आलेख

 

अजातशत्रु श्री सीताराम यादव जी 

- कृपा शंकर सिंह
पूर्व मंत्री महाराष्ट््र सरकार 

अजातशत्रु शब्द का जो प्रयोग होता है यदि कुछ लोगों पर लागू होता है तो उसमें श्री सीताराम यादव जी अग्रणी हैं। 
उनका गांव और हमारे गांव के बीच की दूरी लगभग 4 से 5 किलोमीटर की है उनका गांव रमदेईया और मेरा गांव सहोदरपुर है। वहां पर भी रिश्ते पिताजी के समय से ही उनके घर से रहे हैं। कभी हमने उनके चेहरे पर चिंता नहीं देखी चाहे सामाजिक सवाल हो, व्यवसायिक सवाल हो, राजनीतिक सवाल हो या अन्य किसी भी तरह का कोई मामला हो उनके चेहरे पर कभी हमने चिंता की लकीर नहीं देखी, कितना भी बड़ा से बड़ा मसला हो अंदर से जितने भी वह गंभीर हो लेकिन चेहरे पर कभी नजर नहीं आता था।
कभी-कभी लोग जाति में उलझ जाते हैं, धर्म में उलझ जाते हैं, राजनीतिक विचारधारा और पार्टियों में उलझ जाते हैं मैंने कभी उनको अपने जीवन में इस तरह के किसी भी उलझन में उलझते हुए नहीं देखा। इसीलिए मैंने कहा की अजातशत्रु का जो स्वरूप लागू होता है वह उन पर लागू होता है।
उनके साथ की कई यादें हैं। कितना उल्लेख किया जाए यह तय करना होगा। जिनका उल्लेख सबसे पहले करना चाहूंगा मेरे भतीजे को ब्लाक प्रमुख चुनाव लड़ना था उन दिनों नेताजी हुआ करते थे आज वह नहीं है, मैंने कहा कि मेरे भतीजे को चुनाव लड़ना है वह बोले बिल्कुल वही चुनाव लड़ेगा और ऐसा नहीं था कि वह केवल कहते थे बल्कि उस काम को पूरा करके फिर बताते थे कि यह हो गया।
मुंबई में श्याम नारायण जी रहते थे उनको चुनाव लड़़ना था, उम्मीदवारी चाहिए थी ऐसे न जाने कितने उदाहरण हैं। जौनपुर में कितने लोगों को उन्होंने चुनाव लड़ाया और आज भी इन सब बातों को लोग याद करते हैं। कांग्रेस से किसी को लड़ना हो अच्छी उम्मीदवारी है तो उसके पक्ष में खड़े हो जाते थे।
माननीय मुलायम सिंह यादव जी से तो उनके इतने गहरे संबंध थे, वह चाहते तो सांसद बनत,े विधायक बनते और न जाने कितने बार चुनाव लड़ते लेकिन उन्होंने दूसरों को लड़ाया, कभी उनकी इच्छा नहीं हुई कि वह चुनाव लड़ें। अभी आप से बात हुई उनका चेहरा मेरे सामने आ गया हमेशा वह मेरे बड़े भाई की तरह खड़े रहे अब एक बड़े भाई और छोटे भाई में जो संबंध होता है उसका मैं हमेशा निर्वहन किया। मेरे पास तो उनके बारे में इतनी यादें हैं कि कागज,स्याही और शब्द कम पड़ जाएंगे लेकिन मेरे पास उनके व्यक्तित्व के हिसाब से कहने लायक कोई शब्द नहीं है।
इसी तरह कुछ यादें मैं आपको बता रहा हूं यादव संघ की बात और अपने गड़वाघाट आश्रम की बात : आज कांदिवली में जो आश्रम है मैं यह नहीं कहूंगा कि केवल उन्हीं की देन है लेकिन जरिया वही थे, विचार उन्हीं का था, आज जो कुछ भी वहां नजर आ रहा है वह उन्हीं की देन है। यह उन्हीं का प्रभाव था कि हमारे जैसे लोग जुड़े, पूरा समाज जुड़ा। उन्हें पूरा अधिकार था वह हमें डांट सकते थे, यह अधिकार उन्हें ही था लेकिन उनका जो तरीका था काम लेने का वह बहुत सरल था और कहा करते थे “का भाई कमवा ना होई बड़ा भरोसा तोहरे ऊपर रहा’’ ना भाई साहब हम एका ‘‘करब’’। उनका जो सलीका था डांटने का वह बहुत ही विनम्र था।
और भी कुछ घटनाएं बताऊंगा : एक बार हम लोग जा रहे थे एयरपोर्ट से उतरे किसी कार्यक्रम में जाना था। हमने उनसे कहा कि हमारे मित्र का कार्यक्रम है चलेंगे ? उन्होंने कहा आपके मित्र का कार्यक्रम है तो आप ही का कार्यक्रम है। बगल में अनेई गांव है जो बाबतपुर से लगा हुआ ह,ै जब वहां गए तो लोगों में चर्चा थी कि सीताराम सेठ आए हुए है। उन लोगों ने कहा कि भिवंडी वाले सेठ आए हुए हैं। वहां के लोगों को ऐसा लगा कि जैसे कोई उनका अपना आ गया है, ऐसे थे भाई सीताराम जी और उन्हीं की रास्ते पर उनके पुत्र अजय यादव जी अग्रसर हैं, कहावत हैं कि ‘‘वर्दी सन आफ वर्दी फादर’’। पुत्र अच्छा निकल जाता है तो कहते हैं संस्कारी पुत्र है अगर खराब निकल जाता है तो कहते हैं किस विद्यालय में पढ़़ा। अजय जी ने साबित किया है कि वह अपने पिता की विरासत को संभाले हुए हैं। पिता की प्रापर्टी तो पुत्र को मिलती ही है, वही सांस्कृतिक विरासत अजय जी संभाल कर रखे हुए हैं और उन्हीं के बताए हुए रास्ते पर चल रहे हैं। शुरू से ही मेरी यही इच्छा रहीं है कि उनके ऊपर एक किताब तैयार होनी चाहिए। यह बात हमने कई बार सोचा, कई बार कहा भी, आज मेरी उसी इच्छानुसार डा. लाल रत्नाकर जैसे विद्वान के द्वारा यह कार्य आरंभ हुआ है, इस बात की हमें हार्दिक खुशी है। यह केवल हमें ही नहीं और लोगों की भी इच्छा थी कि ऐसा होना चाहिए जो अब पूरी होने जा रही है। मैं चाहूंगा हर समाज के लोग इसमें अपना योगदान दें। जिससे उनकी यादें जुड़े और आने वाली पीढ़ी यह याद कर सके कि उनके जैसे लोगों के बताए हुए रास्ते का समाज उसका अनुसरण करें और आगे बढ़े। बगैर पुस्तक के व्यक्ति के व्यक्तित्व के बारे में जानकारी उपलब्ध नहीं होती, यही कारण है कि तमाम जो हमारे नायक हुए हैं उन पर पुस्तकें है और उनके माध्यम से उनके विचारों, उनके कर्तव्यों के बारे में लोगों को जानकारी प्राप्त होती है और वह उनका मार्गदर्शन करती है।
पुस्तक और व्यक्ति दोनों समझ में नहीं आते ? पुस्तक के पन्ने पलट लो व्यक्ति को कैसे जानोगे तुम ? जब लोग उनके बारे में लिखेंगे तब उनके व्यक्तित्व के बारे में लोग जानेंगे क्योंकि मैंने उनके साथ बहुत यात्रा की है इसलिए मैं कह सकता हूं कि व्यक्ति के व्यक्तित्व को तभी जानता है जब वह उनके साथ यात्रा करता है। मेरे पास उनकी बहुत सारी स्मृतियां हैं।
मेरी तो इतनी स्मृतियां हैं कि उस पर दो-चार पुस्तके बन जाएंगी, ऐसे ही न जाने कितने लोगों की उनके बारे में स्मृतियां हैं जो पुस्तक के रूप में आ सकती हैं।
इनके बारे में अगर देखा जाए तो जब कहीं उनको सूचना हो जाती थी कि फला जगह फला के यहां कोई कार्यक्रम है तो वह कहीं भी हों, जौनपुर में हों, लखनऊ में हों या मुंबई में हों तो वह जरूर पहुंचते थे। भिवंडी में उनके प्रदेश से जुड़े हुए लोगों आजमगढ़ से हों, गोरखपुर से हों मिर्जापुर से हों बनारस से हों प्रतापगढ़ से हों इलाहाबाद से हों या कहीं से भी हों वह समय निकालकर किसी न किसी प्रकार अवश्य पहुंचते थे। 
उनके व्यवसाय में जुड़े हुए जो भी लोग थे, जिस लेबल के भी कर्मचारी थे उन सबकी इच्छा होती थी कि सेठ जी हमारे यहां पहुंचे और सेठ जी उनको कभी भी निराश नहीं करते थे। चाहे उनको कहीं भी जाना हो वह उनके यहां जरूर पहुंचते थे।
उनका स्वभाव ऐसा था कि लोग उन्हें सेठ कहते थे लेकिन कभी भी वह इस बात का इजहार नहीं करते थे। लोग भले ही उन्हें सेठ कहते थे लेकिन वह लोगों से कहते थे किस बात के सेठ। मैं भी आप ही की तरह से हूं परिश्रम करता हूं ऐसा था उनका स्वभाव। 
मेरी बड़ी इच्छा है कि उनकी स्मृति में एक स्मारक बनना चाहिए उनके नाम पर किसी सड़क का नामकरण होना चाहिए किसी चौक पर उनकी प्रतिमा लगाई जानी चाहिए और उनके विचारों को जितने तरीके से लोगों में फैलाया जाए इसके लिए उत्तर भारतीय संघ बहुत सहायक हो सकता है और उसको यह काम करना चाहिए।
जब उत्तर भारतीय संघ का मुझे अध्यक्ष बनाया गया तब सीताराम जी ने कहा कि भाई कृपा शंकर जी मेरी जो जिम्मेदारी हो मुझे बता दीजिए लेकिन आज यहां वह बात कहने की जरूरत नहीं है कि उन्होंने हमारा कितना सहयोग किया और सहयोग ही नहीं किया बल्कि जब आरएन सिंह इस संगठन को लेकर के आगे जाते थे तो उनके द्वारा कही पूरी सब्जी कहीं चोखा बाटी कहीं अन्य तरह के कार्यक्रम किए जाते थे और इस को जोड़ने में उनका बहुत बड़ा योगदान रहा है।
यह बात मैं यहां जरूर कहना चाहूंगा कि लोग इसको अलग तरह से लेंगे लेकिन उत्तर भारतीय संघ में अगर उनकी स्मृति में कोई ऐसा निर्माण हुआ होता तो उससे लोगों को प्रेरणा मिलती और लोग उसे और जुड़ते। उत्तर भारतीय संघ का अब पदाधिकारी नहीं हूं लेकिन सदस्य हूं मैं चाहूंगा मैं उनको चिट्ठी लिखूंगा, मैं आपका बहुत आभारी हूं कि आपने यह चीजें मुझे याद दिलाएं मैं इस पर आगे काम करूंगा चीजों को कहूंगा कि यह बातें होनी चाहिए।
रत्नाकर जी मैं आपको विश्वास दिलाता हूं कि जब आप अगली बार मुंबई आएंगे तो उनकी स्मृति में कोई ना कोई स्मारक, कोई न कोई चीज आपको दिखेगी क्योंकि भिवंडी में उनका जो योगदान रहा है किसी भी धर्म का हो जाति का हो किसी भी लेवल का हो उसके लिए उन्होंने बहुत बड़ा काम किया है, वह पूरे समाज के संरक्षक के रूप में खड़े रहे।
मेरी जानकारी में यह है कि राजनीति में उनकी इतनी दखलअंदाजी थी लेकिन अपने लिए उन्होंने कभी भी इस रूप नहीं सोचा कि मुझे किसी पद पर जाना है लेकिन उनके मन में हमेशा यह बात रहती थी कि अगर कोई व्यक्ति राजनीति में आगे जाना चाहता है तो उसकी हर तरह से मदद करते थे हम तो कई बार उनको कहते थे कि जब वह जाकिट वगैरह पहन लेते थे तो ऐसे लगते थे कि जैसे कोई सांसद विधायक या मंत्री से भी ज्यादा वह आगे लगते थे। मैं उनसे कहता था कि आप सांसद लग रहे हैं तो वह कहते थे कि वह मेरा काम नहीं है जब आप वहां जाएंगे तो मैं समझूंगा कि मैं ही वहां बैठा हूं। उनकी राजनीतिक चेतना बहुत विलक्षण थी वह उस तरह से राजनीति के नहीं थे जो लोग राजनीति में जाने के लिए लालायित होते हैं वह चाहते थे कि राजनीति में अच्छे लोग जाएं और अच्छा काम करें इसलिए हमेशा वह ऐसे व्यक्तियों का समर्थन करते थे जो उसके योग्य हो।
लेकिन वह बहुत दूरदर्शी थे उनको इस बात का ज्ञान होता था किस व्यक्ति को कहां रुकना है कहां आगे बढ़ाना है और चालाक तो इतने थे कि वह राजनीति में किसी भी काम को इतने सरल तरीके से संपन्न करा लेते थे कि ऐसा तो कोई मंत्री या विधायक सांसद नहीं कर सकता।
जैसे एक बात बताऊं यादव संघ में मीटिंग हो रही है दो चार लोग गलत हैं लेकिन वहां उनको नहीं कहते थे लेकिन दो-तीन दिन बाद उन्हें बुलाकर के यह बताते थे यह काम नहीं होना चाहिए यह गलत है उस को ऐसे समझा देते थे कि वही व्यक्ति अगली बार उसी कमेटी में बैठकर वह सही बात करता था मैं तो सदस्य था तो हमेशा उस मीटिंग में जाता ही था और हमेशा यह बात कहता रहता था यदुवंशी और रघुवंशी एक साथ रहे कौन किस दल में है इसका कोई मतलब नहीं है एक साथ रहे।
यह सीताराम भाई की देन है कि समाज में वह हमें कैसे प्रस्तुत करें, वह हमें हर जगह बुलाते थे और कहते थे कि आप सब का काम करते हैं तो आप क्यों कांग्रेस पार्टी तक सीमित रहें मुझे यह पहचान देने में जो भी लोग होंगे लेकिन सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति के रूप में भाई सीताराम यादव जी का मेरे जीवन में हमेशा बहुत ऊंचा स्थान रहेगा।
आध्यात्मिक क्षेत्र में उनका जो योगदान है उसको मैं इस रूप में देखता हूं कि अगर एक सेंटर होगा जहां लोग आएंगे और कोई बहुत रोक-टोक नहीं होगी बहुत सीधे तरीके से लोग आएंगे तो अपना ध्यान मान्य और प्रसन्नता की अनुभूति करेंगे और एक दूसरे से संबंध होगा उनके जीवन में शांति होगी एक दूसरे की मदद होगी और वह आश्रम जो है लोगों को सहयोग करेगा उनकी बहुत इच्छा थी कि वह आश्रम जिस तरह से वह चाहते थे आगे भाई राम उजागीर जी अजय जी उसको देख रहे हैं वह उसको आगे बढ़ाएंगे और उनकी भावनाओं के अनुरूप उसकी प्रगति को निरंतर सुनिश्चित करेंगे उसमें किसी भी तरह की कठिनाई आएगी तो हम उसमें पूरा सहयोग करेंगे।
सतगुरु जब आते थे बैठे रहते थे तभी मैं देखता था कि भाई सीताराम जी उनको इस आश्रम की व्यवस्था के बारे में बताते रहते थे कभी-कभी मैंने महसूस किया कि वह भी यह चाहते थे कि यह आश्रम बहुत विस्तारित हो और उस विचार को भाई सीताराम जी ने हमेशा आगे बढ़ाने का प्रयास किया। सद्गुरु जी जब आते थे मैं भी जाता था, और उनके मन का कोई काम नहीं हुआ रहता था तो हम पर भी डांट पड़ती थी वहां भी सीताराम भाई बीच में आ जाते थे कि नहीं नहीं यह जो कुछ हुआ है इसमें बहुत सहयोग इनका रहता है और इनका कोई दोष नहीं है तो हमारी भी मदद करते थे।
यह बात जो मैं कर रहा हूं यह केवल मैं नहीं कर रहा हूं लाखों लोग मिलेंगे जो उनके बारे में इसी तरह की बात करेंगे जो भी उनके संपर्क में आया सभी उनके मुरीद हो गए । उनके प्रशंसक सभी धर्मों जातियों को मैं आपको बताऊं कि भिवंडी में उनकी वजह से जो सांप्रदायिक सौहार्द रहा पूरे देश में दंगे होते थे लेकिन भिवंडी उससे बचा होता था उसका एकमात्र कारण था कि वहां भाई सीताराम यादव जी रहते थे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि उनका किस तरह से लोगों का संबंध रहा है किया तो बहुत हैं जितना बताऊं उतना ही कम है लेकिन मैं समझता हूं कि सारी बातें हमारी लगभग इतने में आ गई हैं और मैं बहुत प्रसन्न हूं कि उनके ऊपर यह बहुत महत्वपूर्ण काम हो रहा है।






- कृपा शंकर सिंह
पूर्व मंत्री महाराष्ट््र सरकार 

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श्री सीताराम यादव (सेठ जी) के 10वीं परिनिर्वाण दिवस :
पर उनको विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ।

- भागीरथ यादव

वैसे तो सेठ जी के व्यसायिक सामाजिक एवं राजनैतिक जीवन के वारे में आप सभी भली-भाँति परिचित है’ मैं इस अवसर पर आप सबसे अपने बचपन की कुछ यादें साझा करना चाहता हूं।

श्री सीताराम यादव (सेठ जी) ग्राम रमदेइया, पो० कोल्हुआ, तहसील : बदलापुर, जिला : जौनपुर के मूल निवासी थे। उम्र मे वह हमसे बहुत बड़े थे। सेठ जी से मेरा वचपन से सम्पर्क का कारण था कि सेठजी की वहन की शादी मेरे चचेरे बड़े भाई श्री हरगेन यादव के साथ हुई थी जिसकी वजह से वह हमारे घर आते थे और उनके मिलनसार सरल स्वभाव के कारण हमलोग उनसे घुल-मिल गए थे। उन दिनों मैं उनसे उम्र में बहुत छोटा था प्राइमरी पाठशाला मे पढ़ता था साथ सेठ जी इतने सरल हृदय थे कि हमलोग उनसे इतने घुल-मिल कर बात-चीत करते थे। उम्र का कोई वन्धन नही होता था, वह भी बालक जैसा हम लोगो के साथ व्यवहार करते थे । चूंकि रिश्ते में वह साले (मेरी बड़ी भाभी जी के भाई) लगते थे अतः ग्रामीण परिवेश की परम्परानुसार गाली, हंसी-मजाक मस्ती हुआ करती थी और मैं उनको साला कहकर हंसी-मजाक किया करता था और वह भी उसी तरह मस्ती कि प्रकृति से व्यवहार करते थे।

सेठ जी की माता जी का उल्लेख करना उचित है वह बड़ी दूरदर्शी एवं श्रद्धालु प्रकृति की वात्सल्यमयी मां थीं। जिनके स्नेह के कारण मैं अक्सर उनके घर जाया करता था. और माताजी वडा लाड़-प्यार बड़े दुलार के साथ अच्छा -अच्छा भोजन, दूध-दही और मेरा खास पसन्द का जमौआ (दूध से सजाब दही जो मिट्टी के वर्तन (कछरी) में गोबर के सूखे उपले की धीमी-धीमी आच पर जमाया जाता है। खिलाती थी साथ ही सेठ जी के छोटे भाई श्री राजाराम एवं श्री मुनिराज जो हमउम्र है उनके साथ खेलना एवं सई नदी मे नहाता एवं मस्ती करता था। जिसके कारण उनके यहाँ कई दिनो तक रुकने का मन करता था और रुकता भी था। साथ ही सेठजी के घर के पास कल्याणपुर गांव में मेरे मामा जी का भी घर है। अतः बराबर उनके गांव आना जाना लगा रहता है। इस प्रकार का सिलसिला जब तक मैं हाई स्कूल (कक्षा 10 तक) मे था तब तक चलता रहा, इसके बाद आगे की पढ़ाई के लिए वर्ष 1960 मे जौनपुर शहर के वी.आर.पी - इमिडिएट कालेज बाद मे. टी.डी. कालेज से वी० काम० करने के बाद इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एम० काम० की पढ़ाई में व्यस्तता के कारण उनके गांव जाने का क्रम कम हो गया तथा सेठ जी अपने व्यवसाय प्रसार के में व्यस्त हो गए अतः मुलाकात नहीं हो पाया, करती थी।

मैं एम० काम० परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद मुम्बई 1966 में गया और पुनः उनके सम्पर्क मे आ गया तब भी हम लोगो का व्यवहार वयस्क न होकर वाल्यकाल जैसा ही वही गाली, हंसी-मजाक, मस्ती वाला ही होता था।

समय बदलता गया मै मुंम्बई विश्वविद्यालय के गवर्नमेन्ट ला कालेज में एल. एल. बी. एवं एलएलएम करने के बाद आगे की पढ़ाई के लिए वर्ष 1971 अमेरिका (न्ै।) चला आया और यहीं पर सेटिल हो गया हूँ परन्तु जब भी भारत (प्दकपं) आता था सेठजी से अवश्य मिलता था।

मुझे एक वाकया याद है, जब मैं भारत गया था सेठ जी  मुझे अपने साथ लेकर अपने निवास स्थान भिवण्डी (मुम्बई) अपनी कार से जा रहे थे. रास्ते मे एक अस्पताल के पास रुके और बोले कि चलिए एक सज्जन से मुलाकात करवाते हैं जो समाज के प्रतिष्ठित एवं यादव महासभा (मुम्बई) के अध्यक्ष तथा नगर सेवक भी थे. मै उत्सुकतावश पूछा । उन महानुभाव को क्या हो गया है जो अस्पताल मे मिलने जा रहे हैं तब उन्होंने बताया कि उन्हें गोली लग गयी है, मै चिन्तित मन से उनके साथ उन महानुभाव से मिलने गया, वहाँ पर सेठ जी ने मेरा परिचय उनसे कराया और उनका भी परिचय मुझसे कराया और उनका नाम श्री श्यामनारायण यादव बताया जो कि आजमगढ़ जनपद उत्तर प्रदेश के मूल निवासी थे और वाद में वह वहाँ (सगड़ी-आजमगढ़) से विधायक भी चुने गऐ। तो ऐसे सरल स्वभाव, स्नेहिल तथा सबके हितैषी थे सेठ जी. कालान्तर में सेठ जी की मध्यस्थता में ही मेरे छोटे पुत्र मनदीप यादव का विवाह श्री श्यामनारायण जी की पुत्री श्रीमती विद्या यादव की पुत्री डा0 प्रियंका सिंह यादव के साथ हुआ और हम लोग आपस में सम्वन्धी हो गये।


एक प्रसंग और आया जब सेठ जी से को अतिप्रसन्नृतम हुई थी। यह वर्ष 1990 का वाकया है, मेरे बचपन से गवर्नमेन्ट ला कालेज मुम्बई तक सहपाठी रहे है, संयोग से अका नाम भी सीताराम यादव है जो मेरे गाँव के समीप फत्तूपुर के निवासी हैं और भारतीय स्टेट बैंक में मुख्य प्रवन्धक पद से रिटायर हुए है उनकी सुपुत्री सुमन यादव - के विवाह मे सम्मिलत होने न्ै। से भारत (इलाहाबाद) आया था, मुझे प्रसन्नता इस बात से भी अधिक थी कि मेरे सहपाठी की सुपुत्री का विवाह सेठ जी के ज्येष्ठ पुत्र श्री अजय यादव जी के साथ हो रहा था। वहां पर सेठ जी सँ मुलाकात उसी वाल्यावस्था के लहजे में हुई कुछ उन्होने उस भीड़-भाड़ के माहौल में भी वह वाल्यकाल की सरल व्यवहारिकता गाँव की नही छोड़ी यह दृश्य देख सुनकर सभी लोग ंदंग रह गए और वाद मे उसी हंसी मजाक मे सहभागी बनें।

चूंकि मेरा और सेठ जी का वचपन का सम्बन्धा रहा है और मुझे यह गर्व है कि सेठजी इतने महान व्यवसायी, सामाजिक प्रतिष्ठित हुए भी हमारे वचपन के क्रिया कलापों को नही भूले थे  और उसे जीवन पर्यन्त जीवंत बनाये रखे। उस

पुनः अपने अविस्मरणीय वाल्यकाल की स्मृतियो को ताजा करते हुए उनको विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ।

 


भागीरथ यादव,
अमेरिका

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निष्काम कर्मयोगी

श्री सीता राम यादव सेठ जी का सामजिक एवं राजनैतिक दृष्टिकोण  

- सीताराम यादव
मैनेजर (सेवानिवृत्त) भारतीय स्टेट बैंक 

आज परम आदरणीय श्री सीताराम यादव (सेठ जी) के 10वेंॅ परिनिर्वाण दिवस पर भावभीनी श्रद्धांजलि।
श्री सीता राम सेठ जी के सरल स्वभाव, कर्मठता, सहज मिलनसारिता एवं उनके बहुआयामी व्यक्तित्व से तो आप सभी भलिभांति परचित है फिर भी उनके बहुआयामी व्यक्तित्व में से उनके सामाजिक एवं राजनैतिक हाटिकोण (टपेपवद) के कुछ संसमरण को आप सब से साझा करना चाहता हूँ।

समाज में व्याप्त अंधविष्वास, अवैज्ञानिक रीति-रिवाजों के अंधानुकरण जातिगत एवं उपजातिगत प्रतिद्वन्दिता आर्थिक असमानता तथा अशिक्षा, असंगठन आदि सामाजिक कमजोरियों से उनका हृदय अत्यन्त व्यथित रहता था वह सदैव उसमे सुधार करने के परंतु आपसी प्रतिद्वंद्विता एवं अशिक्षा के कारण दो भागों में विभाजित थी जिसके एकीकरण के लिए सेठ जी काफी प्रयत्नशील थे समाज के सभी वर्गों को एकत्रित कर जगह-जगह गोश्ठिया एवं सभाएं कर लोगों को संगठित होकर एक साथ चलने का

आवाहन करते थे। इस प्रकार निरंतर प्रयत्न करने पर मुंबई यादव महासभा के दोनों धड़ों का एकीकरण कराया और उसका प्रसार एवं पोषण करते रहे। उनके सरल व्यक्तित्व में ऐसा आकर्षण था एवं वाकपटुता थी कि उनको सभी लोग ध्यान से सुनते और समझते मानते और उनके कार्यों का समर्थन करते। थे परिणाम स्वरूप संगठन के साथ ही मुंबई नगर में कई शिक्षण संस्थान बनाया गया और यादव भवन के लिए जमीन की भी व्यवस्था की गई। इसी प्रकार अखिल भारतीय यादव महासभा का भी प्रसार करने में भी उनकी बड़ी भूमिका रही। यद्यपि यादव महासभा उत्तर भारत के हिंदी भाषी क्षेत्र में काफी सक्रिय थी।

परंतु दक्षिण भारत तक प्रसारित करने में सेठ जी की सराहनीय भूमिका रही है उसका परिणाम यह हुआ कि तमिलनाडु मद्रास के श्री डी.नागिन्द्रन जी को अखिल भारतवर्शीय यादव महासभा के अध्यक्ष निर्वाचित हुए। इसी संदर्भ में मुझे वर्ष 2000 में अखिल भारतीय यादव महासभा के तिरुपति अधिवेशन में सेठ जी की प्रेरणा से सम्मिलित होने का अवसर प्राप्त हुआ 2 दिन पहले ही में अमेरिका से भारत आया था और श्री सेठ जी के भिवंडी मुंबई आवास पर ठहरा था। उस अधिवेशन में उनके साथ मेरे अतिरिक्त श्री श्याम नारायण यादव नगरसेवक मुंबई एवं मुंबई यादव महासभा के अध्यक्ष बाद में सगड़ी आजमगढ़ से विधायक, श्री राम उजागीर यादव मुंबई नगर के नवोदित उद्योगपति एवं चार अन्य संभ्रांत व्यक्ति एक साथ ट्रेन द्वारा तिरुपति गए। दक्षिण भारत का यह सर्वप्रथम पहला अखिल भारतीय यादव महासभा का ऐतिहासिक अधिवेशन था। जिसमें समाज के अधीकांष लोग सम्मिलित हुए थे समाज के कई दिग्गज राजनेता विधायक सांसद मंत्री एवं गणमान्य हस्तियों की उपस्थिति थी जैसे श्री श्याम लाल यादव उपसभापति राज्यसभा भी इस प्रकार सुधार एवं सामाजिक संगठन की बात करते और अन्य सब जातियों के साथ मिलकर रहने एवं आगे बढ़ने के लिए भी प्रेरित करते तथा उनको यथा सम्भव आर्थिक सहायता भी करते थे, इसी क्रम मे मुझे स्मरण है कि वर्ष 1964 में बी.काम. परीक्षा उत्तीर्ण कर रोजी-रोटी (नौकरी) की खोज में मुम्बई गया वहां पर समाज के लोगों से मुलाकात हुई वैसे सेठ जी के संबंध में मेरी जानकारी पहले से थी। परंतु मुंबई प्रवास में उनके निकट आने का भी सौभाग्य हुआ तब मैंने पाया की मुंबई यादव महासभा थी बारे में जिक्र करते थे सभी शोषित समाज के लोगो में व्याप्त कुरीतियों एवं अशिक्षा के संबंध में समझाते थे और सबको आपस मे संगठित व शिक्षित होकर अपने अधिकारो के प्रति जागरूक रहने का संदेश देने के साथ-साथ उनके सगठन की स्थापना एवं उसका पोषण भी किया करते थे, यही नहीं कि यादव समाज के लिए कार्य करते थे बल्कि सभी पिछड़ी अनुसूचित एवं अनुसूचित जनजातियों एवं मुस्लिम विरादरी के लोगों के लिए भारत सरकार, न्यायमूर्ति श्री बनवारी लाल यादव एक्टिंग चीफ जस्टिस पटना हाई कोर्ट, श्री लालू प्रसाद यादव मुख्यमंत्री बिहार सरकार, श्रीमती कांति सिंह सांसद इसके अलावा तमिलनाडु केरल आंध्र प्रदेश एवं कर्नाटक के गणमान्य राजनेता मंत्री विधायक एवं सांसद तथा उसी समय हैदराबाद हाई कोर्ट में नियुक्त जस्टिस एक महिला नाम में भूल गया हूं उपस्थित हुए। यह अधिवेशन 2 दिन तक चला जिसमें समाज के शैक्षिक राजनीतिक एवं आर्थिक उत्थान के लिए अनेकों प्रस्ताव पारित किए गए। दक्षिण भारत के बालक बालिकाओं द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम भी रात भर चला वहां के लोगों का प्रबंध एवं उत्साह बड़ा ही सराहनीय था।

विभिन्न पारित प्रस्ताव में एक अति महत्वपूर्ण प्रस्ताव को पारित किया गया उसका उल्लेख करना मैं उचित समझता हूं जैसा कि हम सब जानते हैं कि उत्तर भारत के समाज ने अपना एक सर्वमान्य सरनेम टाइटल यादव रखा है जिससे समाज के सभी लोगों को जाति बोध हो जाता है परंतु ऐसा दक्षिण भारत के समाज में कोई सर्वमान्य सरनेम नहीं है वहां विभिन्न प्रकार के सरनेम टाइटल रखे हुए है। इसलिए इस विषय पर विस्तृत चर्चा हुई कि समाज के सभी लोग यादव सरनेम रखें परंतु यह व्यवहारिक रूप से होना संभव नहीं था क्योंकि ऐसा करने से नाम परिवर्तन की अनेकों विधिक कार्यवाही करनी पड़ती तथा सभी इस बात पर एकमत थे कि यादव कामन टाइटल ही रखा जाए। सर्वसम्मति यह प्रस्ताव पारित किया गया कि समाज के सभी लोग अपने नवजात बच्चों का एक समान ‘‘यादव’’ टाईटल रखेंगे जिससे आगे चलकर उनकी भी पहचान आसान हो सके ऐसा सब करने में सेठ जी के सराहनीय सहयोग से ही संभव हो सका।


श्री सेठ जी अखिल भारतीय स्तर पर संगठन के प्रचार प्रसार करने के साथ-साथ प्रदेश स्तर पर भी संगठन को मजबूत करने में वह महत्वपूर्ण योगदान किए अपने मूल जनपद जौनपुर, उत्तर प्रदेश में भी संगठन कई गुटों में बटा हुआ था। उनके आपसी मतभेद समाप्त कर एकजुट करने में उनकी भूमिका सराहनीय है। इसी प्रकार जौनपुर जनपद के आसपास अन्य जनपदों में दौरा करके लोगों को एक बैनर के नीचे लाने एवं एकत्रित कर संगठित करने का काम किए। तमाम उप जातीय ग्रुपों में बटे हुए लोगों में एक सूत्र में पिरोने का काम भी उन्होंने किया। आपसी प्रेम सौहार्द एवं उपजातियों में आपसी शादी विवाह का प्रचलन कराया।

श्री सेठ जी के ही प्रयास से जौनपुर शहर में यादव छात्रावास के निर्माण हेतु श्री राम दास यादव एडवोकेट, श्री दया शंकर यादव एडवोकेट, श्री लक्ष्मी शंकर यादव मंत्री उत्तर प्रदेश सरकार एवं अन्य संभ्रांत यादव बंधुओं के देखरेख में जमीन क्रय किया गया है परंतु किन्ही कारणों से अभी तक उस जमीन पर कोई निर्माण नहीं हो सका है जबकि ऊपर नामित सभी सदस्यों का निधन हो चुका है इस कारणवश भी निर्माण लंबित हो गया है। आशा है कि उनके उत्तराधिकारी छात्रावास भवन निर्माण कार्य पूरा करने में सहयोग करेंगे।

श्री सीताराम सेठ जी कमजोर वर्ग के बच्चों की शिक्षा चिकित्सा एवं कन्याओं के विवाह आदि के लिए यथोचित आर्थिक सहायता भी किया करते थे। ऐसे कार्यों के लिए उनका मानना था कि अगर दाहिना हाथ दान करता है तो बायें हाथ तक को भी पता नहीं चलना चाहिए। इस प्रकार की सहायता का प्रचार नहीं होना चाहिए कदाचित उनके जीवन काल में मैं इस प्रकार लिखने का साहस करता तो वह बिल्कुल ही असहमत होते और मैं ऐसा नहीं लिख पाता।

उनका मानना था कि सामाजिक चेतना के साथ-साथ राजनैतिक चेतना भी होनी चाहिए बिना राजनैतिक आधार के समाज का कल्याण इतना अच्छा नहीं हो सकता जितना होना चाहिए। इसको ध्यान में रखते हुए राजनीति में भी यथोचित उनकी उपस्थिति रहती थी वह राजनीति के प्रारंभिक समय में कांग्रेस पार्टी भिवंडी मुंबई का सक्रिय नेतृत्व किया करते थे। भिवंडी नगर के वह ऑनरेरी मजिस्ट भी नियुक्त किए गए थे और इस सम्मानित पाद पर काफी समय तक आसीन थे। उसके पश्चात चौधरी चरण सिंह की भारतीय क्रांति दल बीकेडी की स्थापना में भी सेठ जी सक्रिय भूमिका रही। बाद में माननीय मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व समाजवादी पार्टी की स्थापना में उनकी सक्रिय भूमिका रही समाजवादी पार्टी के स्थापना में उनकी सक्रिय भूमिका रही समाजवादी पार्टी के शीर्ष सदस्यों में उनका नाम अंकित है।
 
सेठ जी समाजवादी पार्टी की केंद्रीय एक्जक्यूटीव कमेटी के आजीवन सदस्य रहे। श्री मुलायम सिंह यादव जी जब भी मुंबई जाते वह सेठ जी के निवास पर अवश्य जाया करते थे। इसी प्रकार वह अपने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री काल एवं अन्य अवसरों पर सेठ जी के पैतृक आवास ग्राम रमदेईया जौनपुर जाया करते थे। वह सेठ जी का बड़ा आदर सम्मान करते थे और उनके सुझावों को मनोयोग से सुनते एवं उस पर समुचित कार्यवाही करते । श्री मुलायम सिंह यादव से बिना समय लिए जब भी सेठ जी चाहते थे मिल सकते थे कोई रोक टोक नहीं थी। जब सेठ जी श्री मुलायम सिंह यादव जी से मिलते तो वे अपने प्राइवेट कक्ष में वार्तालाप करते थे। श्री सेठ जी हमेषा सामाजिक उत्थान एवं संगठन का कार्य निष्काम भाव से करते थे । वह समाज के किसी संगठन या संस्थान में कोई पद नहीं लेते थे बल्कि अन्य सुयोग्य व्यक्ति को उत्तरदायित्व देते और उसका सहयोग एवं संरक्षण करते, ऐसे निष्काम कर्मवीर थे सेठ जी।

श्री सेठ जी के सामाजिक एवं राजनीतिक उत्थान एवं संगठनात्मक अनेक प्रयासों का उल्लेख करना सूरज को दिया दिखाने जैसा है वह समाज के सभी कमजोर एवं उपेक्षितों के कल्याण एवं उत्थान के मसीहा थे।

 


लेखक - सीताराम यादव
मैनेजर (सेवानिवृत्त) भारतीय स्टेट बैंक 
(के साथ सेठ जी के समधी हैं सेठ जी के बड़े पुत्र श्री अजय यादव से इनकी बेटी श्रीमती सुमन यादव का विवाह हुआ है। यह उस परिवार में नाना जी के नाम से ही पुकारे जाते हैं।)

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