Thursday, August 25, 2022

साक्षात्कार ; प्रोफेसर उदय प्रताप सिंह यादव

श्री सीताराम यादव सेठ जी के व्यक्तित्व पर 
श्री प्रोफेसर उदय प्रताप सिंह यादव से डा लाल रत्नाकर की बातचीत : 

(जैसा की आप जानते हैं सेठ श्री सीता राम जी जौनपुर जिले के एक गांव रमदेईया से  निकलकर मुंबई गए उन्होंने वहां जाकर आर्थिक सामाजिक एवं राजनितिक क्षेत्र में उन्होंने काफी प्रतिष्ठा और सम्मान के साथ ही उन्होंने अनेक क्षेत्रों में लोगों को सहयोग किये, आने वाली पीढ़ी के लिए उनके संघर्ष को एक ग्रन्थ निकालने की योजना है जिसमे इस बातचीत को सम्मिलित करना है। )

साक्षात्कार ;

उन्होंने धन कमाया भी और परहित में लगाया भी - प्रो.उदय प्रताप सिंह
   
प्रो.उदय प्रताप सिंह,  अंर्तराष्ट््रीय कवि, साहित्यकार, पूर्व सांसद राज्य सभा, पूर्व अध्यक्ष उ.प्र. हिन्ी संस्थान एवं समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव के गुरू। 
डा.लाल रत्नाकर द्वारा श्री सीताराम सेठ के सम्बन्ध में लिया गया साक्षात्कार।

प्रश्न.1. जैसा कि आप भलीभांति जानते हैं कि श्री सीताराम जी गांव से निकले बॉम्बे गये और चूंकि हमलोग बच्चे थे, छोटे छोटे थे उनको देखते थे। उदाहरण दिया जाता था कि कैसे उन्होंने सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक क्षेत्र में एक महानगर अपना विस्तार किए। इनके सम्बन्ध में अपना विचार बताने का कष्ट करें? 

उत्तर : देखिए सीताराम जी, उन्हें लोग सेठ कहते थे पर वह यादव थे और उनके बेटे जो अजय यादव हैं उनसे भी मेरा बहुत अच्छा सम्बन्ध है। मैं चौधरी हरमोहन सिंह जी के साथ उनके मुम्बई वाले मकान में कई बार गया और उनसे मिला है। उनकी सज्जनता तो अपनी जगह थी ही और बहुत से पैसे वाले लोगों में घमण्ड होता है और दूसरे जो पैसे वाले लोग होते हैं वो अपने ऊपर खर्च करने को खर्चे मानते हैं और दूसरे पर खर्च को फिजूलर्खी मानते हैं। उनका बिल्कुल उल्टा मामला था। उन्होंने धन कमाया भी और परहित में लगाया भी। 

‘‘चार दिन की जिन्दगी खुद को जिये तो क्या जिये
बात तो तब है कि जब मर जाए औरों के लिए।’’

और यही मैं कहा करता हूं कि आदमी की सकल कैसी थी सूरत कैसी थी मकान कैसा था यह याद नहीं रखा जाएगा। आदमी का मूल्यांकन होगा उसने समाज को क्या दिया यह याद रखा जाएगा, मेरी एक कविता में मिलेगा। 

‘‘जितना तुम दोगे समय उतना संवारेगा तुम्हें
पूरे उपवन में पवन कंधो पर ढ़ोएगा तुम्हें।
चांदनी अपने दुशाले में सुलाएगी तुम्हें।
ओस मुक्ताहार सोते में पहनाएगी तुम्हें
धूप अपनी उँगलियों से गुदगुदाएगी तुम्हें
तितलियों की रेशमी सिहरन जगाएगी तुम्हें
टूटे मन वाले कलेजे से लगाएंगे तुम्हें
और मंदिरों के देवता सिर पर चढ़ाएंगे तुम्हें।’’

जो किसी समाज के काम नहीं आता उसका बड़ा होना क्या बड़ा ?

बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर
पक्षी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर

 तो सीताराम जी से जब भी मैं संपर्क में आया हूं तो अगर उनसे एक घंटे बात हुई है तो एक घण्टे में पैतालीस मिनट परहित की बात की है। तो उसमें उन्होंने कैसे लोगों का आगे बढ़ाया है कैसे शिक्षा का विकास में क्या क्या किया कैसे लोगों को पढ़ाया? कैसे स्कूल व संस्थाएं बनायी ? ये उनका बड़प्पन था और मैं हमेशा उनका प्रशंसक रहा हूं। हम और चौधरी साहब जब उनके बंगले पर जाते थे तो उनकी जो खातिरदारी शुरु हाती थी उनमें जो सेवा भाव था वो भी अद्भुत था, वे चिंतित रहते थे, क्या खायेंगे कैसे रहेंगे उनको यह लगता था हालांकि हम दोनों बहुत सिंपल खाना खाने वाले सादा रहने वाले थे। 
आज हम उनको अपनी श्रद्धांजलि देते हैं और उनके परिवार की खुशहाली के लिए भगवान से प्रार्थना करते हैं और आपको बहुत बहुत धन्यवाद देते हैं कि आपने बड़ी मधुर स्मृति की याद दिलायी।

प्रश्न : दो : एक बात और कि श्री मुलायम सिंह यादव (नेता जी) अक्सर उनके घर जाते रहे हैं तथा समाजवादी पार्टी मे श्री सीताराम यादव जी की भूमिका पर आपकी राय?

नेता जी को उन्होंने बहुत मदद दिया हर तरह से। यह मुझे पता है और ये मेरी जानकारी में है। पर आपने जो कहा उनका प्रभाव यूपी और आसपास के लोगों में और उससे आगे भी था। वो उससे आगे भी गए और आर्थिक मदद भी की उनके परिवार का बड़ा योगदान रहा समाजवादी पार्टी के गठन में उनको महत्वपूर्ण भूमिका रही है, पार्टी संगठन में संस्थापक सदस्य के साथ साथ केन्द्रीय कार्यकारिणी के सदस्य भी थे। साथ ही साथ संरक्षक के रूप मे उनका योगदान तो था ही और उन्हीं की प्रेरणा से नेता जी ने उनके पुत्र अजय यादव को महाराष्ट््र में अहम जिम्मेदारी दी। 2004 में जौनपुर की लोक सभा का टिकट भी दिए।
उस परिवार का बड़ा योगदान है।


प्रश्न : तीन : आध्यात्मिक रूप से वह गड़वा घाट आश्रम जो संतमत परम्परा का केन्द्र है से जुड़े रहे और मुम्बई आश्रम के संस्थापक तथा व्यवस्थापक मंडल के आजीवन अध्यक्ष रहे। इसके विषय मे आपकी राय।

मैं ये जानता हूं कि ये जो कबीर की विचारधारा है उस पर चलने वाले लोग ही समाज का कल्याण करेंगे। कबीर ने सबसे पहले हिन्दू मुसलमान से ये कहा कि एक दूसरे की बुराई करने से कुछ नहीं होगा। हमारा बड़ा दुर्भाग्य है कि हमको बचपन से ही यह पढ़ाया जाता रहा है आप तो खुद प्रोफेसर रहे हैं -

‘‘सूर, सूर, तुलसी शशि उडगन केशवदास,
अब के कवि खद्योतसम जंह तंह करत प्रकाश।’’

अब कबीर का कोई नाम नहीं लेता। जबकि तुलसीदास और सूरदास दोनों से कबीर सीनियर थे वह उम्र में भी लगभग 150 - 200 वर्ष पहले हुए होंगे। कबीर लगभग 1300 ई0 और अन्य 1500 ई0 के बाद हुए। ये लोग अकबर के जमाने में करीब डेढ़ दो सौ साल बाद हुए।  और क्षमा करिएगा जायसी का पद्मावत न लिखा जाता तो रामचरित मानस की जो रूपरेखा है वो नहीं बन पाती। वो बिल्कुल पद्मावत के ही अनुरूप उन्होने वही भाषा है, वही चौपाई, वही सोरठा, वही दोहे अपनाए। इस बात पर बनारस के जो ब्राह्मण थे उन्होंने तुलसीदास की रामायण को शुरू में रिजेक्ट कर दिया था। कहा कि यह जुलाहे की नक़ल है और ये राम का गुणगान करता है, क्षत्रिय है और ब्राह्मणों का विरोध करता है तब तुलसीदास ने एक छन्द लिखा है। तुलसी ने लिखा है कि : 

‘‘धूत कहो अवधूत कहो रजपूत कहो या जुलाहा कहो कोई।
कहू की बेटी से बेटा न ब्याहू काहू की जाति बिगाड्यो न कोई
तुलसी सरनाम है राम गुलाम के जाके रूचै कहै सब कोई।
मांग के खायो मसजीद में सोयो लेवो को एक न देवै को दोऊ।’’

तुलसी पर कबीर का भी प्रभाव पड़ा है तभी तुलसी ने लिखा है-

‘‘बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना। कर बिनु करम करइ बिधि नाना
आनन रहित सकल रस भोगी। बिनु बानी बकता बड़ जोगी।।’’

वह (ब्रह्म) बिना ही पैर के चलता है, बिना ही कान के सुनता है, बिना ही हाथ के नाना प्रकार के काम करता है, बिना मुँह (जिह्वा) के ही सारे (छहों) रसों का आनंद लेता है और बिना वाणी के बहुत योग्य वक्ता है।

कबीर और जायसी का प्रभाव था तभी यह लिखा। क्योंकि वह हिन्दू नहीं थे और पंण्डित नहीं थे इसलिए उनका नाम ही नहीं लिया। तभी तो लिखा गया है कि-

‘‘सूर, सूर, तुलसी शशि उडगन केशवदास,
अब के कवि खद्योतसम जंह तंह करत प्रकाश।’’

इसलिए मैं यह कहना चाहता हूं कि कबीर पंथ देश के लिए सर्वोत्तम है। क्योंकि इस देश के अंदर जो साम्प्रदायिक सौहार्द बनाया है वो कबीर ने पैदा किया है। कबीर को मैं सबसे बड़ा समाजवादी मानता हूं। क्योंकि उन्होंने किसी में कोई भी भेद नहीं किया। उन्होंने पैसे का विरोध किया। उन्होंने पाखण्ड का विरोध किया कभी भी उन्होंने चरखा बंद नहीं किया। इतने बड़े कवि होते हुए वह जुलाहा का काम करते रहते थे। वह तानाबाना बुनते रहते थे आनंद करते थे।

सर आप जानते हैं कि वह भिमंडी में रहते थे और वहां पर अधिकांश आबादी मुस्लिम की है, लेकिन कभी भी वहां पर किसी भी तरह का भेदभाव नहीं हुया और अन्यत्र बहुत सारे दंगे इत्यादि हुए वहां कभी इस तरह का कुछ नहीं हुआ।

मैं भिवंडी गया हूं जब अबू आजमी यहां से चुनाव लड़े तब मैं उनके प्रचार में वहां गया था और उस समय मुझे जानकारी हुई कि यहां पर मुस्लिम आबादी बहुतायत में है और लोगों से बहुत आपसी सौहार्द है और इसके लिए श्री सीताराम यादव जी को भी श्रेय जाता है और इसी रास्ते पर अजय यादव भी वहां काम कर रहे हैं।


-डा लाल रत्नाकर


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