाव जिताकर पहुंचाया।

8. निर्भीकता एवं निश्छलताः वे अपने कार्य के प्रति निश्छल, इसलिए निर्भीक थे। वे सामाजिक और राजनीतिक दायरे में भी अपना योगदान देते समय एक निडर वक्ता की तरह सच्चाई पर कायम रहते थे। कोई बड़ा से बड़ा पदधारी भी उन्हें उनके वचन और मान्यता से डिगा नहीं सकता था। यही कारण है कि वह उत्तर प्रदेश के कई बार मुख्यमंत्री रह चुके माननीय मुलायम सिंह यादव के साथ बैठक में भी यह कहने से गुरेज नहीं किए कि "माननीय ! आपके यहां दो तरह के जमीदार हैं एक मेइचढ़वा और दूसरा घोडचढ़वा ।" उनका इशारा स्पष्ट और साफ़ था कि जो जमीन के मालिक घोड़े पर चढ़कर अपनी खेती देखने जाते हैं वह मेहनत-मशक्कत करने वाले लोगों का खून चूसते हैं तथा वे खेतिहर जो स्वयं खेत की मेड़ पर चलकर अपनी खेती स्वयं करते हैं, वही खेती का तथा खेतिहर का दुख-दर्द समझते हैं। इसलिए समाजवादी सिद्धांतों को घोड़चढ़वा जमीदारों से परहेज करना चाहिए तथा मेड चढ़वा जमींदारों को ही बढ़ावा देना चाहिए।

9. नि:स्वार्थ राजनीतिक जुड़ाव: सेठ सीताराम यादव जी राजनीति से गहरे तक जुड़े हुए थे, किंतु, वे राजनैतिक पद लिप्सा से बहुत दूर थे। 1992 में समाजवादी पार्टी के गठन के समय वे मुलायम सिंह यादवजी के बहुत नज़दीक थे तथा वे संस्थापक सदस्यों में मुख्य थे। यही कारण था कि वे समाजवादी पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में आजीवन शामिल रहे तथा अपने अनुभव और राजनैतिक कौशल के आधार पर पार्टी का मार्गदर्शन करते रहे। अनेक अवसरों पर उन्हें मेंबर ऑफ पार्लियामेंट या मँबर आफ लेजिसलेटिव असेंबली बनाने के लिए पार्टी प्रमुख द्वारा पहल की गई, किंतु उन्होंने ऐसे पदों की दौड़ में शामिल होने से हंसकर इनकार कर दिया। वह महाराष्ट्र जैसे इलाके में पिछड़े वर्गों की सभा करा कर वहां समाजवादी पार्टी की नींव रखी तथा पार्टी का परचम लहराया। यही नहीं, बल्कि वे समय-समय पर पिछड़े वर्ग की सभाएं कराते रहते थे तथा लोगों में सामाजिक जागरुकता बढ़ाने के लिए जगह-जगह जाकर लोगों में
समाजवादी संदेश देते थे। उन्होंने अपने पैतृक गांव रमदेइया में मुलायम सिंह जैसे बड़े राजनीतिक व्यक्ति को बुलाकर लोगों को एकजुटता, भाईचारा तथा राजनैतिक जागरूकता के लिए प्रेरित किया।

10. आध्यात्मिक लगाव: सेठ सीताराम यादव जी शुरुआती दौर से ही आध्यात्मिक प्रकृति के थे। उनके अंदर संत प्रवृति, सदाकत एवं मनुष्यता की सर्वोपरि सत्ता के गुण कूट-कूट कर भरे हुए थे। यही कारण है कि वह आध्यात्मिक जीवन में भी उस ऊंचाई तक पहुंचे जहां उन्हें "सर्व सिद्ध सेवानंद महाराज" के नाम से अभिहित किया गया तथा संतमत की परंपरा में उन्हें सम्मानित स्थान प्राप्त हुआ। वह संतमत अनुयाई आश्रम गढ़वा घाट, वाराणसी से लगातार जुड़े हुए थे तथा उस आश्रम के नियम-संयम को न सिर्फ़ स्वयं पालन करते थे, बल्कि, अपने संपर्क के लोगों और परिवारजनों में भी इसका प्रचार-प्रसार करवाते थे। इसी कड़ी में उन्होंने मुंबई के कांदिवली में संतमत अनुयाई आश्रम की एक शाखा सन 1984 में स्थापित करवाई तथा दूसरी शाखा अपने गृह जनपद बदलापुर जौनपुर में भी स्थापित कराई। वे व्यर्थ की मूर्तिपूजा, तीर्थ, मृत्युभोज एवं सत्यनारायण कथा जैसे कर्मकांडों- आडंबरों से स्वयं को दूर रखते थे तथा लोगों को भी दूर रहने की सलाह देते थे। वह धर्म के पाखंड से कोसों दूर थे।

ध्यान देने की बात यह है कि संतमत अनुयाई आश्रम मूल रूप से बहुजन धारा के निर्वर्ण संप्रदाय के संत कवि रैदास और कबीर सरीखे सामाजिक-धार्मिक दार्शनिकों की परंपरा से गहरे तक जुड़ा हुआ है। यह वह संतमत है जहां वेदों का खंडन करते हुए रैदास और कबीर जैसे अनेक क्रांतिकारी संत मत मौजूद है। यही कारण है कि सीताराम यादव जी इस लोकजीवी अवैदिक (नास्तिक) परंपरा से गहराई से जुड़े हुए थे। इसके उदाहरण स्वरूप संत रैदास की बानी स्पष्टवादी है-- "चारो वेद किया खंडौत, जन रैदास करें दण्डौत" अर्थात मैंने चारों वेदों का खंडन किया है फिर भी जनसामान्य (हमारी मान्यता से सहमत होते हुए आदर पूर्वक) दण्डौत (अभिवादन) करता है। कबीर कहते हैं "वेद पढ़ें, पर भेद न बूझे, कथनी कथै अपार / आप न बूझे, जगत बुझावै सूझे आर न-पार" या फिर कबीर का यह ऐलान-

"चार वेद चहुं मति का विचार / इहि भ्रमि भूलि मरा संसार ।" रैदास और कबीर का यह वेद- खंडन ईसा पूर्व छठी शताब्दी के नास्तिक दार्शनिकों ( कपिल, सांख्यवादी आलारकलाम, चार्वाक आदि ) तक जाता है जिसे अधिक परिष्कृत, तार्किक एवं लोककल्याणकारी बनाने वाले सबसे प्रमुख स्तंभ स्वयं भगवान बुद्ध हैं।

ऐसे संतमत में दीक्षित होकर सेठ सीताराम यादव ने अपनी बहुजन संस्कृति एवं परंपरा को न सिर्फ़ जीवित रखने का काम किया बल्कि उसे आने वाली पीढ़ियों के लिए अपना आदर्श स्वीकार किया।
समाजवादी संदेश देते थे। उन्होंने अपने पैतृक गांव रमदेइया में मुलायम सिंह जैसे बड़े राजनीतिक व्यक्ति को बुलाकर लोगों को एकजुटता, भाईचारा तथा राजनैतिक जागरूकता के लिए प्रेरित किया।

10. आध्यात्मिक लगाव: सेठ सीताराम यादव जी शुरुआती दौर से ही आध्यात्मिक प्रकृति के थे। उनके अंदर संत प्रवृति, सदाकत एवं मनुष्यता की सर्वोपरि सत्ता के गुण कूट-कूट कर भरे हुए थे। यही कारण है कि वह आध्यात्मिक जीवन में भी उस ऊंचाई तक पहुंचे जहां उन्हें "सर्व सिद्ध सेवानंद महाराज" के नाम से अभिहित किया गया तथा संतमत की परंपरा में उन्हें सम्मानित स्थान प्राप्त हुआ। वह संतमत अनुयाई आश्रम गढ़वा घाट, वाराणसी से लगातार जुड़े हुए थे तथा उस आश्रम के नियम-संयम को न सिर्फ़ स्वयं पालन करते थे, बल्कि, अपने संपर्क के लोगों और परिवारजनों में भी इसका प्रचार-प्रसार करवाते थे। इसी कड़ी में उन्होंने मुंबई के कांदिवली में संतमत अनुयाई आश्रम की एक शाखा सन 1984 में स्थापित करवाई तथा दूसरी शाखा अपने गृह जनपद बदलापुर जौनपुर में भी स्थापित कराई। वे व्यर्थ की मूर्तिपूजा, तीर्थ, मृत्युभोज एवं सत्यनारायण कथा जैसे कर्मकांडों- आडंबरों से स्वयं को दूर रखते थे तथा लोगों को भी दूर रहने की सलाह देते थे। वह धर्म के पाखंड से कोसों दूर थे।

ध्यान देने की बात यह है कि संतमत अनुयाई आश्रम मूल रूप से बहुजन धारा के निर्वर्ण संप्रदाय के संत कवि रैदास और कबीर सरीखे सामाजिक-धार्मिक दार्शनिकों की परंपरा से गहरे तक जुड़ा हुआ है। यह वह संतमत है जहां वेदों का खंडन करते हुए रैदास और कबीर जैसे अनेक क्रांतिकारी संत मत मौजूद है। यही कारण है कि सीताराम यादव जी इस लोकजीवी अवैदिक (नास्तिक) परंपरा से गहराई से जुड़े हुए थे। इसके उदाहरण स्वरूप संत रैदास की बानी स्पष्टवादी है-- "चारो वेद किया खंडौत, जन रैदास करें दण्डौत" अर्थात मैंने चारों वेदों का खंडन किया है फिर भी जनसामान्य (हमारी मान्यता से सहमत होते हुए आदर पूर्वक) दण्डौत (अभिवादन) करता है। कबीर कहते हैं "वेद पढ़ें, पर भेद न बूझे, कथनी कथै अपार / आप न बूझे, जगत बुझावै सूझे आर न-पार" या फिर कबीर का यह ऐलान-

"चार वेद चहुं मति का विचार / इहि भ्रमि भूलि मरा संसार ।" रैदास और कबीर का यह वेद- खंडन ईसा पूर्व छठी शताब्दी के नास्तिक दार्शनिकों ( कपिल, सांख्यवादी आलारकलाम, चार्वाक आदि ) तक जाता है जिसे अधिक परिष्कृत, तार्किक एवं लोककल्याणकारी बनाने वाले सबसे प्रमुख स्तंभ स्वयं भगवान बुद्ध हैं।

ऐसे संतमत में दीक्षित होकर सेठ सीताराम यादव ने अपनी बहुजन संस्कृति एवं परंपरा को न सिर्फ़ जीवित रखने का काम किया बल्कि उसे आने वाली पीढ़ियों के लिए अपना आदर्श स्वीकार किया।
ऐसे संत प्रकृति के सेठ सीताराम यादव जी का परिनिर्वाण मार्च 2014 में हुआ। अपने पीछे क सशक्त विरासत छोड़कर वे अपने भौतिक शरीर से परिनिवृत होच गए। इस विरासत को बहुत ही प्रभावी ढंग से आगे बढ़ाने वाले उनके सुपुत्र अजय कुमार यादव जी अपने पिता के पद चिन्हों पर चलते हुए उनके सामाजिक-धार्मिक, राजनीतिक एवं आर्थिक एजेंडे को उत्तरोत्तर आगे बढ़ा रहे हैं। मैंने अजय जी से मिलकर यह महसूस किया कि उनके भीतर लोककल्याण का भावना एवं कुछ सकारात्मक करने का जज़्बा सीताराम जी से द्विगुणित होकर मिला है। लोगों को उनसे भारी अपेक्षाएं एवं उम्मीदें हैं। उनके लिए मेरी हार्दिक मंगलकामनाएं हैं।

सीताराम यादव जी उर्फ सर्व सिद्ध सेवानंद महाराज जी के लिए परवीन शाकिर का यह शेर बहुत ही अनुकूल और बहुत ही मुफ़ीद बैठता है- एक सूरज था कि तारों के घराने से उठा, आंख हैरान है क्या शख़्स ज़माने से उठा । आज तक शह का चेहरा नहीं धुलने पाया । दर्द का कैसा बगूला तेरे जाने से उठा । (परवीन शाकिर ) आदरणीय सीताराम यादव जी को मेरी विनम्र श्रद्धांजलि! 
भवतु सब्ब मंगल !!! 

------(ग़ज़ल सराय, 113/2, सेक्टर 8बी, 
वृन्दावन योजना 2, लखनऊ-226029 
मोबाइल 9956636755, ईमेल: brviplavi@gmail.com)

अभिमत 

ओमप्रकाश कश्यप

चरथ भिक्खवे चारिकं...



सामान्य धारणा है कि व्यक्तित्व-केंद्रित रचनाओं में पूरा सच कभी नहीं आ पाता कुछ लोग औपचारिकतावश प्रशंसा करते हैं कुछ बुराई लेने से बचते हैं कुछ के मन में उपकृत होने और उपकृत करने का भाव रहता है कुछ किसी न किसी दबाव के कारण बढ़ा-चढ़ाकर लिख जाते हैं फिर भी ऐसे कार्यों की उपयोगिता असंद्धिग्ध बनी रहती है क्योंकि इस तरह की पुस्तकों में सत्य का अनुपात संस्थागत कृतियों से कहीं ज्यादा होता है उन कृतियों से तो कहीं ज्यादा जो दरबारी या चारण संस्कृति के पक्षकारों द्वारा लिखी जाती हैं कैसेहम उसी पर आते हैं संसाधनों के अलावा मनुष्य को आगे बढ़ने के लिए जिन चीजों की जरूरत पड़ती हैवे हैं

1. सपने और उन्हें पूरा करने की इच्छाशक्ति 

2. सकारात्मक प्रेरणाएं तथा उनका स्रोतजहां से प्रेरणाएं जन्म लेती हैं

चालबाज सत्ताएंऐसे लोग जो दूसरों के जीवन को अपनी इच्छा और स्वार्थ के अनुसार नियंत्रित करना चाहते हैंप्रेरणाओं और प्रेरणास्रोतों पर कब्ज़ा कर लेते हैं। उनकी स्रोत सामग्री के रूप में मिथों और काल्पनिक व्यक्तित्वों को ले आते हैं। आदर्श चरित्रों के नाम पर उन चरित्रों को विमर्श के केंद् में स्थापित कर देते हैंजो कृत्रिम अथवा गढ़े हुए होते हैं। उदाहरण के लिए स्कूलों में पढ़ाया जाता हैआदर्श भाई कौनउत्तर के लिए विद्यार्थी को यह अवसर नहीं दिया जाता कि आदर्श भातृत्व की खोज के लिए वह अपने भाई या अपने आसपास के भाइयों’ के चरित्र पर विचार करे अपने माता-पितापरिजनों से उसपर चर्चा करे बस थोप दिया जाता हैआदर्श भाई माने लक्षमण(या भरतजैसा भाई प्रतिज्ञा किसकी महानबताया जाता है—‘भीष्म की’ आदर्श शिष्यजवाब मिलेगा—‘एकलव्य’ सबसे बड़ा दानीइतिहास और संस्कृति की जानकारी न रखने वाला भी तुरंत कहेगा—‘कर्ण’ आप कहेंगे कि इसमें बुराई क्या हैइन सभी का उल्लेख भारतीय साहित्य और संस्कृति में है बुराई यह है कि ये चरित्र फैसलाकुन ढंग से हमारे मनस् में रोप दिए जाते हैं हमें सोचने या सवाल करने का अवसर ही नहीं देते 

महाभारत के अनुसार भीष्म का व्यक्तित्व विराट है पांडुकुल और हस्तिनापुर के लिए तो वे वटवृक्ष जैसे हैं लेकिन उनकी पूरी निष्ठा हस्तिानापुर के सिंहासन ने बंधी है महाभारतकाल के सारे धत्कर्म उनकी आंखों के आगे होते हैं। द्रोपदी का वस्त्र हरण, अभिमन्यु की हत्या... कर्ण और एकलव्य का अपमान। यहां तक कि  महायुद्ध भी। सत्ता की मनमानी के आगे हम हमेशा उन्हें गर्दन नीची किए हुए पाते हैं ऐसे भीष्म की प्रतिज्ञा से किसे लाभ हुआअठारह अक्षौहिणी सेनाओं के प्राण ज्यादा मूल्यवान थे या अकेले व्यक्ति की प्रतिज्ञाऐसे प्रश्न मन में उठें भी तो दबा देना पड़ता है इसलिए कि धर्म-ग्रंथों पर सवाल उठाने की अनुमति हमें नहीं होती प्रतिभा-संपन्न एकलव्य भी उसी संस्कृति का गुलाम है द्रोण उसे अपना शिष्य बनाने से इन्कार कर देता है बावजूद इसके द्रोण के गुरु दक्षिणा मांगने पर वह यह पूछने का साहस नहीं कर पाता कि जो व्यवस्था उसे धनुर्विद्या सीखने का अधिकार नहीं देतीउसके लिए अपना अंगूठा क्यों कुर्बान करे?

सबसे बड़ी बात है कि ये प्रेरणाएं कभी सीधे नहीं आतीं उनकी आड़ में आदर्श के नाम पर भाग्यजातीय ऊंच-नीच; और संस्कृति के नाम पर अपने विवेक को परंपरा के आगे गुलाम कर देने की कला— सब थोप दी जाती है कोई सवाल न उठाए इसलिए दैवी-तत्व भी घुसा दिए जाते हैं। भीष्म गंगा के पुत्र हैं लक्ष्मण को शेषनाग का अवतार माना जाता है ऐसी ही स्थिति बाकी चरित्रों के साथ भी है जो विशिष्ट हैउसमें कुछ दिव्य-लक्षण भी है इससे वे लोक से कट जाते हैं जनसाधारण उनके कारनामों को देखता हैलेकिन उनसे मिल रही प्रेरणाएं उसके लिए बहुत काम की सिद्ध नहीं होतीं सामान्य-सी विशेषता के बारे में भी लगता है कि वह तो देवताओं का विशेष गुण है उन जैसा बनने के लिए तो दैवीय चरित्र चाहिए या फिर दैवी-अनुकंपा बिना दैवी शक्ति उन्हें समझना और उन जैसा बनना असंभव-सा काम है ऐसे में मनुष्य चमत्कारभाग्यदैवी अनुकंपा की उम्मीद करने लगता है 

कह सकते हैं कि धार्मिक-सांस्कृतिक प्रतीकों और ऐतिहासिक नायकों नाम पर थोपे गए अधिकांश चरित्र अवास्तविक और अनुपयोगी होते हैं उनसे प्रेरणाएं भी कैसी मिलती हैं। ज्यादा से ज्यादा पारिवारिक। समाज में कैसे जिया जाए? अपनी और दूसरों की समानता, स्वतंत्रता और सामाजिक समरसता की रक्षा कैसे की जाए? सामाजिक शांति और सकल समृद्धि में वृद्धि कैसे संभव हो? इस बारे वे व्यक्तित्व हमें कुछ नहीं सिखाते। शंकराचार्य को वेदांत दर्शन खड़ा करना था। इसके लिए वे काशी आए, बहस की, मीमांसक मंडन मिश्र को सुरेश्वराचार्य बनाकर वेदांत की श्रेष्ठता स्थापित की। लेकिन राम शंबूक से इस तरह की बहस नहीं करते। न ही शंबूक की शिकायत लेकर पहुंचे ब्राह्मणों को उससे शास्त्रार्थ करने को कहते हैं। सीधे जाकर उस शंबूक की गर्दन तराश देते हैं जो विद्यार्थी भाव से वेदाध्ययन करना चाहता है। ऐसे ज्ञान विरोधी समाज, चरित्रों और उनका महिमामंडन करने वाले ग्रंथों से भला क्या प्रेरणा ली जाए!

उनकी अपेक्षा हमारे आसपास के चरित्रभले ही उनका लेखन थोड़ा अजिरंजना पूर्ण होज्यादा भरोसे लायक होते हैं हम उनसे मिल सकते हैंउनकी आलोचना कर सकते हैंउनके बारे में दूसरों से पूछकरपढ़कर अपनी राय बना सकते हैं अच्छा या बुरावे हमें अपने बारे में सोचने को मजबूर करते हैं इस तरह वे मनुष्य के विवेकीकरण में सहायक होते हैं साधारण व्यक्तित्व प्रधान कृतियों की अतिरंजनायदि उसमें वैसा कुछ है तोधर्म-संस्कृतिपरंपरा और इतिहास के नाम पर थोपी गई अतिरंजना के आगे नगण्य होती है क्योंकि जैसा ऊपर कहा गया हैपहली वाली अतिरंजनायदि वह सचमुच अतिरंजना है तो हमें सोचने को मजबूर करती हैजबकि दूसरे की अतिरंजना हमारे दिलो-दिमाग की तालाबंदी करनिर्मानवीकरण की ओर ले जाती है प्रस्तुत पुस्तक को हमें इसी रूप में लेना चाहिए ग्राम्शी ने कहा थासांस्कृतिक अधिपत्य से बाहर आने के लिए सर्वहारा वर्ग को अपने बीच से ही बुद्धिजीवी पैदा करने होंगे इसका एक अभिप्राय यह भी है कि उसे अपने नायकअपने प्रेरणास्रोत भी अपने बीच से ही पैदा करने होंगे बालक अपने माता-पितापरिजनों और गुरुजनों से इसलिए अधिक सीखता है क्योंकि वे उसके आसपास के होते हैं इसी तरह मनुष्य अपने समाज से ही प्रभावी प्रेरणाएं लेता है 

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पुस्तक में सीताराम जी को जानने वाले विभिन्न लोगों ने अपने विचार व्यक्त किए हैं उनमें जो निर्विवाद और अनुकरणीय हैवह है एक अल्पशीक्षित युवक का रोजगार की तलाश में मुंबई जाना वहां एक कंपनी में काम करते हुए मनोयोग से सीखना उसके बाद अपना उद्यम स्थापित करना कामयाबी हासिल करना लेकिन यह सब करते हुएऔसत कामयाब मनुष्यों की तरह अपने आप और अपने काम में सिमट नहीं जाना बल्कि दूसरों को भी अपनी सफलता का हिस्सेदार बनाना जिस समाज से निकलकर आए हैंउसे याद रखना और आने वाली पीढ़ियों को शिक्षा की कमी के कारण बेरोजगारी से जूझना न पड़े— इसके लिए स्कूलकॉलेज आदि खुलवाना व्यापार या राजनीति में सफलता हासिल करने के लिए संभव है कुछ समझौते सेठजी’ को भी करने पड़े होंलेकिन यहां बेदाग कौन हैं! सवालों के घेरों में तो वे दैवी चरित्र भी हैंजिन्हें धर्म और संस्कृति के नाम पर महानायक’ या देवता’ बना दिया जाता है सच तो यह है कि जब कोई व्यक्ति जितना उसने समाज से लिया हैउससे ज्यादा लौटाने की स्थिति में आ जाता है तो वह महान बन जाता है इसलिए सीताराम जी को करीब से न जानने पर भी जितना इन संस्मरणनुमा लेखों में कहा गया हैके आधार पर कह सकता हूं कि वे महानता की श्रेणी में आ चुके थे उनके व्यक्तित्व से प्रेरणा ली जा सकती है यह बात दावे के साथ इसलिए भी कही जा सकती है क्योंकि जौनपुरमुंबई और उनके आसपास के अनेक युवा उनके जैसा बनने का सपना देखते आए हैं। 

सीताराम जी के व्यक्तित्व के बारे में पढ़ते हुए मुझे राबर्ट ओवन की याद आ आई जातिवाद में आकंठ डूबे भारतीय समाज की आंख से देखें तो ओवन के पिता लोहार थे जानवरों की काठी बनाने का काम करते थे अवसर मिलने पर आसपास की चिट्ठियां भी बाँट दिया करते थे। गरीब ओवन को दस वर्ष की उम्र से ही दर्जी के यहां काम सीखने जाना पड़ा 18 वर्ष का हुआ तो मेनचेस्टर चला गया जैसे भारत का अहमदाबाद थावैसे ही ब्रिटेन का मेनचेस्टर उन दिनों वह उभरता हुआ क़स्बा था अगले 12 वर्ष  ओवन ने वहीं रहकर दर्जीगिरी करते हुए बिताए उन दिनों वहां वस्त्र उद्योग उठान पर था मशीनीकरण की शुरुआत हो चुकी थी। बीस वर्षों तक कपड़े-सिलते ओवन की आंखों में सपना उमड़ने लगा था बचपन में पिता को काम करते देखा था। वही संस्कार काम आए। एक दिन अपने भाई से सौ डॉलर उधार लिए और वस्त्र उद्योग से जुड़ी मशीनें बनाने लगा उसके बाद तो ओवन था और उसकी तरक्की तरक्की के साथ समृद्धि आईपरंतु उसने समृद्धि को अपने आप तक सीमित नहीं रखा बांटता चला गया स्कूलविद्यालयप्रसूतिगृहमजदूरों के लिए आवास बस्तियां मजूदरों को थोक के भाव खाद्य पदार्थों की आपूर्ति जितना वह मजूदरों के लिए करतामजदूर उतना ही मेहनत करके लौटा देते अच्छे विचार कस्तूरी की गंध जैसे होते हैं फैलना शुरू करते हैं तो फैलते ही जाते हैं ओवन को समाजवाद का जनक बताया जाता हैसीताराम जी ने समाजवादी पार्टी बनाने में सहयोग दिया था

अंत में बस इतनी उम्मीद कि यह पुस्तक न केवल अपने 'सेठजी' की स्मृति को स्थायित्व देगीबल्कि उनकी तरह के देशज व्यक्तित्वों की खोज की राह भी प्रशस्त करेगी

चरथ भिक्खवे चारिकं

बहुजन हिताय बहुजन सुखाय

लोकानुकंपाय अत्थाय हिताय

सुखाय देव मनुस्सानं...

ओमप्रकाश कश्यप


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कही-अनकही
 
एक पिता सागर से भी गंभीर अंबर से भी विशाल, 

पर्वत से भी अडिग अवनी से भी धीर, सबके पीर।
- अजय कुमार यादव



किसी व्यक्ति का जीवन में क्या महत्व होता है, यह तब पता चलता है जब वह प्रत्यक्षनहीं होता है। पिताजी के बारे में यह बात अक्षरश : लागू होती है। पिताजी की जो छत्रछाया हम लोगों पर थी और उनका कद प्रभाव क्षेत्र इतना बड़ा था जिसको हम लोगों ने उनके जीते जी कभी नहीं जाना, महसूस नहीं किया, जीवन में या दुनिया में किसी भी तरह की कोई परेशानी हम लोगों को पड़ेगी यह महसूस नहीं किया क्योंकि इतना अटूट विश्वास था कि हमें कभी लगा ही नहीं की दुनिया में कोई चीज असंभव है। जीवन के अन्तिम क्षणों में वह अल्जाइमर से पीड़ित रहे जिसके कारण अंतिम 7-8 वर्षों तक वह घर पर ही या यूं कहिए कि बेड पर ही अवस्थित थे लेकिन हम लोगों का इतना अटूट विश्वास था कि उनकी छत्रछाया है और वह हैं।
उनके न रहने पर हम लोगों को एकाएक लगा कि जैसे किसी घर की छत गायब हो जाए और आदमी अचानक चिलचिलाती धूप में खड़ा हो जाए यह बात दिल से महसूस हुई हालांकि उनके बनाए हुए कारोबार, दोस्त, समाजा सब लोग हमारे साथ खड़े हैं, सबका आशीर्वाद और सबका स्नेह हमारे साथ है लेकिन पिता के ना रहने की जो क्षति है वह बिल्कुल अलग तरह की होती है। पिता की जगह कोई नहीं ले सकता वह कमी कभी पूरी नहीं हो सकती है यह हमेशा खटकती है ।
रहा सवाल पारिवारिक जीवन और हमारे बचपन का अपने स्वभाव के अनुसार बहुत ही स्वाभाविक संस्कार उन्होंने दिए जो उनका स्वभाव था वह नैसर्गिक रूप से हम लोगों के भीतर ट्रांसफर हुआ। जब भी उन्होंने जैसा समझा वैसा व्यवहार किया जो चीजें कड़ाई से पालन करानी थी उन्हें कड़ाई से पालन कराया जब जरूरत पड़ी प्यार से भी उसे समझाया कि जीवन के मूल्यों को लोगों के प्रति आदर सम्मान चाहे वह किसी भी जाति धर्म या संप्रदाय का व्यक्ति हो व्यक्ति-व्यक्ति में भेद की बजाए जो समानता है उसके लिए जो समानता का भाव है उसका संदेश हमेशा वह देते रहे, और यही उनके व्यक्तित्व का महत्वपूर्ण हिस्सा था जिसको हम लोग जीवन में देखते आ रहे थे।जो हमारी याददाश्त का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है वह यह है कि जब से हम जानने लायक हुए यह बात यहां बताना चाहूंगा कि वह शाम को 8ः00 बजे घर पहुंच जाते थे और तब हमें पढ़ाते थे तब ऐसा लगता था कि क्या यह वही पिताजी हैं जो सुबह इतना प्यार कर रहे थे या हमें अपनी गाड़ी से स्कूल छोड़ने गए थे, पॉकेट खर्च के लिए कुछ पैसे भी दे देते थे, पढ़ाते समय का उनका अनुशासन बहुत सख्त होता था जैसा स्वाभाविक होता है कि कई कई बार पिटाई भी हो जाती थी। एक बात और बहुत महत्वपूर्ण थी कि जो बच्चे स्वाभाविक तौर पर आस पड़ोस के बच्चों के साथ कंचा या किसी भी तरह का खेल खेलते हैं वह उनको बिल्कुल पसंद नहीं था और वह कहा करते थे कि इस तरह के खेल में यह ध्यान रखना चाहिए कि हमारा स्थान क्या है? तो अक्सर वह कहा करते थे कि भलमनई के बच्चे हो, कभी भी अपशब्दों का प्रयोग नहीं करने देते थे और जिस तरह का माहौल गली मोहल्लों में होता है उससे दूर रखने का हमेशा बहुत कठिनाई से पालन करवाते थे। बार-बार इस बात की हिदायत देते थे की भले परिवार की यह सब आदतें नहीं है। तू-तू, मैं-मैं जैसे शब्दों का प्रयोग बिल्कुल नहीं करने देते थे हमेशा इससे आगाह करते रहते थे। उनकी दी हुई सीखे हम लोगों के जीवन में घर कर गई हैं और हमेशा हमारा यही प्रयास होता है कि हम उसको उसी रूप में आगे अनुपालन तो करें ही करें और इसका अपने बच्चों में भी असर डालने में कामयाब हों।
जैसा कि लोग बताते हैं 1955 में वह मैट्रिक की परीक्षा पास करके मुंबई पहुंचे और मुंबई में जो हमारे आसपास और गांव के लोग रहते थे उनके साथ रह कर के मिल वर्कर के रूप में उन्होंने अपनी जिंदगी की शुरुआत की। यद्यपि उनकी जितनी पढ़ाई थी यह तो नहीं कहा जा सकता है कि वह बहुत विद्वान थे और बहुत सारी किताबें पढ़ी होगी लेकिन उन्हें शिक्षा के महत्व की बखूबी जानकारी थी। क्योंकि यह बात अब समझ में आती है कि उस समय वह पढ़ाई लिखाई के लिए केवल हम और हमारे परिवार को ही नहीं वह समाज के हर तबके को प्रोत्साहित करते थे और चाहते थे कि लोग अच्छी से अच्छी शिक्षा ग्रहण करें। वह जानते थे कि समाज का परिवर्तन अच्छी शिक्षा से ही संभव है। अभाव से निकलने के लिए शिक्षा ही सबसे बड़ा साधन है उन दिनों बल्कि आज भी वह उतनी ही महत्वपूर्ण है। जैसा कि मैंने पहले भी कहा शिक्षा के प्रति वह बहुत सजग थे और हमेशा हम लोगों को बहुत ही कड़़ाई और अनुशासित तरीके से पढ़ाते थे। यहां तक की परीक्षा और उसके परिणाम से भी वह वाकिफ थे और उस पर नजर रखते थे अपने बच्चों के विद्यालय पर जाकर उनकी निगरानी करना वह नहीं भूलते थे। विद्यालयों के प्रिंसिपल से बातचीत करते थे और उनका स्वभाव था कि बुद्धिजीवियों के संपर्क में वह हमेशा रहते थे और उनके बहुत सारे मित्र बुद्धिजीवी थे और बहुत अच्छे अच्छे पदों पर काम कर रहे थे। ऐसे लोगों के प्रति उनके मन में बहुत आदर रहता था और हमेशा जो भी लोग शोध कर रहे ह,ैं प्राध्यापक हैं या अन्य किसी तरह का शिक्षा जगत में काम कर रहे हैं सबको बहुत ही आदर के साथ वह उन्हें सम्मान देते थे।
उनके जीवन में शिक्षित लोगों का बहुत महत्व था और वह चाहते थे कि हमारे बच्चे भी आने वाले दिनों में ऐसे ही शिक्षा ग्रहण करें और शिक्षा के माध्यम से अच्छे-अच्छे पदों पर जाएं लेकिन कभी उन्होंने किसी को किसी खास शिक्षा के लिए दबाव नहीं बनाया, वह इस मामले में बहुत ही आजादी देते थे कि जो भी जिस भी क्षेत्र में चाहे आगे बेहतर तरीके से अपनी पढ़ाई करें और उसके लिए वह पूरा संसाधन मुहैया कराते थे। इसी के साथ वह चाहते थे कि आप अपना स्थान सर्वोच्च रखिए और जिस विषय क्षेत्र में आप अध्ययन कर रहे हैं उसमें एक तरह का कीर्तिमान स्थापित करिए। शिक्षा के साथ साथ वह यह भी चाहते थे कि स्वास्थ के प्रति भी हम सजग रहें और शरीर सौष्ठव का बहुत ध्यान रखते थे। समय से उठना, समय से नियमित रूप से प्रैक्टिस करना, सुबह उठकर के दौड़ना अपने दैनिक कार्यों को निपटाना आदि जबकि माता जी की हम लोगों के प्रति आराम से सारा काम करने देने की उदारता रखती थी। शिक्षा के प्रति उनकी जो भावना थी यही कारण था कि प्राइमरी के बाद उन्होंने पता किया कि अच्छी शिक्षा कहां मिल सकती है तो उनके यार दोस्तों ने बताया कि नासिक में भोंसले मिलिट्री स्कूल है वहां पर शारीरिक शिक्षा के साथ-साथ अकादमिक शिक्षा भी बहुत ही अच्छी तरह से कराई जाती है इसकी जानकारी उन्हें मिली थी फिर भी वह स्वयं अपने दोस्तों के साथ उस विद्यालय को देखने गए और उससे बहुत प्रभावित हुए हमें उसी सैनिक स्कूल में भेज दिया, उसके बाद हमारे मामा जी केके बेटे राकेश का प्रवेश भी वहां कराया जो बाद में चलकर उस विद्यालय में अपनी प्रतिभा के कारण कमांडेंट के पद तक गए, साथ ही साथ जिमनास्ट इत्यादि में उनकी बहुत रुचि थी। इसके बाद गांव से भी अपने घर के चाचा जी के बड़े बेटे विनोद को भी वहीं पर शिक्षा दीक्षा के लिए प्रवेश दिलाया, बाद में हमारा छोटा भाई विजय भी वहीं से अपनी पढ़ाई किया। इस तरह से हम कह सकते हैं कि हमारे परिवार के लगभग आधा दर्जन बच्चे वहां हॉस्टल में रहकर पढ़ाई किए और यह मैं बहुत गर्व के साथ कह सकता हूं कि हमारे जीवन में जो अनुशासन है वह उस विद्यालय की देन है और यही नहीं देश और संविधान के प्रति जो श्रद्धा और समर्पण है उसकी शिक्षा भी वहीं से प्राप्त हुई है।
लगभग 6 वर्षों तक मैं और हमारे परिवार के जो बच्चे थे भोंसले सैनिक स्कूल नासिक में थे,बीच बीच में पिताजी वहां आते रहते थे। स्कूल का नियम थाशनिवार, रविवार को अभिभावक अपने बच्चों को अपने साथ बाहर भी ले जा सकते हैं। आरंभ में तो महीने में एक बार निश्चित रूप से पिताजी का आना होता था और माता जी भी साथ में आती थी क्योंकि हम लोगों का पहला साल था हम लोग नए-नए गए थे तो पिताजी बहुत दृढता से समझाते थे कि बच्चों के साथ मिलकर रहना चाहिए और अपने हाथ से कपड़े धोने चाहिए उनकी इच्छा थी कि हम लोगों में वह सारे गुण आ जाए जो एक व्यक्ति को जीवन में जरूरी होते हैं, उनकी बहुत इच्छा थी कि यह सारे गुण जल्दी से जल्दी हमलोग सीख जाएं। माताजी बताती थी किजब वहां से बच्चों को छोड़कर वापस होते थे तो गाड़ी में उनके आंसू निकल आते थे लेकिन हमलोग कल्पना में भी यह सोच नहीं सकते कि पिताजी के आंसू निकले होंगे। पिताजी का जो व्यक्तित्व हम लोगों के दिलों दिमाग में था वह बहुत ही सुदृढ़ और कठोरतम व्यक्तित्व के रूप में था लेकिन उतने ही वह अंदर से मुलायम और सरल थे यह बात माताजी के बताने से परिलक्षित होती है। 
पिताजी जब 1955 में यहां आए तो हालात ऐसे नहीं थे।कमाओ और खाओ जैसा समय था लेकिन उन्हें इस बात की चिंता थी कि गांव में भी जो लोग चाहे उनके भाई हो चाहे उनके परिवार के लोग हों वह चाहते थे कि उनकी शिक्षा कैसे बेहतर हो। वहां पर हमारे चाचा जी श्री राजारामजी, श्री मुनिराज जी पिताजी ने उनके लिए साइकिले भिजवाई और हमेशा उनके लिए अच्छे कपड़े आदि यहां से भेजते रहते थे । जिससे वह लोग अच्छे से अपनी पढ़ाई कर सके अच्छे कपड़े पहन कर स्कूल कॉलेज जाएं। हमारे पड़ोस में ही सिंगरामऊ कॉलेज था तो वहां पर जाकर उनका एडमिशन करवाया।एक चाचा श्री राजारामजी बीएससी एजी वही से किए। दूसरे चाचा श्री मुनिराज जी के इंटर करने के बाद पढ़ाई में रुचि नहीं थी उनको यहां बुलाकर मुकुंद नारायण एंड संस स्टील की एक कंपनी थी उसी में अपने किसी परिचित के माध्यम से उन्हें फोरमैन की नौकरी दिलवाए और इस तरह से टेक्निकल लाइन में वह परमानेंट हो गए और दूसरे चाचा जी जिन्होंने बीएससी एजी किये थे उन्हें बी.एड. कराकर के उल्हासनगर में वह अध्यापक हो गए । 
मुंबई का मौसम बहुत ही अलग तरह का है यहां पर हमेशा एक तरह की उमस बनी रहती है उसकी वजह से उनको स्वास की बीमारी हो गई, उनको सूखी खांसी आने लगी तो डॉक्टरों ने कहा कि आपको मुंबई का क्लाइमेट सूट नहीं कर रहा है आप ऐसा करिए की मुंबई से अलग कहीं पर काम देखिए क्योंकि आपकी इस बीमारी की दवा यहां पर संभव नहीं है।अब गांव तो वापस जा नहीं सकते थे, उन्होंने जो काम वहां पर सीखा था और उनको जो काम आता था लोगों से पूछा तब उनको पता चला कि मुंबई से 50 किलोमीटर की दूरी पर भिवंडी एक जगह है जहां पर पावरलूम का काम होता है और वह मुंबई से दूर होने के नाते उसका क्लाइमेट भी अलग है। स्वास्थ्य जरूरी था इसलिए वह भिवंडी आऐ और मुंबई छोड़ दिए। उनकी काबिलियत के अनुसार यहां पर उनको काम मिल गया। उनके अंदर की जो क्रिएटिविटी और हुनर था उसकी वजह से उन्होंने यहां पर अपना काम आरंभ किया और यहीं से उनको एक विकास का प्लेटफार्म मिला और काम आगे बढ़ गया।
एक बात यहां यह महत्वपूर्ण है कि वह जिस भी फील्ड में रहे अपना प्रतिमान स्थापित किए क्योंकि हमारे पिताजी हैं इसलिए नहीं कह रहा हूं परंतु यह सच है। वह मिल में एक वर्कर की तरह से काम शुरू किए लेकिन उनको जो काम एलाट किया जाता था उस काम को तो वह ईमानदारी से करते ही थे उसके अलावा भी अगल-बगल वालों का काम कर लेते थे। क्योंकि उनके अंदर सीखने की ललक थी जिस काम को वह करते थे उसके अलावा भी जो अन्य टेक्निकल काम थे उसको भी सीखने की कोशिश करते थे, इसी वजह से वह धीरे-धीरे इस उद्योग के अनेक कामों में पारंगत हो गए। उनके साथ जो अन्य वर्कर थे उनके लिए भिवंडी में वर्कर यूनियनमोवमेण्ट शुरू हुआ उसमें भी बढ़-चढ़कर उन्होंने हिस्सा लिया संगठन में तो उन्होंने हिस्सा लिया ही लेकिन उस समय के जो मजदूर यूनियन के टॉप लीडर थे उनमें उनका एक नाम था। वह यूनियन लीडर भी रहे।
एक बड़ी इंटरेस्टिंग घटना है यह बताना बहुत जरूरी है कि जिस कंपनी में उन्होंने काम शुरू किया था उसमें साइजिंग की दो मशीनें थी जिनमें से एक वह चलाते थे और दूसरी किसी टेक्निकल वजह सेबंद पड़ी थी । इस कंपनी के मालिक ने देखा कि यह तो हरफनमौला है और एक प्रस्ताव दिया कि सीताराम जी ऐसा करिए आप इस कंपनी को चलाइए किराए पर और जो आपको लगे वह हमें दिया करिए, यह प्रस्ताव उनको पसंद आया और यह हुआ कि जो एक मशीन काम मे थी उसी के अनुसार किराए की राशि तय हुई क्योंकि कंपनी में इस समय एक मशीन खराब पड़ी थी और दूसरी चल रही थी। जब यह सौदा हो गया तब दूसरी मशीन की जटिलता को इन्होंने समझा और उसे अपने हुनर से ठीक किया दूसरी मशीन भी चालू कर लिया लेकिन इस कंपनी मालिक यूनूस वली उल्लाह ने कहा कि यह आपकी वजह से चालू हुई है जो हमारा अनुबंध है वह वही रहेगा क्योंकि इसे तो आपने ठीक किया है। यही से वह दोनों मशीनें चलाने लगे और विकास का रास्ता यहीं से निकला।
1983 में भोसले सैनिक स्कूल से मैं वापस मुंबई आ गया क्योंकि वहां पर साइंस और आर्ट्स में इंटरमीडिएट की शिक्षा तो होती थी लेकिन कॉमर्स वहां पर नहीं था इसलिए कॉमर्स की पढ़ाई के लिए मुझे मुंबई वापस आना पड़ा।मुम्बई में पिताजी के एक मित्र हुआ करते थे श्री शोभनाथ यादव जी हिंदी के विभागाध्यक्ष थे उन्होंने बांद्रा के एक कॉमर्स कॉलेज में मेरा एडमिशन करा दिया। मेरे छोटे भाई विजय ने भी ट्वेल्थ मुंबई से किया और यहीं से इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। चाचा जी के पुत्रसंजय उनका रुझान शुरू से ही मेडिकल की तरफ था इसलिए उन्होंने मेडिकल की पढ़ाई की, संजय की सिस्टर बिंदु भी डॉक्टर बनी और संजय के छोटे भाई प्रभाकर ने मैनेजमेंट की पढ़ाई की और हमारी सिस्टर भी अपनी पढ़ाई पूरी की। इसी प्रकार दूसरे चाचा श्री राजाराम यादव के बड़े बेटे विनोद ने भोसले सैनिक स्कूलनासिक के बाद इलाहाबाद से स्नातकोत्तर, राकेश भी वहीं से एम.ए. बी.एड. किया एवं सुरेश मेडिकल की पढ़ाई कर डाक्टर बने उनकी दोनो पुत्रियों ने उच्च शिक्षा प्राप्त कीं। इस तरह से पिताजी की जो शिक्षा के प्रति रुझान थी उनके द्वारा हम लोग शिक्षा के क्षेत्र में भी आगे बढ़े।
जैसा कि मैंने बताया कि हमारी पढ़ाई लिखाई 1988 में पूरी होने के बाद जब1990 में हमारी शादी हुई शादी के बादहमारे पिताजी द्वारा संचालित जो कारोबार था उसमें मैं पिताजी का हाथ बंटाने लगा और मेरे आने के बाद पिताजी ने काफी राहत की सांस ली। अब उनको लगा कि जिस तरह से मैं काम संभाल रहा हूं वह ऊपर ऊपर मार्गदर्शक के रुप में तो काम देखते रहे लेकिन अब डेली रूटीन के कामों में उतना हिस्सा नहीं लेते थे। अब अपने को ज्यादा सामाजिक गतिविधियों और उससे जुड़े कार्यों में लगाना आरंभ कर दिये। यह वही समय था जब देश में राजनैतिक उभार का दौर आरंभ हो गया था और जनता पार्टी जनता दल का उदय हुआ था ऐसे समय में वंचित वर्ग के नेताओं का भी उदय हो रहा था। माननीय मुलायम सिंह यादव जी देश की राजनीति में सक्रिय हो गए थे और पिताजी भीहर तरह से उनको पूरा सहयोग दे रहे थे। पिताजी में इस कार्य के लिए एक उत्साह था, बगैर किसी लाभ लोभ के उनको यह था कि देश की राजनीति में योगदान करने का यह सही वक्त है। 1992 के करीब जब समाजवादी पार्टी का गठन हो रहा था तब और उससे पहले से ही पिताजी माननीय मुलायम सिंह यादव जी के काफी करीब आ गए थे और उन्हें वैचारिक और राजनीतिक सहयोग कर रहे थे। यह वही दौर था जब माननीय नेताजी और उनके सहयोगियों को मुंबई में यादव समाज के जो पिताजी के सहयोगी थे श्री श्याम नारायण यादव जी को अध्यक्ष बनाया गया था और उनके नेतृत्व में मुंबई में कई तरह के काम चल रहे थे जिसमें श्री कृष्ण विद्यालय, यादव संघ भवन और उसी बीच विचार आया कि एक बड़ा सम्मेलन भी आयोजित किया जाए जिसे पिछड़ा वर्ग सम्मेलन कहा जाए और जिसका मुख्य अतिथि माननीय नेता जी श्री मुलायम सिंह यादव जी को बनाया जाए।इस संदेश को लेकर श्याम नारायण जी और पिताजी नेताजी के पास गए और उनसे कहा कि केवल उत्तर प्रदेश से काम नहीं चलेगा इन सब चीजों की जरूरत महाराष्ट्र में भी है। उन दिनों चौधरी हरमोहन सिंह यादव जी अखिल भारतवर्षीय यादव महासभा के अध्यक्ष हुआ करते थे, मुंबई अधिवेशन के लिए उनको भी साथ लिया गया और यह प्रस्ताव नेताजी को दिया गया नेताजी इससे उत्साहित हुए यह उल्लेख यहां पर करना आवश्यक है कि नेताजी इससे पहले महाराष्ट्र में कभी इतनी बड़ी सभा के लिए नहीं आए रहे होंगे भले ही वह जनता दल पीरियड में उन सभाओं में आए हुए हो वह एक अलग बात है।यह आयोजन मलाड के रामलीला ग्राउंड में किया गया था उसे यादव संघ जिसके केंद्र में पिताजी थे द्वारा आयोजित किया गया था यद्यपि इसका नाम यादव सभा न करके पिछड़ा वर्ग सभा दिया गया। यह वही समय था जब नेताजी समाजवादी जनता पार्टी से अलग हुए थे और अपनी पार्टी बनाने के अभियान में लगे हुए थे। इस कार्यक्रम में अनेक नेता आए जिनमें श्री चंद्रजीत यादव जी, श्री हर मोहन यादव,श्री बलराम जी और अन्य प्रदेशों के भी कई बड़े नेता थे, साथ ही साथ महाराष्ट्र के अन्य दलों के भी नेता शामिल हुए थे।
यहीं पर अनेक लोगों ने अपनी भावनाएं व्यक्त की कि नेताजी को एक नई पार्टी बनानी चाहिए और नेता जी ने वहीं पर लोगों के विचारों से प्रभावित हुए और यहां से जाने के बाद कुछ ही दिनों बाद उन्होंने एक नई पार्टी बनाने की घोषणा हजरत महल पार्क के विशाल जनसभा में की। उसके बाद जो पहली कार्यकारिणी बनी उसमें मुंबई अधिवेशन और समाज के स्वरूप को देखते हुए नेता जी ने पिताजी को राष्ट्रीय कार्यकारिणी में रखा क्योंकि उनकी कार्यशैली और अन्य चीजों को देखकर वह काफी प्रभावित हुए थे। संभवत यही कारण था कि उन्होंने उन्हें अपने साथ जोड़ने का प्रयास किया। इस तरह से पिताजी को समाजवादी पार्टी से नेताजी ने जोड़ा और उनके अंतिम समय तक वह समाजवादी पार्टी के संस्थापक सदस्य के रूप में राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य आजीवन बने रहे। नेताजी का और पिताजी का संबंध प्रगाढ़ होता गया। पार्टी गठन के बाद नेता जी ने देशभर में दौरा किया। हमें याद है सर्दियों के दिन थे नेताजी का दौरा पश्चिमी उत्तर प्रदेश में होना था और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड इलाके में तो पिता जी ने यहां अपने कुछ साथियों के साथ जिनमें श्री श्याम नारायण यादव जी भी थे 10-12 लोगों की टीम लेकर नेताजी के साथ गए और पार्टी के अभियान में सहयोग किए। पार्टी उस समय जिलों जिलों में दौरा कर रही थी और वहीं पर संगठन का गठन करके जिला अध्यक्ष वगैरा भी बना रही थी.। उस समय नेताजी के साथ लगातार महीनों तक पिताजी इस तरह के दौरों पर रहे। नेता जी की जब सरकार बनी तब नेता जी ने मुख्यमंत्री के रूप में दक्षिण भारत का दौरा किया तब दक्षिण भारत के दौरे में भी पिताजी को भी बुलया गया था। नेताजी के साथ ही केरल तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश का दौरा किया ।पिताजी बताते थे कि नेताजी समय-समय पर उनसे राय लिया करते थे भले ही पिताजी सक्रिय राजनीति में नहीं थे लेकिन नेताजी जब भी जरूरत पड़ती थी उन्हें बुलाते थे और उनसे राय-मशवरा करते थे।नेताजी जब कर्नाटक के दौरे पर थे तो उनकी कार्यशैली को देखकर पिताजी बताए थे कि वह बैंगलोर में रुके हुए थे और बेंगलुरु में जो उत्तर भारत के बच्चे पढ़ने गए थे वह सब उनसे मिले और उन्होंने अपनी समस्या उनके सामने रखी कि हम लोग यहां पर निजी कॉलेजों में इंजीनियरिंग और मेडिकल के लिए आते हैं हमारा यहां आने से प्रदेश का वित्त भी प्रभावित होता है और हमारी शिक्षा और समय भी।नेता जी ने इस डेलिगेशन के इस सवाल को बहुत गंभीरता से लिया और कार्यक्रम खत्म होने पर प्रदेश के सचिवों एवं शिक्षा विभाग से जुड़े अधिकारियों को विशेष विमान से कर्नाटक बुलाया और उनसे कहा कि आप यहां पर अध्ययन करिए कि इस तरह की शिक्षा व्यवस्था उत्तर प्रदेश में कैसे शुरू की जा सकती है? इस तरह की कार्यशैली थी नेताजी की और यही कारण था कि उस समय बहुत तरह के संस्थान उत्तर प्रदेश में भी खोले गए। नेताजी इस तरह से काम करते थे यह बात पिताजी बताते रहते थे।
जैसा बताया कि हमारे व्यापार में आ जाने के बाद पिताजी राजनीति के साथ साथ सामाजिक बदलाव की प्रक्रिया को गति गति देने के लिए वह और अधिक सक्रियता काम करना शुरू किए। पिताजी बहुत सारी संस्थाओं संस्थापन में सहयोग किये लेकिन वह कभी भी संस्थाओं के संचालक पद जैसे ओहदों से दूर रहे उनकी रूचि किसी चीज को बेहतर बनाने की होती थी उनका उसमें पद लेने में कोई रुचि नहीं होती थी बल्कि वह संस्थाओं को अच्छे लोगों से जोड़ते थे। यह बात उनके वसूलों में थी कि वह कभी भी किसी भी संस्था राजनीतिक हो या सामाजिक हो या शैक्षिक हो में कोई पद नहीं लिए और हमेशा उसके विकास और विस्तार की योजना पर काम करते रहे कमोबेश यही हाल राजनीति में भी रहा।जब वह कांग्रेस की राजनीति शुरू किए थे हालांकि उन्हें जिम्मेदारी दी गई थी लेकिन उनकी रूचि जिम्मेदारी वाले पदों की नहीं थी बल्कि उस पार्टी के लिए मदद करने की थी। उन्होंने उस समय कांग्रेस को बहुत ऊंचाई तक ले जाने में लोगों के साथ काम किया। जब नेता जी ने समाजवादी पार्टी बनाई तो उन्होंने समाजवादी पार्टी को महाराष्ट्र में विस्तारित करने के लिए बहुत काम किया परंतु उन्होंने कोई पद स्वीकार नहीं किया।पिताजी हमेशा ऐसे लोगों को सहयोग करते रहे जो लोग पार्टी को एक ऊंचाई तक ले जाना चाहते हैं और ऐसे लोगों के चयन और उनके प्रमोशन के लिए नेताजी उन्हें पूरा सहयोग करते थे। नेता जी ने कभी भी इनके कामों में दखलंदाजी नहीं की जिसका परिणाम यह था कि समाजवादी पार्टी का पार्टी के गठन के साथ ही महाराष्ट्र में अच्छी पकड़ शुरू हो गई थी।
पिताजी के मन में समाज और राजनीति के लिए जो विचार था उसको उन्होंने अपनी तरह से पूरा किया । कभी भी उन्होंने जनप्रतिनिधि इत्यादि बनने की इच्छा जाहिर करना तो दूर की बात उन्हें नेता जी ने कई बार प्रस्तावित भी किया लेकिन उन्होंने ऐसा कोई पद स्वीकार नहीं किया यही उनकी विशेषता थी और इसी विशेषता की वजह से आजीवन नेताजी उन्हें बहुत सम्मान देते रहे। उनका स्वभाव ऐसा था कि वह लेने में विश्वास नहीं करते थे वह हमेशा देने में विश्वास करते थे। उनकी किसी भी तरह की ऐसी किसी भी वैचारिकी में संलिप्तता नहीं दिखाई देती थी जो राजनीतिक व सामाजिक रूप से उस समय के तमाम राजनेताओं में घर करती जा रही थी।उनकी बात को गंभीरता से लोग लेते थे क्योंकि वह जो भी बात करते थे निस्वार्थ भाव से करते थे। यही कारण है कि नेता जी से जब हमारी मुलाकात होती थी तो वह हमेशा यही कहते थे देखो अपने पिताजी की तरह बनो वह बड़ी से बड़ी बात बहुत कम शब्दों में कह जाते थे। नेता जी हमें भी चेताया करते थे, जब कभी उनसे मिलने जाता था नेताजी पूछते थे कि बताओ कैसे हैं सीताराम जी, कहता था कि ठीक है मगर आजकल कुछ याददाश्त कमजोर होती जा रही है तो नेताजी उदाहरण देते थे देखिए इस उम्र में ऐसा होता ही है, जॉर्ज फर्नांडीज और कई नेताओं का जिक्र करते थे। उन्होंने कहा कि जब मुंबई आऊं तो याद दिलाना हम उनसे मिलने आप के घर चलेंगे। मुझे याद है कि उन्हें किसी कार्यक्रम में मुंबई आना था और मैंने उन्हें याद भी नहीं दिलाया था लेकिन अपने कार्यक्रम में उन्होंने भिवंडी को जोड़ा हुआ था। सभा से पहले वह भिवंडी आए और पिताजी के साथ दो-तीन घंटे रहे। पिताजी से उन्होंने पूछा कि हमें पहचान रहे हैं फिर पूछा कि हमें पहचान रहे हैं फिर थोड़ी देर देखने के बाद पिताजी ने कहा कि तुम बहुत बड़े नेता हो, नेता जी उनकी बीमारी से द्रवित हुए ।एक और घटना है नेताजी जब 2003 से 2007 तक मुख्यमंत्री थे तो उसी मध्य नेता जी अस्वस्थ्य हो गए थे चल फिर नहीं सकते थे 5 कालिदास मार्ग पर बिस्तर पर थे तो उन्होंने वहां से कॉल करवाया और पिताजी से कहा गया कि नेताजी आपको बुला रहे हैं पिताजी आनन-फानन में गए और कई लोग वहां बैठे थे यहां तक कि चौधरी हरमोहन सिंह भी थे। पिताजी ने पूछा बताइए नेताजी क्या आदेश है सो नेता जी ने कहा नहीं मैं बीमार था मुझे आपकी याद आ रही थी आपको हमने बुलवा लिया था। नेताजी का उनसे आत्मीय संबंध था नेताजी से कोई भी बात कहने में वह हिचकिचाते नहीं थे। किसी समीक्षा बैठक में किसी कार्यकर्ता ने या नेता ने बढ़ा चढ़ा कर रिपोर्ट पेश कर दी तो नेता जी समझ गए क्योंकि वह जमीनी सच्चाई जानते थे फिर उन्होंने बाबू जी से पूछा कहिए सीताराम जी यह ठीक कह रहे हैं ? तो पिताजी ने हंसकर कहा नेताजी जमींदार दो तरह के होते हैं कुछ घुड़चढ़ा कुछ मेड़चढ़ा होते हैं। इस समय आपके यहां घुड़चढ़े जमीदारों की बहुतायत है जो घोड़े पर चढ़कर अपनी जमीन जायदाद देखते हैं जिन्हें जमीनी हकीकत से कोई लेना देना नहीं होता।तो इस तरह से पिताजी मुहावरों के माध्यम से भी अपनी बात कहते थे उसको नेता जी बहुत गंभीरता से लेते थे। हमेशा संबंधों का बहुत ध्यान रखते थे।
2004 के लोकसभा चुनाव के पहले की बात है मैं भिवंडी में पार्षद था, उन दिनों राज बब्बर जी पार्टी में थे और महाराष्ट्र में काफी सक्रिय हुआ करते थे, पार्टी को महाराष्ट्र में बढ़ाने की बात हो रही थी क्योंकि पार्षदों का चुनाव बहुत ही ग्राउंड लेवल पर होता है, इसलिए राज बब्बर ने पिताजी से कहा कि इनको पार्षद का चुनाव लड़ाईए कोई तो भिवंडी से नेतृत्व करने वाला होना चाहिए पिताजी ने कहा कि भाई मेरा काम धाम कौन देखेगा पर कोई विरोध भी नहीं किया, षायद अंदर से उनका भी मन रहा हो। मैं चुनाव लड़ गया जो हमारा पुराना मोहल्ला था सभी लोग भलि भांति परिचित तो थे ही परिणाम आया तो ऐतिहासिक जीत हुई। क्योंकि इससे पहले भी मैं राजनीति में था और 1996 से ही पार्षद इत्यादि के पद पर जीतता रहा था।उस समय मेरी उम्र लगभग 26 - 27 वर्ष की रही होगी। इस तरह से तमाम नेताओं से परिचय था और लोगों से मिलता जुलता रहता था। 
2004 के चुनाव के पहले नेताजी मुंबई आए थे उस समय पिताजी सुबह-सुबह, जैसी उनकी आदत थी उनसे मिलने चले जाते थे, सुबह के समय पिताजी थे और हमारे ससुर जी मुंबई आए हुए थे तो वह भी उनके साथ थे और दो चार लोग और साथ गए थे। यह सबलोग जब मिलने गए तो नेता जी ने उनसे कहा कि अबकी सीताराम जी अजय को जौनपुर से लोकसभाउम्मीदवार बनाना है। पिताजी ने कहा कि कैसे जौनपुर लड़ेंगे हम लोगों को जौनपुर का क्या अनुभव है ? नेता जी ने कहा कि अखिलेश जी के लिए भी तो टीम तैयार करनी होगी। पिताजी ने कहा कि ठीक है नेताजी आपकी जैसी आज्ञा होगी आपके जिम्मे है हम इस विषय में कुछ नहीं जानते जो कुछ करना है आपको करना है और उन्होंने कहा कि अभी इसकी चर्चा मत करिएगा औपचारिक रूप से घोषणा होने के बाद होगी। परंतु पार्लियामेंट्री बोर्ड ने जब नामों की घोषणा कर दी तब अखबारों में यह खबर छपी संभवतः मार्च का महीना था। यह खबर आने के बाद तो जौनपुर के नेताओ में खलबली मच गई और जो एक दूसरे के विरोधी भी थे वह सभी एक साथ आ गये और गोलबंद हो गए। यह सब मिलकर के पूरे जौनपुर के कथित नेता, नेताजी के पास विरोध के लिए चले गये मजबूर होकर उन्होंने अपना फैसला बदलना पड़ा।उस समय मुझे पता चला की गोलबंदी क्या होती है हमलोग तो सीधी राजनीति में विष्वास करते हैं और समाजवादी सोच रखते हैं और यही उद्देश्य पिताजी का भी था।राजनीति में यह बहुत महत्वपूर्ण है कि आप कैसे पहचानेंगे कि कौन आपका है और कौन पराया है यह मैंनेउस बार की राजनीति में देखा, 24 घंटे आदमी हमारे साथ रहता है और मौके पर जाकर वह किस तरह की बात करता है विरोध करता है या समर्थन करता है इसका पता नहीं चलता।हालांकि बाबूजी इस पर दबाव बनाते तो नेताजी किसी तरह का परिवर्तन न करते लेकिन पिताजी कभी भी इस तरह से नेताजी को किसी दबाव में लेने की कोशिश नहीं करते थे और बाद में भी उन्होंने कभी इस बात का जिक्र तक नहीं किया कि मेरे टिकट का क्या हुआ ? यह उनके स्वभाव में नहीं था। राजनीति में कोई अंतिम दिन नहीं होता हमेशा राजनीति में इस तरह की घटनाएं घटती रहती है।
उनके सामाजिक और राजनीतिक जीवन को अलग अलग नहीं किया जा सकता। वह समाज के लिए ही राजनीति करते थे राजनीति क्या करते थे सक्रिय रहते थे।  उनका समाज में आना जाना और जो लोग राजनीति में सक्रिय होते थे उनको प्रमोट करना और उन्हें आगे बढ़ाने का उनका प्रयास रहता था।वो चाहते थे कि जो लोग समाज में अच्छी तरह से काम कर सके समाज को आगे ले जा सके उनको राजनीति में प्रमोट करना चाहिए और वह करते भी थे।पहले भी यह बात आई है कि किसी भी क्षेत्र में प्रतिभाशाली हो उसको प्रमोट करने का काम करते थे चाहे वह किसी भी क्षेत्र में हो, मुझे याद है कई बच्चे बाहर भी पढ़ना चाहते थ,े कई मेडिकल के क्षेत्र में रूस आदि देषों जाते थे सबको कहीं ना कहीं किसी न किसी तरह की मदद की जरूरत होती थी और वह मदद करते थे। विद्यालय इत्यादि को भी प्रमोट करने के लिए वह हमेशा सहयोग करते रहे क्योंकि यह उनके स्वभाव का हिस्सा था। 
एक बात और बताना चाहूंगा कि जिससे भी उनका संबंध था औपचारिकता नहीं थी क्योंकि वह ग्रामीण पृष्ठभूमि और मजदूर की पृष्ठभूमि से ऊपर उठे थे इसलिए उनके साथ जो भी थे, रिश्तेदारी में और समाज में जो लोग उनके साथ जुड़े थे सबकी व्यक्तिगत रूप से जानकारी लेते रहना कि उनके बच्चे क्या कर रहे ह,ैं उनके क्या हाल-चाल हैं, परिवार के लोगों का क्या हाल है, उनके स्वास्थ्य इत्यादि का भी ध्यान रखते थे। अगर किसी को किसी भी तरह की बिमारी है तो अस्पताल एवं दवाई इत्यादि की व्यवस्था करते थे।कई बार तो ऐसा होता था जैसे किसी को बहुत दिन हो गया है और वह नहीं समय निकाल पाता था तो पिताजी खुद उसके यहां चले जाते थे और कहते थे कि बहुत दिन हुआ कोई हालचाल नहीं मिला। पता लगाकर कि कहां रहते ह,ैं किस झोपड़पट्टी में रहते हैं या धारावी में रहते हैं तो पिताजी खुद चले जाते थे, कहते थे बहुत दिन से हालचाल नहीं मिला तो हमने कहा मिल लेते हैं । उनके न रहने के बाद लगभग 8 साल बीत गए हैं बहुत लोग ऐसे मिले जिनको मैंने कभी देखा नहीं है लेकिन वह कहते हैं कि आपके पिताजी से हमारा बहुत अच्छा संबंध था, ऐसे बहुत सारे लोग मिल जाते हैं और बहुत भावुक क्षण हो जाता है, बताने लगते हैं कि फला जगह हमारी उनसे मुलाकात हुई थी। उनकी प्रकृति ऐसी थी, उनका रहन-सहन और स्वभाव ऐसा था कि लोगों के मन में उनकी छवि बस जाती थी।
उन्होंने व्यापार शुरू किया तो व्यापार में सबसे बड़ी चीज होती है विश्वसनीयता। आदमी की विश्वसनीयता ही उसके व्यापार की पूंजी होती है। मैं समझता हूं कि जिसके साथ भी बाबूजी का व्यवहार या व्यापार रहा है वह बहुत ही विश्वसनीय रहे बाबू जी से। यदि किसी व्यापारी को माल सप्लाई करना है तो उसको विश्वास रहता था कि समय पर उसका भुगतान हो जाएगा उनसे किसी ने कपड़े या किसी भी सामग्री का जो उनका काम था, ऑर्डर कर दिया तो उसे पूरा विश्वास होता था कि क्वालिटी और सप्लाई समय पर और बेहतरढ़ंग से हो जाएगी। क्वालिटी इत्यादि का हमेशा ध्यान रहता था और व्यापारियों को इसका विश्वास भी। उनके बहुत व्यापक व्यापार को मैंने देखा बहुत अच्छे स्तर पर उन्होंने काम किया लेकिन इनको व्यापार में कभी हमें तनाव में नहीं देखा जैसा कि आजकलहम लोग देखते हैं। यदि उसी को हम 35 साल पीछे ले जाते हैं तो जब बाबूजी का समय था उस समय पैसे का जो भी मूल्य रहा हो आज के हिसाब से काफी बड़े पैमाने पर काम था। जितना आज के समय में लोग परेशान हैं व्यापार में कंपटीशन बहुत है मंदी बहुत है लेकिन उस समय बाबू जी बिल्कुल परेशान नहीं होते थे। समय से फैक्टरी जाते थे सारी चीजें देख ताक करके दोपहर के भोजन के लिए घर आते थे भोजन करते थे और आधा घंटा आराम भी करते थे और भी जो जरूरी काम होता था उसे भी करते थे, फिर फैक्ट्री आकर समय से घर जाना बच्चों के साथ समय बिताना और वर्ष में दो तीन बार परिवार को लेकर कहीं न कहीं पर्यटन पर जाना और गांव को भी काफी समय दिया करते थे। 
1990 के बाद तो काफी समय तक अपने जन्मभूमि पर रुकना आरंभ कर दिए थे।उन्होंने अपने जीवन के हर पहलू को पारिवारिक, सामाजिक, व्यापारिक, राजनीतिक और आध्यात्मिक जीवन को भरपूर आनंद और जिम्मेदारी से जिया। हर क्षेत्र में उन्होंने अपना एक प्रतिमान स्थापित किया जो हम सब के लिए एक आदर्श है। आम लोगों मेंउतना समर्पण भाव अब देखने कोनहीं मिलता है। मुझे लगता है कि वह अपने कार्य और अपने जीवन से पूर्ण संतुष्ट थे।
जब से हमने देखा है हमारे माता पिता दयालु प्रवृत्ति के थे जहां तक हमने देखा कि धार्मिकता के क्षेत्र में कर्मकाण्ड और पाखंड में उनका विश्वास नहीं था। मूर्ति पूजा अंधविश्वास या नाना प्रकार से धर्म के नाम पर पाखंड किए जाते हैं वह उनमें विश्वास नहीं करते थे। हालांकि उन्होंने किसी का अनादर नहीं किया और ना ही कभी इस तरह की चीजों पर किसी के लिए टिप्पणी की। जनेऊ पहनने में, कलावा बांधने में, कथा वार्ता सुनने में उनका कोई विश्वास नहीं था। जिस दिन वह पहली बार गांव से चलकर यहां आए गांव के लोग बताते हैं उस दिन गांव में किसी की मृत्यु हुई थी और उस पर एक बेकार का भात खाया जाता है ऐसी परंपरा है कि बेकार का खाना खाने के बाद कोई गांव से बाहर नहीं निकलता या कहीं आता जाता नहीं है लेकिन उसी रात वह वहां से निकल गए। शुरू से ही उनका अंधविश्वास के प्रति कोई विष्वास नहीं था। ऐसा उन्होंने क्यों किया होगा गांव में इस तरह की कोई शिक्षा तो थी नहीं लेकिन ऐसा लगता है कि उससे पहले की भी जो पीढ़ी थी उसको कभी कर्मकांड करते या सत्यनारायण की कथा सुनते नहीं देखा होगा। गांव के लोग थे पूजा के नाम पर प्रकृति पूजा में विश्वास रखते थे अपने खेतों के या गांव के सरहद को पेड़ों को जल चढ़ा देते थे या नीम के पेड़ पर पानी चढ़ा देते थे जो आमतौर पर कृषक परिवारों में होता हैलेकिन पिताजी को कभी भी किसी भी कर्मकांड में कोई रुचि नहीं थी।
हमारे गांव के ही कुछ लोग जो मुम्बई में रहते थे जिनके यहां गढ़वा घाट आश्रम के एक स्वामी जी प्रत्येक साल आया करते थे। एक बार लोगों के साथ वह भी चले गए और जाने के बाद जो वहां सुना होगा, देखा होगा और समझा होगा अक्सर वहां पर समाज के दबे कुचले और वंचित लोग ही आते थे, और स्वामी जी की तरफ से भी हवन पूजन अंधविश्वास या किसी भी तरह के पाखंड को बढ़ावा नहीं दिया जाता था, लोगों को ध्यान कराया जाता है और समता और समानता की बात की जाती है एक शक्ति है उसी का सारा खेल है यह बात बताई जाती है।यह सारी बातें उनको अच्छी लगी जिससे प्रभावित होकर वह इस आश्रम से जुड़ गए। अपने जीवन के अंतिम समय तक उस आश्रम से जुड़े रहे और उसी में वह इतना इंन्वॉल्व हो गए कि उनकी मृत्यु के कुछ पहले उन्हे सन्यासी घोषित कर दिया गया और उसी संत परंपरा के अनुसार उनका अंतिम संस्कार भी जल समाधि देकर किया गया। यह उनकी थी आध्यात्मिक यात्रा यह रूहानी यात्रा, जिसका संबंध सूफी संत परंपरा से जुडता है।
आने वाले दिनों में यह तय करना है कि आगे क्या करना है क्योंकि व्यवसाय की एक लिमिट है और 
पिताजी की जो अवधारणा थी कि अपने काम (व्यापार) के साथ समाज के लिए भी कुछ करना है और यदि हम किसी के काम ना आ सकें तो पिताजी के बनाए हुए आदर्शों का कोई मतलब नहीं हैं। 
आज की तारीख में राजनीति का व्यवसायीकरण भी हो गया है लोग राजनीति करके अंबार खड़ा कर देते हैं तो कह सकते हैं कि राजनीति को व्यापार बना दिया हैजो पूर्णतः अनैतिक है। 
- अजय यादव



                                                                                                                              सम्पादकीय

उनकी सादगी, सामाजिकी, आर्थिकी, औद्योगिकी, 
राजनैतिक व आध्यात्मिक वैचारिकी पर शोध जरूरी है
- डा.लाल रत्नाकर


इतिहास और वर्तमान का संबंध हमें हमारी दुनिया से वाकिफ कराता है। अब विचारणीय यह है कि आप के इतिहास बोध के बारे में आपके पास क्या है?जाति, वर्ग, वर्ण और धर्म में व्यक्ति इस तरह से उलझा और बंटा हुआ है जिससे वह सत्य और असत्य की विवेचना में अनेकों त्रुटियां करता रहता है।निश्चित रूप से देखा जाए तो अपना इतिहास बहुत कम लोगों को पता होता है, यदि उसका कोई दस्तावेज नहीं है तो।कई जगहों पर व्यवस्था भी इसमें बहुत सहयोगी होती है जो किसी को भी इतिहास पुरुष बना देती है जबकि असली इतिहास के हकदार को विस्मृत कर जाती है। जिस के अनेकों कारण हो सकते हैं यथा जब हमलोग अपने महापुरुषों के कामों को देखते हुए भी जिन्होंने आजीवन संघर्ष करके सत्य को समाज के सामने प्रस्तुत किया और असत्य से दूर करने के लिए पूरा जीवन लगा दिया जिसके बावजूद उनके किए गए कार्यों को आज हमारा समाज कोई महत्त्व नहीं देता उल्टे उस रास्ते पर चला जाता है जिसको वह बार-बार बताते रहे हैं कि यह रास्ता उनके लिए नहीं है।यह चिंता हमारे सामने लंबे समय से मुंह फैलाए विकराल रूप ले करके खड़ी हुई है।

स्मृतिशेष सीताराम यादव सेठ जी (बाबू जी) से मेरी मुलाकात अनेकों बार हुई जहां तक मुझे याद है पिताजी के जमाने में समाज के बहुत सारे वह लोग जो समाज के लिए चिंतित थे निरंतर आना जाना था लगा रहता था। वह दौर ऐसा था ना तो फोटो खींचा जा सकता था और ना ही किसी तरह से उनकी बातचीत को ही रिकॉर्ड किया जा सकता था।जहां तक मुझे याद आता है कि वह ऐसे लोग थे जो अपने समय में समाज के लिए एक मानदण्ड बन चुके थे और समाज को इन पर गर्व महसूस होता था कि इन्होंने अपनी कर्मठता और कर्तव्य परायणता का जिस तरह से सदुपयोग किया है और उसके माध्यम से समाज में अपनी जगह बनाई है वह निश्चित रूप से आने वाली पीढ़ी के लिए अनुकरणीय है।

मेरे मन में निरंतर यह बात आती रहती थी जबकि आमतौर पर लोगों की मित्रता अपनी उम्र के लोगों से होती है और उसी में अपना समय निकाल देते हैं मेरे साथ कुछ विपरीत था। मेरी दोस्ती या यह कहें कि लगाव समाज के उन वयोवृद्ध लोगों से हुआ करता था जिनके पास अनुभव का खजाना था। उनके खजाने से मुझे क्या-क्या मिला है यह तो मैं नहीं बता सकता लेकिन जब मैं उन स्थितियों को स्मरण करता हूं और एक-एक पल का सदुपयोग करता हूं तो मुझे लगता है कि यह ज्ञान उन्होंने ही दिया है जो अमूर्त रूप से समाज निर्माण के पीछे एक आदर्श की तरह अपनी उपस्थिति दर्ज कराए हुए थे।

हमारे पास बाबू जी की सोच के जो अनुभव हैं वह यद्यपि बहुत ज्यादा तो नहीं है लेकिन जितना मैं उनको जान पाया, उसके आधार पर मैं यह कह सकता हूं कि उनकी चिंता निश्चित रूप से हमारे समाज निर्माण के लिए बहुत बड़ी चिंता थी।

यहां पर उस घटना का उल्लेख करना आवश्यक समझता हूं जो यद्यपि क्षणभर की थी लेकिन उसका सार और तासीर बहुत ही महत्त्वपूर्ण, गंभीर और वैचारिक था। हमारे जनपद जौनपुर के औंका गांव के आदरणीय राम कुबेर यादव जी एडवोकेट (हाईकोर्ट इलाहाबाद) जो एयरफोर्स से सेवानिवृत्त हुए थे और उनके अनुज आदरणीय रामकृष्ण यादव जी भी उसी सेवा से सेवानिवृत्त हुए थे इनके यहां कोई सामाजिक आयोजन था जिसमें मैं भी शामिल हुआ था । जहां तक मुझे याद आता है उन दिनों मैं अमेठी में नया-नया लेक्चरर लगा था। यह वही दौर था जब देश में आरक्षण और सामाजिक न्याय की लड़ाई का आंदोलन अपने उत्कर्ष पर चल रहा था। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के बहुत सारे युवा विद्यार्थी हमारे इर्द-गिर्द बैठे हुए  विविध विषयों पर काफी गहमा-गहमी में अपनी अपनी बात रख रहे थे और इस समूह से थोड़ा अलग वरिष्ठ लोगों की बैठकी चल रही थी जिसमें हमारे समाज के तमाम बरिष्ठतम लोग शामिल थे। किसी युवा ने आपत्ति की कि आजकल क्या हो रहा है मेरिट को हर जगह नकार दिया जा रहा है और उन लोगों का चयन हो रहा है जो किसी खास वर्ग और जाति से आते हैं।बात बहुत माकूल थी मैंने उनका उत्तर तो नहीं पर उनके सामने एक सवाल जोरदार शब्दों में उछाला कि भाई इसके पीछे आपके समाज का कितना बड़ा योगदान है इस पर भी विचार करना होगा, क्योंकि हमारे लोगों ने कितनी संस्थाएं बनाई हैं जिनकी सामर्थ्य हुई उन्होंने अपने लिए तो दुनिया बनाई लेकिन समाज के लिए उनका क्या योगदान है ?

मेरी बात पूरी ही हुई थी कि वह अपनी बैठकी से उठे और हमारी टीम के पास आकर उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए कहा कि बिल्कुल ठीक कह रहे हो मैं  उन्हें देखकर हतप्रभ था। मुझे लगा मेरा सवाल निश्चित रूप से प्रभावी है, जब यह महसूस किया जाने लगा था की देश में हक और अधिकार की लड़ाई के चलते किन किन संस्थाओ पर किन का कब्जा है । मुझे लगा कि मेरे सवाल को जिन्होंने गंभीरता से लिया गया है अन्यथा उस समूह में जितने लोग बैठे थे पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला था । इस सवाल को जिन्होंने गंभीरता से लिया तो वह बाबूजी थे । वह ऐसा दौर था जब कोई वरिष्ठ आपके विचार को, आपकी बात को मान्यता दे दे तो ऐसा लगता था कि जैसे सवाल जायज है। उनका यह कहना मुझे अंदर तक झकझोर दिया कि यह दर्द केवल मेरे अंदर ही नहीं है इस दर्द को वह हर व्यक्ति गहराई से महसूस करता है जो भी दुनिया देखा है, दुनिया विशेषकर अपने देश में प्रतिस्पर्धा के क्षेत्र में भेदभाव को देखा और महसूस किया हो।बात आई गई हो गई समय गुजरता गया मैं तमाम उन लोगों को जानता हूं जो अपने जीवन में अपने ऐशो आराम के लिए सब कुछ किए अपनों को ही ठगे, बर्बाद किए जीवन भर मुकदमा लड़े और दुनिया से चले गए । उन्होंने ऐसा कुछ नहीं छोड़ा जो वास्तव में अनुकरण करने योग्य हो।

आज जब मैं “ताना-बाना स्मृतिशेष  सीताराम यादव जी की जीवन यात्रा ग्रंथ पर काम कर रहा हूं इसके लिए मुझे उनका वह संदेश ताकत देता है की हमारे पास संस्थाएं कहां है, हमारे पास वैचारिकी कहां है, हमारे पास वह लोग कहां हैं जो इन सब बातों पर चिंता करते हो। बातें छोटी भले हों पर संदेश बहुत बड़ा देती हैं और जो इन बातों पर गौर करते हैं वह निश्चित रूप से बड़े होने की प्रक्रिया में शामिल होते हैं उन्हें यह एहसास होता है कि कहां गड़बड़ी हुई है। कार्य करने के लिए जिन संसाधनों की जरूरत होती है, वाकई उस पर विचार करना बहुत जरूरी है जो लोग भी किसी भी तरह का साहित्य बनाते हैं और उसके लिए कार्य करते हैं तो हमने देखा है कि वह अनेकों तरह का दुस्साहस करते हैं और ऐसी ऐसी चीजें समाहित कर देते हैं जिनका कोई वैचारिक आधार नहीं होता न ही कोई प्रमाण होता है।

इस बहुउद्देशीय पर जटिल काम के लिए  ऐसा प्रतीत हो रहा था कि क्या हमारे पास इतनी सामग्री उपलब्ध हो जाएगी की वह पुस्तक का आकार ले सकेगी। जिन जिन लोगों से बात हुई है उनकी बातचीत के पूर्व की यह धारणा बराबर हमें परेशान कर रही थी क्योंकि उनके जमाने के लोग जो उनको ठीक से समझते थे जिनसे बात हो सकती थी मुझे ऐसा लग रहा था कि कौन है जो उनको बता पाएगा, हमलोग जब इस किताब की योजना बनाऐ थे जिन लोगों का नाम उस सूची में लिखा गया था उनमें से कई लोग इस बीच दुनिया से चले गए जिसमें सबसे महत्वपूर्ण आदरणीय नेताजी माननीय मुलायम सिंह यादव जी, चौधरी हरिमोहन सिंह यादव, स्मृति शेष रामकरण यादव उर्फ दादा, ईश दत्श्यात म नारायण यादव,डॉक्टर दिनेश सिंह यादव जी, डॉ.मनराज शास्त्री जी ,.......... का नाम उल्लिखित है।

उनके सुयोग्य पुत्र श्री अजय यादव जी के साथ जब उनके बारे में जानने वालों की सूची बनाना शुरू किया तो सबसे पहले मुंबई के उनके इर्द-गिर्द काम करने वाले लोगों पर दृष्टि गई। यहां यह उल्लेखनीय है कि इस दौर में जिन लोगों से हमें बातचीत कर सामग्री प्राप्त हुई है उनमें से अधिकांश लोग ऐसे हैं जो लोग अपनी व्यस्तता की वजह से समय से लिखकर कुछ देने में असमर्थ थे। अब यह विचार आया कि उन लोगों से बातचीत करके क्योंकि उसमें काफी लोग वरिष्ठ के साथ-साथ ऐसी उम्र में है कि उनसे कुछ भी लिख करके मांगना आसान नहीं था। फिर भी जिन लोगों ने लिखा है वह साधुवाद के अधिकारी हैं।

बाबूजी का जीवन उद्देश्य वैसे तो अनेक बिंदुओं पर समय-समय पर जाता रहा है लेकिन यदि उसको श्रेणीबद्ध किया जाए तो मुख्य रूप से सामाजिक क्षेत्र, व्यवसायिक क्षेत्र, राजनीतिक क्षेत्र के साथ-सथ उनकी आध्यात्मिक वैचारिकी। जो उनकी पूरे सांस्कृतिक स्वरूप को दर्शाती है। उनके विषय में लिखने के लिए और उनके विचारों को समझने के लिए उपर्युक्त बिन्दुओं को आधार बनाकर आमतौर पर लोगों से बातचीत की गई है लेकिन उनके जीवन के जिन जिन पहलुओं को जो लोग जितना समझ पाए हैं उस पर उन्होंने अपनी बात रखी है। पूरी बातचीत में बहुत बार ऐसी स्थितियां आई हैं जब एक ही बात को अनेकों लोगों ने दोहराया है, वह उनके अपने अधिकार क्षेत्र का मामला रहा है लेकिन बातचीत को अक्षरों में परिवर्तित करते समय यह पूरी कोशिश की गई है कि इस तरह के दोहराव से बचा जाए। उनके सामाजिक पहलू पर बात करते हुए लोगों ने यह बार-बार दोहराया है कि वह उत्तर प्रदेश के सुदूरवर्ती गांव से निकल कर मुंबई आए आमतौर पर यह पक्ष रखने के लिए आधिकारिक रूप से जिनको समझा जाता है वह ऐसे लोग होते हैं जिन्होंने उनको बचपन से देखा है उनकी प्रतिभा को समझा है क्योंकि भारत जिस तरह का देश है यहां पर कर्म के सिद्धांत को अनेक शास्त्रों में महत्व दिया गया है जिसमें निरंतर कार्य करने की क्षमता का ही उल्लेख मिलता है। हमारे अनेक शास्त्रीय ग्रंथों ने हमें अनेक रास्ते पर चलते हुए जीवन को प्रगतिगामी मार्ग तक ले जाने और अपने साथ समाज को अपनी सामर्थ्य के अनुसार सुदृढ़ करने संजोने का जो संदेश मिलता है उसको उन्होंने अपने जीवन में उतार लिए थे। बातचीत के बीच कहीं पर भी यह बात नहीं आई कि उन्होंने किसी का किसी तरह से अहित नुकसान किए हो। ऐसा व्यक्ति जो तमाम गलतियों को नजर अंदाज करता हुआ अच्छाइयों को बांटता फिरता हो ऐसे रूप का उल्लेख लगभग सभी लोगों ने किया है। उदाहरण के लिए जब हम प्रोफेसर उदय प्रताप सिंह से बात करने गए तो उन्होंने उनकी सामाजिकता पर अद्भुत बात कही जिसको हम उनके आलेख में देख पाएंगे। ऐसा ही एक उद्धरण उनकी व्यावसायिकता पर बताते हुए श्री राम ब्रिज सिंह यादव ने कहा जिसको उनके जीवन के व्यवसायिक मूल्यांकन के लिए सूत्र के रूप में समझा जा सकता है। उनकी इसी आर्थिक और उद्यमी सोच को बताते हुए कर्नल बी प्रसाद ने अपने संदर्भ में जो बात कही है वह बहुत कम लोग अपनी बातचीत में कह पाये हैं।

उनके राजनीतिक पहलू को समझने के लिए जिन लोगों से बातचीत हुई उन्होंने यह बात स्वीकार किया की उनकी राजनीतिक दूरदर्शिता का मूल्यांकन करने के लिए आमतौर पर सामान्य लोग नहीं समझ सकते कि वह राजनीतिक रूप से कितने समृद्ध थे। कहीं-कहीं कई कई लोगों के विचार राजनीति के प्रति लगभग वैसे ही नजर आए जो आमतौर पर राजनीति को जानते ही नहीं बल्कि उन्होंने राजनीति को केवल अपनी उपलब्धि से जोड़कर देखते हैं। उनके दृष्टिकोण को बाबूजी की राजनीतिक व्याख्या के लिए निश्चित रूप से समझ पाना दुभर ही रहा है।

सबसे महत्वपूर्ण उनका आध्यात्मिक पहलू रहा है। इस आध्यात्मिक पहलू को समझने के लिए उस पर संवाद करने के लिए उस पर लिखने के लिए कई लोगों ने बहुत महत्वपूर्ण जानकारियां दी हैं। वह जिस विचारधारा के केंद्र से जुड़े, वह उनकी आध्यात्मिक भूख का केंद्र रहा है। जो लोग भी आध्यात्मिकता को धर्म से जोड़कर देखते हैं उन्हें संभवतः यह बात समझ में नहीं आएगी की वह अध्यात्म को किस रूप में ले रहे थे और अपने आध्यात्मिक विचारधारा के उपकेंद्र के रूप में जो उन्होंने निर्माण कराया निश्चित रूप से अन्य ऐसे तमाम लोगों के लिए भविष्य में भी वह उस आध्यात्मिक संत परंपरा के संदेश को प्रसारित करते रहें उनकी वैचारिकी का यह प्रमुख कारण रहा है। अनेकं लोगों से बातचीत में कभी किसी ने भी यह नहीं कहा कि वह आज या परम्परा से समाज में व्याप्त कुरीतियों के साथ कभी भी खड़े दिखायी दिएहों बल्कि अनेक लोगों ने यह कहा है कि वह अंधविश्वास, पाखंड के साथ-सथ  अनेकों कुप्रथाओं के खिलाफ थे जिनमें पूरे समाज में व्याप्त दहेज प्रथा, मृत्यु भोज, बाल विवाह इत्यादि को चिन्हित किया जा सकता है।

उन्होंने अपने जीवन में शिक्षा को कितना महत्व दिया है यह बताते हुए लोगों ने कई बार शिक्षा और धन की देवियों का जिक्र किया है मेरे ख्याल से उनके द्वारा शिक्षित किये गये परिवार,समाज के शिक्षा और अर्थ के संबंध को समझने में कहीं ना कहीं बड़ी भूल करता हुआ नजर आया है। शिक्षा आपको समृद्धि से कहां रोकती है, दुनिया के सारे देश जो जितने ही वैज्ञानिक रूप से सुशिक्षित और काबिल हैं वह जीवन में उतने ही संपन्न और खुशहाल हैं, यह मंत्र बाबूजी को अच्छी तरह पता था इसलिए उन्होंने अपने लोगों के शिक्षित होने के साथ-साथ अपने मूल निवास के गांव के इर्द-गिर्द कि आने वाली पीढ़ी शिक्षित हो उसके लिए गांव में एक विद्यालय की स्थापना तो की ही है अनेकों लोगों ने यह बताया है कि उनके बनाए हुए संस्थानों को उन्होंने आगे खुले मन से सहयोग किया है।

उनकी सादगी, उनकी सामाजिकी, आर्थिक औद्योगिक, राजनैतिक एवं आध्यात्मिक वैचारिकी का संपूर्ण अध्ययन करना निश्चित रूप से एक शोध का कार्य है, जिसे इस ग्रंथ में समाहित कर पाने में हो सकता है कि सफलता न मिली हो लेकिन शुरुआत तो हुई है। मेरे ख्याल से विद्वतजन इसका अध्ययन करते हुए उन त्रुटियों को नजरअंदाज करेंगे जिन्हें संपूर्णत्व में देखने की आदत है। यहां पर उन लोगों का उल्लेख करना अनिवार्य है जो हमारे समाज को ही नहीं पूरे देश को अपनी नजर से देखते हुए बहुत महत्वपूर्ण कार्य अनेक क्षेत्रों में कर रहे हैं जिनमें श्री उर्मिलेश जी श्री बी आर विप्लवी जी, डॉ ओम प्रकाश कश्यप जी। सहयोग और आभार की श्रेणी में तो पूरा समाज समाहित है लेकिन यदि श्री सीताराम यादव पूर्व मुख्य प्रबंधक स्टेट बैंक का सहयोग ना मिलता तो यह कार्य संभव नहीं था, जिनसे भी बातचीत हुई है या जिन्होंने उनके बारे में लिख कर दिया है उनके सहयोग के बिना यह काम संभव ही नहीं था, इस ग्रंथ के प्रकाशन का दायित्व विप्लवी प्रकाशन लखनऊ ने निर्वहन किया है उनके सहयोग के लिए उनका आभार कहना और करना संपादक का दायित्व बनता है।

सारे कार्यों का प्रबंधन करते हुए अजय भाई ने अपने व्यस्ततम समय से जितना समय इस कार्य के लिए निकाला है वह निश्चित रूप से इस कार्य के पूर्णता के लिए आवश्यक ही नहीं बेहद जरूरी काम था जिसको उन्होंने बहुत ही गंभीरता से पूरा किया है। परिवार जनों का सहयोग और उनके सपने उनकी परिकल्पना निश्चित रूप से आधुनिक और वैश्विक पटल से इसे जोड़ने की रही है चाहे डॉ संजय डॉ कुमार संदीप या डॉ सलोनी, वेदांत और प्रभु हों, मैं तो उन्हें यही कहूंगा कि हमने तो एक आधार रखा है बिल्डिंग तो आप लोगों को खड़ी करनी है उसमें जितनी भी तकनीकी खूबियां समाहित कर सकेंगे वह बाबू जी द्वारा शुरू किए गए आंदोलन का आधुनिक रूप होगा। परिवार की नजर में बाबूजी का एक बहुत ही अलग रूप रहा है माता जी के बारे में लिखते हुए कहीं ना कहीं उनके योगदान को उल्लिखित करने में हम कामयाब ना हो पाए हो लेकिन बच्चों के मन में पारिवारिक परिदृश्य का जो रूप रहा है उसे भी इसमें समाहित किया गया है।

...डा.लाल रत्नाकर

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