- सीताराम जी इसी तरह की शख्सियत है।
-चौ.अम्बिका चौधरी ( पूर्व मंत्री उ. प्र.)
अपने लिए उन्होंने जैसे भी दिन गुजारे हो लेकिन उनके यहां पहुंचने के बाद किसी को भी उन्होंने और परिस्थितियों में नहीं गुजरने दिया ऐसी उनके बारे में चर्चा आम है। बड़े लोगों की बड़ी मदद और राजनीतिक कार्यकर्ताओं के तो वह बड़े संरक्षक रहे हैं, जो भी उनके पास गया बिना किसी भेदभाव के उन्होंने उनकी मदद की है मैं केवल यहां पर आर्थिक पक्ष की बात नहीं कर रहा हूं बल्कि हिम्मत देने का काम, हौसला बढ़ाने का काम और यहां तक की अगर जरूरत पड़े तो उनके लिए छोटी बड़ी सिफारिश करने का काम उन्होने किया। अब यह जरूर है कि जौनपुर वाले उसमें सौभाग्यशाली हैं कि ज्यादा उनके हिस्से में आया और यह भी स्वाभाविक है कि जौनपुर में अपनी माटी से उनका ज्यादा लगाव था, इसकी वजह से जौनपुर वालों को उसका कुछ ज्यादा लाभ मिला।जौनपुर के अलावा भी जो लोग भी वहां तक पहुंच सके वहां से कोई निराश होकर नहीं आया, यह उनकी बड़ी भारी विशेषता थी और स्वभाव की उदारता के अलावा वह बहुआयामी व्यक्तित्व था उनका। हम बड़े-बड़े नेताओं के बारे में जब चर्चा करते हैं उनके गुणों की उनके आचरण की हम लोग कमोबेश उसको थोड़ा बढ़ा करके करने की बात करते हैं।एक ऐसा व्यक्ति जो देश की पार्लियामेंट में नहीं गए देश के कोई मंत्री नहीं हुए, लेकिन बावजूद इसके राजनीति में समाज के लिए जो समझदारी और योगदान होना चाहिए उसको और उसमें अपनी जितनी भूमिका होनी चाहिए उस भूमिका को उन्होंने जिस ढंग से निर्वाह किया। एक उदाहरण हो सकता है और प्रेरणा ली जा सकती है।यह सच है कि इस रिवाज के लोग बहुत समाज में होते नहीं और है भी नहीं, और आज भी जब नेताजी की चर्चा होती है उनके सहयोगियों की चर्चा होती है तो प्रचलित तौर पर सेठ जी के नाम से भी उन को संबोधित करते थे और जब सेठ जी कहते थे तो यह मान लिया जाता था कि जब नाम नहीं ले रहे हैं तो उन्हीं की चर्चा हो रही हैं। जब जब बात आती थी तो एक अलग छवि उनकी सभी लोगों में थी खासकर समाजवादी परिवार में सभी लोगों में विशेष रूप से, जो लोग भी उन तक पहुंचे जो लोग नहीं भी पहुंचे उनका जितना भाग्य सौभाग्य हो।आज आवश्यकता इस बात की जरूर है कि हम देखते हैं कि गांधीजी सेठ जमना लाल बजाज के बगैर अपने उद्देश्यों को उस तरह से प्राप्त नहीं कर सकते थे, या कोलकाता जाते हुए गांधी जी को एक निश्चिंतता होती थी, लोहिया जी को निश्चिंतता होती थी कि वह वहां जा रहे हैं तो उनको देखने वाले लोग वहां हैं।
यह सही बात है कि आज समाजवादी पार्टी वहां नहीं है जहां शुरुआत में आई थी तत्कालीन समय में कई विधायकगण मंत्री हुए विधायक हैं और आज भी विधायक हैं। लेकिन उस दौर को याद करता हॅूं तो खुद मेरी पृष्ठिभूमी का स्मरएा हो आता है, जब मेरे पिता जी कलकत्ता गए थे गांव के एक व्यक्ति से 10 रूपये कर्ज लेकर गए थे सबसे पहले उन्होंने उसको किया इसलिए मैं समझ सकता हूं उन परिस्थितियों को जब उन्को याद करता हूं तब अपने पूज्य पिता जी की स्मृतियां ताजी हो जाती हैं, उनको पुनः मैं उसी भाव और छवि के साथ स्मरण करता हूं और जिनका नाम रहा जो लोग अनाम रहे और उनके साथ रहे उन पर उनकी दुआएं रहीं और वे भी जिनपर उनकी अपार कृपा रही उनसब की तरफ से उनकी स्मृतियों को नमन करता हूं। मैं उनके चरणों मे अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं।
-चौ.अम्बिका चौधरी
( पूर्व मंत्री उ. प्र.)



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